बैरेट एसोफेगस (Barrett's Esophagus)
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बैरेट एसोफेगस (Barrett’s Esophagus): कारण, लक्षण, जाँच और इलाज

परिचय

बैरेट एसोफेगस भोजन नली (आहार नलिका या एसोफेगस) की एक स्थिति है, जिसमें नली की भीतरी परत की सामान्य कोशिकाएँ बदलकर आंत जैसी कोशिकाओं में तब्दील हो जाती हैं। भोजन नली मुँह से पेट तक भोजन पहुँचाती है। सामान्यतः इसकी अंदरूनी परत गुलाबी और चिकनी होती है, लेकिन लंबे समय तक पेट के अम्ल (एसिड) के संपर्क में रहने पर यह परत बदलकर लाल और खुरदरी हो सकती है।

इस स्थिति का नाम ब्रिटिश सर्जन नॉर्मन बैरेट के नाम पर पड़ा, जिन्होंने 1950 में इसका वर्णन किया था। यह अपने आप में कोई कैंसर नहीं है, लेकिन इसे “प्री-कैंसरस” यानी कैंसर-पूर्व अवस्था माना जाता है, क्योंकि इसमें भोजन नली के एक विशेष प्रकार के कैंसर, एसोफेजियल एडेनोकार्सिनोमा, का जोखिम बढ़ जाता है। हालाँकि बैरेट एसोफेगस से पीड़ित अधिकांश लोगों को कभी कैंसर नहीं होता।

बैरेट एसोफेगस क्या है?

भोजन नली की भीतरी परत में सामान्यतः “स्क्वैमस” कोशिकाएँ होती हैं। जब पेट का अम्ल बार-बार नली में ऊपर चढ़ता है, तो यह परत क्षतिग्रस्त होती रहती है। शरीर इस क्षति की भरपाई करने के लिए इन कोशिकाओं की जगह “कॉलमनर” कोशिकाएँ बनाने लगता है, जो आंत की परत में पाई जाती हैं और अम्ल को बेहतर सह सकती हैं। इस प्रक्रिया को चिकित्सा भाषा में “इंटेस्टाइनल मेटाप्लेसिया” कहते हैं।

यह बदलाव सामान्यतः भोजन नली के निचले हिस्से में, पेट से जुड़ने वाली जगह के पास होता है। बदलाव की लंबाई के आधार पर इसे दो भागों में बाँटा जाता है:

  • शॉर्ट-सेगमेंट बैरेट एसोफेगस: बदलाव 3 सेंटीमीटर से कम लंबाई में होता है।
  • लॉन्ग-सेगमेंट बैरेट एसोफेगस: बदलाव 3 सेंटीमीटर या उससे अधिक लंबाई में होता है। इसमें कैंसर का जोखिम अपेक्षाकृत अधिक माना जाता है।

बैरेट एसोफेगस के कारण

इसका मुख्य कारण गैस्ट्रोइसोफेजियल रिफ्लक्स डिजीज (GERD) है, यानी लंबे समय तक चलने वाली एसिड रिफ्लक्स की समस्या। भोजन नली और पेट के बीच एक मांसपेशीय वाल्व होता है, जिसे निचला एसोफेजियल स्फिंक्टर (LES) कहते हैं। जब यह वाल्व कमज़ोर पड़ता है या ठीक से बंद नहीं होता, तो पेट का अम्ल बार-बार ऊपर आकर नली की परत को जलाता है।

हालाँकि GERD से पीड़ित हर व्यक्ति को बैरेट एसोफेगस नहीं होता। अनुमान है कि GERD के रोगियों में से केवल एक छोटे प्रतिशत में ही यह स्थिति विकसित होती है। इसके जोखिम कारक इस प्रकार हैं:

  • लंबे समय से GERD: लगभग 5 से 10 वर्ष या अधिक समय तक रिफ्लक्स रहना।
  • उम्र: यह स्थिति मुख्यतः 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में देखी जाती है।
  • लिंग: पुरुषों में यह महिलाओं की तुलना में अधिक आम है।
  • मोटापा: विशेषकर पेट के आसपास की चर्बी (सेंट्रल ओबेसिटी) पेट पर दबाव बढ़ाकर रिफ्लक्स को बढ़ाती है।
  • धूम्रपान: तंबाकू का सेवन जोखिम बढ़ाता है।
  • पारिवारिक इतिहास: परिवार में बैरेट एसोफेगस या भोजन नली के कैंसर का इतिहास होना।
  • हायटस हर्निया: जिसमें पेट का ऊपरी भाग डायाफ्राम के ऊपर खिसक जाता है।
  • श्वेत नस्ल: कुछ अध्ययनों में इसे अन्य समूहों की तुलना में अधिक पाया गया है।

लक्षण

बैरेट एसोफेगस के अपने कोई विशिष्ट लक्षण नहीं होते। जो लक्षण दिखते हैं, वे आमतौर पर अंतर्निहित GERD के होते हैं:

  • बार-बार या रोज़ाना सीने में जलन (हार्टबर्न)
  • खट्टी डकारें आना या मुँह में अम्ल या खाने का वापस आना
  • निगलने में कठिनाई या खाना अटकने का एहसास
  • सीने या ऊपरी पेट में दर्द
  • लंबे समय तक रहने वाली खाँसी या गला बैठना
  • मुँह में खट्टा या कड़वा स्वाद

कई लोगों में, कुछ मामलों में, कोई लक्षण नहीं होते और जाँच किसी अन्य कारण से कराने पर ही इसका पता चलता है।

तुरंत डॉक्टर को दिखाएँ यदि:

  • निगलने में लगातार या बढ़ती हुई तकलीफ हो
  • बिना कारण वज़न तेज़ी से घट रहा हो
  • उल्टी में खून आए या मल काला (तारकोल जैसा) हो
  • बार-बार उल्टी हो या खाना निगलते समय दर्द हो
  • सीने में जलन दवाओं से भी ठीक न हो रही हो

ये चेतावनी संकेत हैं और इनकी जाँच में देरी नहीं करनी चाहिए।

निदान (जाँच)

बैरेट एसोफेगस की पुष्टि केवल जाँच से ही हो सकती है।

1. अपर GI एंडोस्कोपी: यह मुख्य जाँच है। इसमें एक पतली, लचीली नली, जिसके सिरे पर कैमरा और रोशनी होती है, मुँह के रास्ते भोजन नली में डाली जाती है। डॉक्टर नली की परत को सीधे देख सकते हैं। बैरेट एसोफेगस में परत सामान्य गुलाबी की जगह सैल्मन (हल्की नारंगी-लाल) रंग की और मखमली दिखती है। यह जाँच आमतौर पर बेहोशी की हल्की दवा देकर की जाती है।

2. बायोप्सी: एंडोस्कोपी के दौरान प्रभावित हिस्से से ऊतक के छोटे नमूने लिए जाते हैं। माइक्रोस्कोप के नीचे जाँच से पुष्टि होती है कि कोशिकाएँ आंत जैसी हैं या नहीं। साथ ही यह भी देखा जाता है कि उनमें “डिस्प्लेसिया” यानी असामान्य बदलाव हैं या नहीं।

डिस्प्लेसिया के स्तर:

  • नो डिस्प्लेसिया: कोशिकाओं में कोई असामान्य बदलाव नहीं।
  • लो-ग्रेड डिस्प्लेसिया: हल्के असामान्य बदलाव।
  • हाई-ग्रेड डिस्प्लेसिया: गंभीर असामान्य बदलाव, जिनमें कैंसर बनने का जोखिम सबसे अधिक होता है।

डिस्प्लेसिया का स्तर आगे का इलाज और निगरानी तय करने में सबसे अहम होता है।

क्या सभी को जाँच करानी चाहिए?

सभी GERD रोगियों के लिए एंडोस्कोपी ज़रूरी नहीं है। डॉक्टर आमतौर पर उन लोगों में स्क्रीनिंग की सलाह देते हैं जिनमें कई जोखिम कारक एक साथ हों, जैसे लंबे समय से GERD, 50 से अधिक उम्र, पुरुष होना, मोटापा, धूम्रपान या पारिवारिक इतिहास। यह निर्णय डॉक्टर व्यक्ति की स्थिति देखकर लेते हैं।

इलाज

इलाज का उद्देश्य दो है: एसिड रिफ्लक्स को नियंत्रित करना और कैंसर के जोखिम को कम करना या समय रहते पकड़ना। इलाज डिस्प्लेसिया के स्तर पर निर्भर करता है।

1. दवाइयाँ

  • प्रोटॉन पंप इन्हिबिटर (PPI): जैसे ओमेप्राज़ोल, पैंटोप्राज़ोल, एसोमेप्राज़ोल। ये पेट में अम्ल का निर्माण घटाते हैं और नली को ठीक होने का मौका देते हैं। इन्हें आमतौर पर लंबे समय तक डॉक्टर की सलाह से लिया जाता है।
  • H2 ब्लॉकर और एंटासिड: हल्के लक्षणों में सहायक हो सकते हैं।

दवाइयाँ स्वयं शुरू या बंद न करें; खुराक और अवधि डॉक्टर तय करते हैं।

2. एंडोस्कोपिक इलाज

लो-ग्रेड या हाई-ग्रेड डिस्प्लेसिया होने पर असामान्य कोशिकाओं को हटाने के लिए एंडोस्कोपी के माध्यम से कुछ प्रक्रियाएँ की जाती हैं:

  • रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन (RFA): गर्मी की ऊर्जा से असामान्य परत को नष्ट किया जाता है। उसकी जगह स्वस्थ सामान्य कोशिकाएँ उगती हैं।
  • एंडोस्कोपिक म्यूकोसल रिसेक्शन (EMR): उभरे हुए या संदिग्ध हिस्से को एंडोस्कोप से काटकर निकाला जाता है।
  • क्रायोथेरेपी: अत्यंत ठंडे पदार्थ से असामान्य कोशिकाओं को जमाकर नष्ट किया जाता है।

3. सर्जरी

  • फंडोप्लिकेशन: पेट के ऊपरी भाग को निचली भोजन नली के चारों ओर लपेटकर वाल्व को मज़बूत किया जाता है, ताकि रिफ्लक्स रुके। यह तब विचारणीय है जब दवाओं से नियंत्रण न हो।
  • एसोफेजेक्टोमी: बहुत कम मामलों में, जब कैंसर बन चुका हो या अन्य उपाय संभव न हों, तब भोजन नली का प्रभावित हिस्सा निकाला जाता है।

4. नियमित निगरानी (सर्विलांस)

जिन मरीज़ों में डिस्प्लेसिया नहीं है, उनमें भी समय-समय पर एंडोस्कोपी और बायोप्सी कराई जाती है। अंतराल बदलाव की लंबाई और डिस्प्लेसिया की स्थिति के अनुसार डॉक्टर तय करते हैं। नियमित निगरानी से कैंसर के शुरुआती संकेत जल्दी पकड़े जा सकते हैं, जब इलाज सबसे प्रभावी होता है।

जीवनशैली और खानपान में बदलाव

दवाओं के साथ जीवनशैली में सुधार रिफ्लक्स को काबू में रखने में बड़ी भूमिका निभाता है:

  • वज़न नियंत्रित रखें: अतिरिक्त वज़न घटाने से पेट पर दबाव कम होता है।
  • धूम्रपान और तंबाकू छोड़ें: यह रिफ्लक्स और कैंसर, दोनों के जोखिम को बढ़ाता है। शराब का सेवन भी सीमित या बंद करें।
  • छोटे और बार-बार भोजन करें: एक बार में भारी भोजन करने से बचें।
  • सोने से पहले न खाएँ: रात के खाने और सोने के बीच कम से कम 2 से 3 घंटे का अंतर रखें।
  • सिर की ओर से बिस्तर ऊँचा करें: सोते समय सिर और छाती को थोड़ा ऊँचा रखने से रात में रिफ्लक्स घटता है। इसके लिए बिस्तर के सिरहाने के पाए ऊँचे किए जा सकते हैं।
  • ट्रिगर खाद्य पदार्थों से बचें: बहुत तला-भुना, मसालेदार, चॉकलेट, कैफीन, खट्टे फल, टमाटर आधारित चीज़ें, पुदीना और कार्बोनेटेड पेय कुछ लोगों में रिफ्लक्स बढ़ाते हैं। हर व्यक्ति के ट्रिगर अलग हो सकते हैं।
  • तंग कपड़े न पहनें: कमर पर कसाव पेट पर दबाव डालता है।
  • तनाव कम करें: योग, प्राणायाम और टहलना सहायक हो सकते हैं।

जटिलताएँ

बैरेट एसोफेगस की सबसे गंभीर जटिलता एसोफेजियल एडेनोकार्सिनोमा है। फिर भी, इसका वास्तविक जोखिम अपेक्षाकृत कम है। बैरेट एसोफेगस वाले अधिकांश लोगों को जीवन भर कैंसर नहीं होता। जोखिम तब बढ़ता है जब डिस्प्लेसिया मौजूद हो, बदलाव का हिस्सा लंबा हो या अन्य जोखिम कारक जुड़े हों।

अन्य जटिलताओं में भोजन नली का सिकुड़ना (स्ट्रिक्चर), अल्सर और रक्तस्राव शामिल हैं।

रोकथाम

बैरेट एसोफेगस को पूरी तरह रोकने का कोई निश्चित तरीका नहीं है, लेकिन GERD को नियंत्रित रखकर जोखिम घटाया जा सकता है:

  • सीने की जलन को नज़रअंदाज़ न करें, खासकर यदि वह हफ्ते में कई बार हो या लंबे समय से चल रही हो।
  • स्वस्थ वज़न बनाए रखें और संतुलित, रेशेदार आहार लें।
  • धूम्रपान से दूर रहें।
  • डॉक्टर द्वारा दी गई दवाइयाँ नियमित रूप से और सही अवधि तक लें।
  • उच्च जोखिम वाले लोग डॉक्टर से स्क्रीनिंग के बारे में बात करें।

निष्कर्ष

बैरेट एसोफेगस लंबे समय तक चलने वाले एसिड रिफ्लक्स का एक संभावित परिणाम है। यह स्वयं कैंसर नहीं है, पर कैंसर का जोखिम थोड़ा बढ़ा देता है, इसलिए इसे गंभीरता से लेना ज़रूरी है। अच्छी बात यह है कि सही समय पर पहचान, नियमित निगरानी, दवाओं और जीवनशैली में सुधार से इसे अच्छी तरह नियंत्रित किया जा सकता है। यदि आपको वर्षों से सीने में जलन रहती है, निगलने में दिक्कत होती है या ऊपर बताए गए चेतावनी संकेत दिखते हैं, तो देर न करें और किसी गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से सलाह लें।

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