कॉर्नियल अल्सर (कॉर्निया पर घाव): कारण, लक्षण, निदान और उपचार
परिचय
हमारी आँख के सबसे आगे वाले हिस्से में एक पारदर्शी, गुंबदनुमा परत होती है, जिसे कॉर्निया (स्वच्छ मंडल) कहते हैं। यह आँख की खिड़की की तरह काम करती है। इसी के ज़रिए रोशनी आँख के भीतर पहुँचती है और हमें साफ़ दिखाई देता है। कॉर्निया आँख की कुल फ़ोकस करने की क्षमता का लगभग दो-तिहाई हिस्सा संभालती है। साथ ही यह धूल, कीटाणुओं और बाहरी चोटों से आँख की रक्षा भी करती है।
जब इस पारदर्शी परत पर घाव या खुला छाला बन जाता है, तो उसे कॉर्नियल अल्सर कहते हैं। आम भाषा में इसे कॉर्निया का घाव या आँख की पुतली पर छाला भी कहा जाता है। यह एक गंभीर नेत्र आपातकालीन स्थिति है। समय पर इलाज न मिले तो स्थायी धुंधलापन, कॉर्निया पर सफ़ेद दाग, यहाँ तक कि अंधापन भी हो सकता है। भारत में कॉर्निया संबंधी अंधेपन का एक बड़ा कारण यही बीमारी है, खासकर ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में।
कॉर्नियल अल्सर क्या है?
कॉर्निया की ऊपरी परत (एपिथीलियम) के क्षतिग्रस्त होने पर कीटाणु उसमें प्रवेश कर जाते हैं और भीतरी परतों में संक्रमण फैलाने लगते हैं। इससे कॉर्निया पर मवाद से भरा सफ़ेद या धूसर धब्बा बन जाता है और आँख में सूजन आ जाती है। इसे चिकित्सा भाषा में केराटाइटिस (Keratitis) भी कहा जाता है। सभी अल्सर संक्रमण से नहीं होते, पर अधिकांश मामलों में कीटाणु ही ज़िम्मेदार होते हैं।
कॉर्नियल अल्सर के प्रमुख कारण
1. बैक्टीरियल संक्रमण
स्टैफिलोकोकस, स्ट्रेप्टोकोकस और स्यूडोमोनास जैसे बैक्टीरिया सबसे आम कारणों में हैं। स्यूडोमोनास का संक्रमण बहुत तेज़ी से फैलता है और कुछ ही दिनों में कॉर्निया को गला सकता है।
2. फंगल संक्रमण
खेती-किसानी करने वालों में यह अधिक देखा जाता है। पौधे की टहनी, फसल के तिनके, धान की भूसी या मिट्टी से आँख में चोट लगने पर फंगस घाव में पहुँच जाता है। भारत जैसे गर्म और नम जलवायु वाले देशों में फंगल अल्सर बहुत आम है।
3. वायरल संक्रमण
हर्पीज़ सिम्प्लेक्स वायरस और हर्पीज़ ज़ोस्टर (दाद) वायरस कॉर्निया पर घाव कर सकते हैं। ये बार-बार लौटकर आ सकते हैं।
4. परजीवी संक्रमण
अकैंथअमीबा नामक सूक्ष्मजीव दूषित पानी से आँख में पहुँच सकता है। यह कॉन्टैक्ट लेंस पहनने वालों में ज़्यादा होता है और बहुत तकलीफ़देह होता है।
5. कॉन्टैक्ट लेंस का गलत इस्तेमाल
लेंस पहनकर सोना, उन्हें साफ़ न रखना, पुराने घोल का इस्तेमाल करना या लेंस पहनकर तैरना अल्सर का बड़ा जोखिम है।
6. आँख में चोट
नाखून, लकड़ी, पत्थर के टुकड़े, धूल, कीड़े या किसी नुकीली चीज़ से लगी खरोंच संक्रमण का रास्ता खोल देती है।
7. अन्य कारण
- आँखों का अत्यधिक सूखापन (ड्राई आई)
- पलकों का पूरी तरह बंद न हो पाना
- विटामिन ए की कमी
- आँखों में बिना सलाह के स्टेरॉयड ड्रॉप्स का इस्तेमाल
- मधुमेह जैसी बीमारियाँ या कमज़ोर रोग प्रतिरोधक क्षमता
- रसायनों, एसिड या चूने से जलन
- ऑटोइम्यून रोग, जैसे रूमेटॉइड आर्थराइटिस
जोखिम किसे अधिक होता है?
- कॉन्टैक्ट लेंस उपयोगकर्ता
- किसान, मज़दूर और निर्माण कार्य से जुड़े लोग
- मधुमेह के रोगी
- वृद्ध लोग और कुपोषित बच्चे
- जिन्होंने हाल ही में आँख की सर्जरी करवाई हो
- जो लंबे समय से स्टेरॉयड आई ड्रॉप्स इस्तेमाल कर रहे हों
लक्षण
कॉर्नियल अल्सर के लक्षण आमतौर पर अचानक शुरू होते हैं और तेज़ी से बढ़ते हैं:
- आँख में तेज़ दर्द या चुभन
- आँख का लाल हो जाना
- लगातार पानी बहना या गाढ़ा पीला-हरा स्राव निकलना
- रोशनी से परेशानी (फोटोफोबिया)
- धुंधला दिखाई देना या दृष्टि कम होना
- कॉर्निया पर सफ़ेद या धूसर धब्बा दिखना
- पलकों में सूजन
- आँख में कुछ फँसा होने का एहसास
- आँख खोलने में कठिनाई
गंभीर मामलों में आँख के सामने वाले हिस्से में मवाद जमा हो सकता है, जिसे हाइपोपियॉन कहते हैं।
जाँच और निदान
नेत्र रोग विशेषज्ञ निम्नलिखित जाँचों से अल्सर की पुष्टि करते हैं:
- स्लिट लैंप परीक्षण: एक विशेष सूक्ष्मदर्शी से आँख को बड़ा करके देखा जाता है। इसमें अल्सर का आकार, गहराई और स्थान पता चलता है।
- फ्लोरेसिन स्टेन टेस्ट: आँख में एक पीला रंग डाला जाता है। घाव वाला हिस्सा नीली रोशनी में हरा चमकता है।
- कॉर्नियल स्क्रैपिंग और कल्चर: अल्सर से थोड़ा-सा नमूना लेकर माइक्रोस्कोप में देखा जाता है और प्रयोगशाला में जाँच के लिए भेजा जाता है। इससे पता चलता है कि कारण बैक्टीरिया है, फंगस है या कुछ और। सही दवा चुनने में यह जाँच बेहद ज़रूरी है।
- दृष्टि की जाँच: देखने की क्षमता का आकलन किया जाता है।
उपचार
उपचार कारण पर निर्भर करता है और इसे जल्द से जल्द शुरू करना ज़रूरी है।
दवाइयाँ
- बैक्टीरियल अल्सर: एंटीबायोटिक आई ड्रॉप्स, जो शुरुआत में हर घंटे या हर आधे घंटे पर डाली जा सकती हैं।
- फंगल अल्सर: एंटीफंगल आई ड्रॉप्स, जैसे नैटामाइसिन, और ज़रूरत पड़ने पर खाने की एंटीफंगल दवाएँ। इनका इलाज लंबा चलता है।
- वायरल अल्सर: एंटीवायरल दवाएँ और मलहम।
- दर्द और सूजन के लिए: साइक्लोप्लेजिक ड्रॉप्स और दर्द निवारक दवाएँ।
ज़रूरी सावधानी
स्टेरॉयड वाली ड्रॉप्स डॉक्टर की सलाह के बिना बिल्कुल इस्तेमाल न करें। संक्रमित आँख में ये फंगस और बैक्टीरिया को और बढ़ा सकती हैं और स्थिति बिगाड़ सकती हैं।
अन्य उपचार
- कुछ मामलों में कॉर्निया क्रॉस-लिंकिंग (CXL) की जा सकती है।
- आँख पर पट्टी या बैंडेज कॉन्टैक्ट लेंस लगाया जा सकता है।
- गंभीर स्थिति में मरीज़ को अस्पताल में भर्ती करके निगरानी में इलाज दिया जाता है।
शल्य चिकित्सा
जब दवाओं से अल्सर ठीक न हो, कॉर्निया में छेद होने का खतरा हो या वह फट जाए, तो सर्जरी की जाती है:
- एम्नियोटिक मेम्ब्रेन ग्राफ्ट: घाव को ढकने के लिए झिल्ली लगाई जाती है।
- टिशू ग्लू (चिपकाने वाला गोंद): छोटे छिद्र को बंद करने के लिए।
- कॉर्नियल ट्रांसप्लांट (केराटोप्लास्टी): जब कॉर्निया बहुत ज़्यादा क्षतिग्रस्त हो जाए, तो किसी मृतक के दान किए गए स्वस्थ कॉर्निया से बदल दिया जाता है।
संभावित जटिलताएँ
इलाज में देरी होने पर ये समस्याएँ हो सकती हैं:
- कॉर्निया पर स्थायी निशान या सफ़ेद दाग (ल्यूकोमा)
- दृष्टि का स्थायी रूप से कम होना
- कॉर्निया में छेद होना (परफ़ोरेशन)
- आँख के भीतर संक्रमण फैलना (एंडोफ्थैल्माइटिस)
- मोतियाबिंद या ग्लूकोमा
- आँख को निकालने तक की नौबत, जो अत्यंत गंभीर मामलों में होती है
घरेलू देखभाल और क्या न करें
अल्सर का इलाज घर पर संभव नहीं है, लेकिन डॉक्टर के निर्देशों के साथ ये सावधानियाँ रखें:
करें:
- दवा डालने से पहले हाथ साबुन से अच्छी तरह धोएँ।
- डॉक्टर द्वारा बताई गई दवा समय पर और पूरी अवधि तक डालें।
- बार-बार जाँच के लिए डॉक्टर के पास जाएँ।
- धूप का चश्मा पहनें, इससे रोशनी की परेशानी कम होती है।
- साफ़ रूमाल या टिश्यू का इस्तेमाल करें।
न करें:
- आँख को रगड़ें या मसलें नहीं।
- खुद से कोई दवा, ड्रॉप या घरेलू नुस्खा (जैसे दूध, शहद, गुलाब जल, लार या हल्दी) आँख में न डालें।
- कॉन्टैक्ट लेंस न पहनें।
- ड्रॉपर की नोक को आँख या उंगली से न छुआएँ।
- आँख के मेकअप का इस्तेमाल न करें।
- पुरानी या दूसरे की दवा न डालें।
बचाव के उपाय
- कॉन्टैक्ट लेंस की स्वच्छता: लेंस लगाने और निकालने से पहले हाथ धोएँ, निर्धारित घोल से ही साफ़ करें, लेंस पहनकर सोएँ या तैरें नहीं और समय पर बदलते रहें।
- आँख की चोट से बचाव: खेत, कारखाने या निर्माण स्थल पर काम करते समय सुरक्षात्मक चश्मा पहनें।
- चोट लगने पर तुरंत इलाज: आँख में मामूली खरोंच या कचरा जाने पर भी नेत्र चिकित्सक को दिखाएँ।
- स्टेरॉयड ड्रॉप्स से परहेज़: केवल चिकित्सक की सलाह पर ही इस्तेमाल करें।
- पौष्टिक आहार: विटामिन ए से भरपूर भोजन लें, जैसे गाजर, पपीता, पालक, आम और अंडा।
- मधुमेह नियंत्रण: शुगर का स्तर नियंत्रण में रखें।
- साफ़-सफ़ाई: आँखों को गंदे हाथों से न छुएँ, तौलिया और रूमाल साझा न करें।
- सूखी आँखों का इलाज: ड्राई आई की समस्या हो तो कृत्रिम आँसू (लुब्रिकेंट ड्रॉप्स) डॉक्टर की सलाह से इस्तेमाल करें।
डॉक्टर के पास कब जाएँ?
इनमें से कोई भी स्थिति हो तो बिना देरी के नेत्र रोग विशेषज्ञ से मिलें:
- आँख में अचानक तेज़ दर्द या लालिमा
- आँख में चोट लगने के बाद दर्द या पानी आना
- कॉर्निया पर सफ़ेद धब्बा दिखाई देना
- दृष्टि में अचानक कमी
- कॉन्टैक्ट लेंस पहनने के बाद जलन या दर्द
- आँख से गाढ़ा स्राव निकलना
कॉर्नियल अल्सर में हर घंटे की देरी मायने रखती है। कई बार 24 से 48 घंटे में ही स्थिति गंभीर हो जाती है।
नेत्रदान का महत्व
कॉर्निया के गंभीर घावों के कारण जिन लोगों की रोशनी चली जाती है, उनके लिए कॉर्निया प्रत्यारोपण नई उम्मीद है। यह तभी संभव है जब कोई व्यक्ति मृत्यु के बाद नेत्रदान करे। एक व्यक्ति का नेत्रदान दो लोगों की ज़िंदगी में रोशनी ला सकता है। इसलिए नेत्रदान का संकल्प लेना और परिवार को इसके बारे में बताना एक अमूल्य योगदान है।
निष्कर्ष
कॉर्नियल अल्सर एक गंभीर लेकिन काफ़ी हद तक रोकी जा सकने वाली बीमारी है। इसका सबसे बड़ा दुश्मन है देरी और घरेलू नुस्खों पर भरोसा। आँख में चोट लगने, लगातार दर्द, लालिमा या धुंधलेपन को हल्के में न लें। समय पर नेत्र विशेषज्ञ से जाँच और सही उपचार से अधिकांश मरीज़ों की रोशनी बचाई जा सकती है। थोड़ी सावधानी, स्वच्छता और जागरूकता से हम अपनी आँखों को इस खतरे से सुरक्षित रख सकते हैं।
नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी लक्षण की स्थिति में योग्य नेत्र चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।
