आर्गिल रॉबर्टसन प्यूपिल (Argyll Robertson Pupil)
| | |

आर्गिल रॉबर्टसन प्यूपिल (Argyll Robertson Pupil)

प्रस्तावना

मानव शरीर की आँख केवल देखने का अंग नहीं है, वह तंत्रिका तंत्र की स्थिति भी बताती है। चिकित्सा में कहा जाता है कि पुतली (pupil) मस्तिष्क की खिड़की है। पुतली के आकार और उसकी प्रतिक्रिया में आया बदलाव कई बार किसी गंभीर रोग का पहला संकेत होता है। ऐसा ही एक विशिष्ट और ऐतिहासिक संकेत है आर्गिल रॉबर्टसन प्यूपिल। इसमें पुतली प्रकाश पड़ने पर सिकुड़ती नहीं, लेकिन पास की वस्तु को देखने पर सिकुड़ जाती है। न्यूरोलॉजी और नेत्र विज्ञान की पढ़ाई में यह घटना बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इस संकेत का नाम स्कॉटलैंड के नेत्र चिकित्सक डगलस मूर आर्गिल रॉबर्टसन (Douglas Moray Cinnamond Argyll Robertson) के नाम पर पड़ा। एडिनबरा में कार्यरत इस चिकित्सक ने 1860 के दशक के अंत में (लगभग 1869) कुछ रोगियों में यह असामान्य पुतली-प्रतिक्रिया देखी और उसका वर्णन किया। उन्होंने पाया कि ये रोगी तंत्रिका-सिफलिस (न्यूरोसिफलिस) से पीड़ित थे। तब से यह संकेत सिफलिस के निदान की एक कड़ी बन गया।

पुतली की सामान्य प्रतिक्रिया

असामान्यता समझने के लिए पहले सामान्य प्रतिक्रिया को समझना ज़रूरी है। स्वस्थ आँख में दो मुख्य प्रतिवर्त (reflex) होते हैं।

1. प्रकाश प्रतिवर्त (Light Reflex): आँख पर तेज़ रोशनी पड़ने पर पुतली सिकुड़ जाती है। इसका मार्ग रेटिना से ऑप्टिक तंत्रिका, फिर मध्य मस्तिष्क के प्रीटेक्टल क्षेत्र, फिर एडिंगर-वेस्टफाल केंद्रक और अंत में ऑकुलोमोटर (तीसरी कपाल) तंत्रिका से होते हुए पुतली की पेशी तक जाता है।

2. समंजन या निकट प्रतिवर्त (Accommodation-Convergence Reflex): जब हम पास की वस्तु देखते हैं तो तीन क्रियाएँ एक साथ होती हैं: लेंस की मोटाई बढ़ती है, दोनों आँखें भीतर की ओर घूमती हैं और पुतली सिकुड़ती है।

आर्गिल रॉबर्टसन प्यूपिल क्या है?

यह वह अवस्था है जिसमें प्रकाश प्रतिवर्त लुप्त हो जाता है, पर निकट प्रतिवर्त सुरक्षित रहता है। इसे “प्रकाश-निकट विघटन” (Light-Near Dissociation) कहते हैं। सरल शब्दों में, टॉर्च की रोशनी डालने पर पुतली नहीं सिकुड़ती, पर मरीज़ से पास की उँगली देखने को कहें तो पुतली सिकुड़ जाती है।

इसे कभी-कभी मज़ाक में “प्रोस्टीट्यूट्स प्यूपिल” भी कहा गया, क्योंकि यह “accommodates but does not react” वाली स्थिति है। यह नाम अनुचित और अपमानजनक है, इसलिए आधुनिक चिकित्सा शिक्षा में इसका प्रयोग हतोत्साहित किया जाता है।

प्रमुख लक्षण और विशेषताएँ

आर्गिल रॉबर्टसन प्यूपिल की पहचान इन विशेषताओं से होती है:

  • छोटी पुतली (Miosis): पुतलियाँ सामान्य से छोटी होती हैं, अक्सर 1 से 2 मिमी की।
  • अनियमित आकार: पुतली पूरी तरह गोल नहीं होती, किनारे टेढ़े-मेढ़े हो सकते हैं।
  • दोनों आँखों में प्रभाव: यह प्रायः द्विपक्षीय होता है, हालाँकि दोनों आँखों में असमान भी हो सकता है।
  • प्रकाश पर प्रतिक्रिया का अभाव: सीधी और परोक्ष (consensual) दोनों प्रतिक्रियाएँ कमज़ोर या अनुपस्थित होती हैं।
  • निकट प्रतिक्रिया सामान्य: समंजन के समय पुतली भली-भाँति सिकुड़ती है।
  • दवा से कम फैलाव: एट्रोपिन जैसी दवाओं से पुतली कठिनाई से फैलती है।
  • दृष्टि प्रायः सामान्य: रोगी की देखने की क्षमता अक्सर बनी रहती है, इसलिए उसे स्वयं कोई शिकायत नहीं होती और यह संकेत केवल जाँच में पकड़ में आता है।
  • आइरिस में क्षीणता: कभी-कभी आइरिस के ऊतक में शोष (atrophy) या रंगहीनता दिखती है।

कारण

1. न्यूरोसिफलिस (सबसे प्रमुख कारण)

शास्त्रीय रूप से यह संकेत तृतीयक सिफलिस से जुड़ा है, विशेषकर टैबीज़ डोर्सैलिस और सामान्य पक्षाघात (General Paresis) से। ट्रेपोनेमा पैलिडम नामक जीवाणु जब तंत्रिका तंत्र को संक्रमित करता है, तो यह पुतली-विकृति उत्पन्न हो सकती है। सिफलिस को “महान अनुकरणकर्ता” कहा जाता है क्योंकि वह कई रोगों की नकल करता है, इसीलिए यह संकेत मिलने पर सिफलिस की जाँच अनिवार्य मानी जाती है।

2. अन्य कारण

सिफलिस के अतिरिक्त कुछ अन्य स्थितियों में भी ऐसी पुतली देखी जा सकती है, जैसे:

  • मधुमेह (डायबिटीज़) में तंत्रिका क्षति
  • दीर्घकालिक शराब का सेवन
  • सार्कोइडोसिस
  • लाइम रोग
  • मल्टीपल स्क्लेरोसिस
  • मस्तिष्क की कुछ सूजन संबंधी या अपक्षयी बीमारियाँ

इन स्थितियों में प्रायः “छद्म आर्गिल रॉबर्टसन प्यूपिल” (pseudo-Argyll Robertson pupil) शब्द का प्रयोग होता है।

रोग-तंत्र (Pathophysiology)

इसका सटीक कारण आज भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, पर सबसे स्वीकृत सिद्धांत यह है कि क्षति मध्य मस्तिष्क के पृष्ठ भाग (dorsal midbrain) में, प्रीटेक्टल क्षेत्र के पास होती है। प्रकाश प्रतिवर्त के तंतु इसी पृष्ठ भाग से गुज़रते हैं और यहाँ की क्षति से टूट जाते हैं। इसके विपरीत, निकट प्रतिवर्त के तंतु अधिक अग्र (ventral) मार्ग से जाते हैं और इसलिए बच जाते हैं। यही कारण है कि प्रकाश की प्रतिक्रिया जाती रहती है और निकट की प्रतिक्रिया बनी रहती है।

अन्य समान स्थितियों से अंतर

चिकित्सक को इसे अन्य पुतली-विकारों से अलग करना पड़ता है।

एडी की टॉनिक पुतली (Adie’s Tonic Pupil): इसमें पुतली प्रायः बड़ी और एकतरफा होती है, और निकट प्रतिक्रिया धीमी व लंबी चलने वाली होती है। आर्गिल रॉबर्टसन में पुतली छोटी और प्रतिक्रिया तेज़ होती है।

पैरिनॉड सिंड्रोम (Parinaud’s Syndrome): इसमें भी प्रकाश-निकट विघटन मिलता है, पर पुतलियाँ बड़ी या मध्यम होती हैं, साथ में ऊपर की ओर देखने में कठिनाई होती है। कारण प्रायः पीनियल क्षेत्र का ट्यूमर या हाइड्रोसिफेलस होता है।

ऑप्टिक तंत्रिका की क्षति: इसमें दृष्टि घटती है और सापेक्ष अभिवाही पुतली दोष मिलता है, जो आर्गिल रॉबर्टसन में नहीं होता।

निदान

निदान की शुरुआत नैदानिक परीक्षण से होती है। चिकित्सक अँधेरे कमरे में टॉर्च से प्रकाश प्रतिवर्त और निकट वस्तु से समंजन प्रतिवर्त की जाँच करता है। पुतली की माप और आकार भी दर्ज किया जाता है। इसके बाद कारण खोजने के लिए ये जाँचें कराई जाती हैं:

  • रक्त परीक्षण: VDRL या RPR (नॉन-ट्रेपोनेमल) तथा FTA-ABS या TPHA (ट्रेपोनेमल) परीक्षण
  • मेरुरज्जु द्रव (CSF) की जाँच: न्यूरोसिफलिस की पुष्टि हेतु
  • MRI या CT: मस्तिष्क की संरचनात्मक जाँच के लिए
  • अन्य जाँचें: मधुमेह, सार्कोइडोसिस, लाइम रोग आदि की पड़ताल

क्योंकि सिफलिस एचआईवी के साथ भी पाया जा सकता है, इसलिए एचआईवी की जाँच की भी सलाह दी जाती है।

उपचार

आर्गिल रॉबर्टसन प्यूपिल का कोई सीधा उपचार नहीं है। उपचार मूल कारण का किया जाता है।

  • न्यूरोसिफलिस में: मानक उपचार अंतःशिरा (IV) पेनिसिलिन G है, जो सामान्यतः 10 से 14 दिन तक दी जाती है। खुराक और अवधि चिकित्सक तय करता है। पेनिसिलिन से एलर्जी होने पर विकल्प चिकित्सक की देखरेख में चुने जाते हैं।
  • अनुवर्ती जाँच: उपचार के बाद निश्चित अंतराल पर रक्त और CSF की पुनः जाँच होती है ताकि संक्रमण के ठीक होने की पुष्टि हो सके।
  • अन्य कारणों में: मधुमेह पर नियंत्रण, शराब छोड़ना या संबंधित रोग का विशिष्ट उपचार।
  • साथी की जाँच: सिफलिस के मामले में यौन साथी की जाँच और उपचार भी आवश्यक है।

पूर्वानुमान (Prognosis)

उपचार से संक्रमण की प्रगति रुक जाती है और अन्य तंत्रिका-जटिलताओं से बचाव होता है। परंतु पुतली की असामान्यता प्रायः स्थायी रहती है, यानी इलाज के बाद भी प्रकाश-प्रतिक्रिया लौटती नहीं। इसलिए शीघ्र निदान बहुत महत्वपूर्ण है। समय पर उपचार न मिलने पर रोग दृष्टि-क्षय, चाल की गड़बड़ी, मनोभ्रंश और लकवे जैसी गंभीर जटिलताओं की ओर बढ़ सकता है।

चिकित्सा शिक्षा में महत्व

यह संकेत विद्यार्थियों को याद रखने के लिए एक प्रसिद्ध स्मृति-सूत्र से पढ़ाया जाता है: “ARP: Accommodation Reflex Present, Pupil doesn’t react”। यह इस बात का भी उत्कृष्ट उदाहरण है कि एक छोटा-सा नैदानिक संकेत पूरे तंत्रिका तंत्र की स्थिति का सुराग दे सकता है। यह भी सिखाता है कि हर असामान्य पुतली-प्रतिक्रिया की गहराई से जाँच होनी चाहिए।

सावधानियाँ और निष्कर्ष

पुतली में कोई भी असामान्य बदलाव, जैसे आकार का बिगड़ना, दोनों पुतलियों का असमान होना या रोशनी में प्रतिक्रिया न होना, नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। असुरक्षित यौन संबंधों से बचना, समय पर जाँच कराना और सिफलिस का प्रारंभिक अवस्था में उपचार करना इस स्थिति से बचाव के सबसे कारगर उपाय हैं।

आर्गिल रॉबर्टसन प्यूपिल दो सदी पुराना संकेत होने के बावजूद आज भी प्रासंगिक है। यह बताता है कि शरीर के संकेतों को ध्यान से पढ़ने की कला चिकित्सा का आधार है। छोटी, अनियमित, प्रकाश पर प्रतिक्रिया न देने वाली किंतु निकट दृष्टि पर सिकुड़ने वाली पुतली एक चिकित्सक को तुरंत यह सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं न्यूरोसिफलिस तो नहीं। इसलिए ऐसी पुतली मिलने पर तत्काल विशेषज्ञ से परामर्श और उचित जाँच अनिवार्य है।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *