एंडोफथेलमाइटिस: आंख के अंदरूनी हिस्से का गंभीर संक्रमण
परिचय
हमारी आंख बहुत नाज़ुक अंग है। इसके किसी भी हिस्से में संक्रमण दृष्टि को नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन कुछ संक्रमण इतने तेज़ी से बढ़ते हैं कि कुछ घंटों की देरी भी आंख की रोशनी हमेशा के लिए छीन सकती है। एंडोफथेलमाइटिस ऐसी ही एक आपातकालीन स्थिति है। इसमें आंख के भीतरी हिस्सों, यानी विट्रियस (कांच जैसा द्रव) और एक्वियस ह्यूमर (आंख के अगले भाग का द्रव), में गंभीर सूजन और संक्रमण हो जाता है।
यह रोग अक्सर आंख की सर्जरी, चोट या इंजेक्शन के बाद होता है। समय पर पहचान और इलाज हो जाए तो आंख बचाई जा सकती है। इसीलिए हर व्यक्ति को, विशेषकर मोतियाबिंद का ऑपरेशन करा चुके या करवाने वाले लोगों को, इसके बारे में जानकारी होनी चाहिए।
एंडोफथेलमाइटिस क्या है?
“एंडो” का अर्थ है भीतर और “ऑफथेल्मोस” का अर्थ है आंख। जब बैक्टीरिया, फफूंद या कभी-कभी वायरस या परजीवी आंख के अंदरूनी हिस्सों में पहुंचकर वहां बढ़ने लगते हैं, तो शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली उन पर हमला करती है। इससे आंख के भीतर मवाद, सूजन और ऊतकों को नुकसान होता है। आंख के अंदर रक्त का प्रवाह सीमित होता है और प्रतिरक्षा कोशिकाएं भी कम पहुंचती हैं। इसलिए संक्रमण एक बार जड़ जमा ले तो उसे नियंत्रित करना कठिन हो जाता है।
एंडोफथेलमाइटिस के प्रकार
1. बाह्य कारणों से होने वाला (एक्सोजेनस): यह सबसे आम प्रकार है। इसमें कीटाणु बाहर से आंख के अंदर पहुंचते हैं। इसके मुख्य कारण हैं:
- मोतियाबिंद की सर्जरी के बाद (पोस्ट-ऑपरेटिव), जो सबसे आम कारण है
- आंख में दिए जाने वाले इंजेक्शन (इंट्राविट्रियल इंजेक्शन)
- ग्लूकोमा या रेटिना की सर्जरी
- आंख में चोट, खासकर किसी नुकीली वस्तु, लकड़ी, कांच, पत्थर के टुकड़े या मिट्टी से लगी चोट (पोस्ट-ट्रॉमैटिक)
- कॉर्निया के गंभीर अल्सर का आंख के अंदर फैल जाना
2. रक्त के माध्यम से होने वाला (एंडोजेनस): इसमें शरीर के किसी अन्य हिस्से का संक्रमण रक्त के ज़रिए आंख तक पहुंच जाता है। यह कम पाया जाता है, पर उन लोगों में हो सकता है जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर है, जैसे मधुमेह के रोगी, कैंसर के मरीज़, लंबे समय से आईसीयू में भर्ती लोग, नसों के ज़रिए नशीली दवाएं लेने वाले, या जिन्हें हृदय के वाल्व का संक्रमण हो।
कारक जीव
- बैक्टीरिया: स्टैफिलोकोकस एपिडर्मिडिस, स्टैफिलोकोकस ऑरियस, स्ट्रेप्टोकोकस और कुछ ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया। पोस्ट-ऑपरेटिव मामलों में अधिकतर बैक्टीरिया ही ज़िम्मेदार होते हैं। पलकों और आंख की सतह पर रहने वाले सामान्य कीटाणु भी सर्जरी के दौरान अंदर पहुंचकर खतरा बन सकते हैं।
- फफूंद: कैंडिडा और एस्परजिलस। ये खासकर चोट लगने के बाद या रक्त के रास्ते होने वाले संक्रमण में मिलते हैं। हमारे जैसे गर्म और नम जलवायु वाले क्षेत्रों में खेती से जुड़ी चोटों में फफूंद का संक्रमण अपेक्षाकृत अधिक देखा जाता है।
जोखिम कारक
- हाल ही में आंख की सर्जरी या इंजेक्शन
- मधुमेह और कमज़ोर प्रतिरोधक क्षमता
- पलकों की सूजन (ब्लेफेराइटिस) या आंसू की नली में रुकावट या संक्रमण
- ऑपरेशन के दौरान जटिलताएं, जैसे कैप्सूल का फटना
- आंख में लगी चोट जिसमें बाहरी वस्तु अंदर रह गई हो
- सर्जरी के बाद घाव का ठीक से न भरना या टांकों का ढीला होना
- सर्जरी के बाद आंख को गंदे हाथों से छूना या रगड़ना
- शरीर में पहले से कोई गंभीर संक्रमण
लक्षण
एंडोफथेलमाइटिस के लक्षण आमतौर पर सर्जरी के कुछ दिनों के भीतर उभरते हैं, हालांकि कुछ प्रकारों में हफ्तों या महीनों बाद भी दिख सकते हैं। मुख्य लक्षण हैं:
- दृष्टि का अचानक घटना या धुंधलापन, जो ऑपरेशन के बाद अपेक्षित सुधार के उलट होता है
- आंख में तेज़ दर्द, जो दर्द निवारक दवाओं से भी कम न हो
- आंख का गहरा लाल होना
- पलकों में सूजन
- रोशनी से चुभन या असहजता (फोटोफोबिया)
- आंख के अगले भाग में मवाद, जिसे चिकित्सा भाषा में हाइपोपियोन कहते हैं, यानी पुतली के नीचे सफेद या पीली परत जमना
- आंख से पानी या पीला स्राव
- कुछ मामलों में सिरदर्द, मतली और बुखार
अत्यंत महत्वपूर्ण बात: ऑपरेशन के बाद यदि दर्द बढ़े, लालिमा बढ़े या नज़र कम होने लगे तो इसे “सामान्य सूजन” मानकर टालना नहीं चाहिए। तुरंत नेत्र चिकित्सक से संपर्क करें।
निदान
नेत्र रोग विशेषज्ञ मरीज़ की पूरी जांच करते हैं:
- दृष्टि की जांच और स्लिट लैंप जांच: इससे आंख के अगले भाग में सूजन, कोशिकाओं और मवाद का पता चलता है।
- आंख की अल्ट्रासाउंड (बी-स्कैन): जब आंख के भीतर देखना मुश्किल हो, जैसे बादल छाए हों या रक्तस्राव हो, तब यह विट्रियस की स्थिति और रेटिना के डिटैचमेंट की जानकारी देता है।
- विट्रियस टैप या बायोप्सी: आंख के अंदर से बहुत थोड़ा द्रव निकालकर माइक्रोस्कोप, कल्चर और कभी-कभी पीसीआर जांच के लिए भेजा जाता है। इससे पता चलता है कि संक्रमण बैक्टीरिया का है या फफूंद का और कौन-सी दवा असरदार होगी।
- रक्त जांच और अन्य परीक्षण: एंडोजेनस संक्रमण की आशंका हो तो रक्त कल्चर और शरीर के अन्य अंगों की जांच की जाती है।
उपचार
उपचार जितनी जल्दी शुरू हो, परिणाम उतने बेहतर होते हैं। अक्सर निदान की पुष्टि की प्रतीक्षा किए बिना ही शुरुआती इलाज शुरू कर दिया जाता है।
1. इंट्राविट्रियल एंटीबायोटिक इंजेक्शन: यह उपचार की आधारशिला है। दवा सीधे आंख के अंदर विट्रियस में इंजेक्ट की जाती है, क्योंकि खाने या नस से दी गई दवा आंख के भीतर पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाती। आमतौर पर बैक्टीरिया के दोनों बड़े वर्गों को कवर करने के लिए दो एंटीबायोटिक साथ दिए जाते हैं। कल्चर की रिपोर्ट आने पर दवा में बदलाव किया जा सकता है।
2. विट्रेक्टॉमी सर्जरी: जिन मरीज़ों की दृष्टि बहुत ज़्यादा घट चुकी हो (जैसे केवल हाथ हिलता दिखे या उससे भी कम), उनमें विट्रेक्टॉमी की ज़रूरत पड़ सकती है। इसमें आंख के अंदर का संक्रमित विट्रियस निकाला जाता है। इससे कीटाणुओं और विषैले पदार्थों की मात्रा घटती है और दवा का असर बेहतर होता है। फफूंद के संक्रमण में भी अक्सर यह ज़रूरी होता है।
3. स्टेरॉयड: सूजन को कम करने के लिए डॉक्टर कुछ मामलों में स्टेरॉयड देते हैं। इनका उपयोग संक्रमण के प्रकार को देखते हुए ही किया जाता है, क्योंकि फफूंद के संक्रमण में ये नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।
4. फफूंद के मामलों में: एंटीफंगल दवाएं, जैसे वोरिकोनाज़ोल या एम्फोटेरिसिन बी, आंख के भीतर इंजेक्शन से और ज़रूरत पड़ने पर मुंह या नस से दी जाती हैं। इस उपचार की अवधि लंबी होती है।
5. सहायक उपचार: आंख में डाली जाने वाली एंटीबायोटिक और सूजन-रोधी बूंदें, पुतली को फैलाने वाली दवाएं और दर्द निवारक। एंडोजेनस मामलों में मूल संक्रमण का इलाज भी साथ-साथ किया जाता है।
जटिलताएं और दृष्टि पर प्रभाव
समय पर इलाज के बावजूद कुछ मरीज़ों की दृष्टि पूरी तरह वापस नहीं आ पाती। संभावित जटिलताओं में शामिल हैं:
- रेटिना का अलग हो जाना (रेटिनल डिटैचमेंट)
- आंख के अंदर लगातार सूजन
- आंख का सिकुड़ जाना
- स्थायी दृष्टिहीनता
- बहुत गंभीर मामलों में आंख निकालने (एविस्सरेशन या एन्यूक्लिएशन) की ज़रूरत
परिणाम इन बातों पर निर्भर करते हैं: संक्रमण करने वाले जीव का प्रकार, उपचार शुरू होने में लगा समय और इलाज शुरू होते समय की दृष्टि की स्थिति। कम विषैले बैक्टीरिया से हुआ संक्रमण जल्दी पकड़ में आ जाए तो अच्छी दृष्टि बच सकती है, जबकि तेज़ी से बढ़ने वाले बैक्टीरिया या फफूंद में नतीजे कमज़ोर रह सकते हैं।
रोकथाम
एंडोफथेलमाइटिस का उपचार कठिन है, इसलिए बचाव सबसे महत्वपूर्ण है।
चिकित्सकों और अस्पतालों के लिए:
- ऑपरेशन थिएटर में सख़्त निर्जर्मीकरण (स्टरिलाइज़ेशन) और साफ-सफाई
- ऑपरेशन से पहले आंख और पलकों को पोविडोन आयोडीन से साफ करना
- ज़रूरत के अनुसार सर्जरी के समय आंख के भीतर एंटीबायोटिक का उपयोग
- सर्जरी से पहले पलकों या आंसू की नली के संक्रमण का इलाज
मरीज़ों के लिए:
- सर्जरी से पहले बताया गया इलाज पूरा करें और मधुमेह को नियंत्रण में रखें
- ऑपरेशन के बाद आंख को हाथ न लगाएं और न रगड़ें
- डॉक्टर की बताई बूंदें समय पर और साफ हाथों से डालें
- आंख पर सुरक्षा कवच या चश्मा लगाकर रखें
- ऑपरेशन के बाद कुछ दिनों तक धूल, धुएं और गंदे पानी से बचें
- नियमित फॉलो-अप जांच ज़रूर कराएं
चोट से बचाव:
- खेत, कारखाने या निर्माण कार्य में सुरक्षात्मक चश्मा पहनें
- पत्थर तोड़ने, हथौड़े या ग्राइंडर चलाने के समय आंखों की सुरक्षा रखें
- आंख में चोट लगे तो घरेलू नुस्खे या आंख को रगड़ना बंद करें और तुरंत अस्पताल पहुंचें
कब तुरंत डॉक्टर के पास जाएं?
यदि आपने हाल में आंख की सर्जरी, इंजेक्शन या चोट का सामना किया है और इनमें से कोई भी लक्षण दिखे तो उसी दिन नेत्र चिकित्सक या नज़दीकी नेत्र अस्पताल के आपातकालीन विभाग में जाएं:
- अचानक नज़र कम होना
- बढ़ता हुआ दर्द या लालिमा
- पलकों में सूजन
- आंख में सफेद या पीला मवाद
- रोशनी सहन न होना
आम भ्रांतियां
- “ऑपरेशन के बाद थोड़ा दर्द और लाली तो होती ही है।” हल्की असुविधा सामान्य है, परंतु दर्द बढ़ना या दृष्टि घटना सामान्य नहीं है।
- “घरेलू उपाय से आंख ठीक हो जाएगी।” आंख के अंदर के संक्रमण में घरेलू उपचार या केवल बूंदें पर्याप्त नहीं होतीं, और देरी से नुकसान स्थायी हो सकता है।
- “अपने आप ठीक हो जाएगा।” यह रोग अपने आप ठीक नहीं होता। तेज़ी से बिगड़ सकता है।
निष्कर्ष
एंडोफथेलमाइटिस एक दुर्लभ किंतु अत्यंत गंभीर स्थिति है जो आंख की रोशनी के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। सौभाग्य से आधुनिक सर्जिकल तकनीकों, बेहतर स्टरिलाइज़ेशन और प्रभावी इंजेक्शन उपचार की बदौलत इसके मामले कम हुए हैं और परिणाम पहले से बेहतर हैं। फिर भी सबसे बड़ी भूमिका जागरूकता और समय की होती है। ऑपरेशन के बाद दिए गए निर्देशों का पालन करें, किसी भी असामान्य लक्षण को नज़रअंदाज़ न करें और तुरंत विशेषज्ञ की सलाह लें। याद रखें, आंख के मामले में एक दिन की देरी भी भारी पड़ सकती है।
