एंगुलर चेलाइटिस (Angular Cheilitis): होठों के कोनों का फटना और घाव
परिचय
क्या आपके होठों के कोनों में दरारें पड़ गई हैं, जलन होती है या मुँह खोलते समय दर्द महसूस होता है? अगर हाँ, तो हो सकता है कि आप एंगुलर चेलाइटिस से जूझ रहे हों। यह एक आम त्वचा संबंधी समस्या है जिसमें मुँह के एक या दोनों कोनों की त्वचा लाल हो जाती है, सूज जाती है, फट जाती है और कभी-कभी उसमें घाव बन जाते हैं। आम बोलचाल में लोग इसे “होठों के कोनों का फटना” कहते हैं।
यह समस्या देखने में भले छोटी लगे, लेकिन खाने, बोलने, हँसने और जम्हाई लेने जैसी रोज़मर्रा की गतिविधियों में परेशानी पैदा कर सकती है। अच्छी बात यह है कि सही देखभाल और इलाज से यह पूरी तरह ठीक हो सकती है। इस लेख में हम इसके कारण, लक्षण, घरेलू उपाय, चिकित्सा उपचार और बचाव के तरीकों को विस्तार से समझेंगे।
एंगुलर चेलाइटिस क्या है?
“Angular” का अर्थ है कोण या कोना, और “Cheilitis” का अर्थ है होठों की सूजन। इस प्रकार एंगुलर चेलाइटिस का मतलब है मुँह के कोनों की सूजन। इसे पर्लेश (Perleche) या एंगुलर स्टोमेटाइटिस भी कहा जाता है।
मुँह के कोनों पर त्वचा बार-बार मुड़ती और खिंचती है। यहाँ लार जमा होने की संभावना भी अधिक रहती है। जब यह जगह लगातार गीली रहती है, तो त्वचा कमज़ोर होकर फट जाती है और कीटाणुओं के लिए प्रवेश द्वार बन जाती है। यह स्थिति किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकती है, लेकिन बच्चों, बुजुर्गों और डेंचर (नकली दाँत) पहनने वालों में अधिक देखी जाती है।
एंगुलर चेलाइटिस के प्रमुख कारण
इस समस्या के पीछे एक नहीं, बल्कि कई कारण हो सकते हैं।
1. फंगल और बैक्टीरियल संक्रमण
सबसे आम कारण कैंडिडा (Candida) नामक फंगस का संक्रमण है, जो नम वातावरण में तेज़ी से पनपता है। इसके अलावा स्टैफिलोकोकस ऑरियस (Staphylococcus aureus) जैसे बैक्टीरिया भी इसका कारण बन सकते हैं। कई बार दोनों संक्रमण एक साथ होते हैं।
2. बार-बार होंठ चाटने की आदत
होंठ चाटने से कुछ देर के लिए राहत मिलती है, लेकिन लार के सूखने पर त्वचा और अधिक रूखी हो जाती है। लार में मौजूद एंजाइम त्वचा को नुकसान भी पहुँचाते हैं। बच्चों में यह आदत इस समस्या का बड़ा कारण है।
3. पोषक तत्वों की कमी
शरीर में कुछ विटामिन और खनिजों की कमी से मुँह के कोनों की त्वचा कमज़ोर हो जाती है। इनमें शामिल हैं:
- विटामिन B2 (राइबोफ्लेविन)
- विटामिन B3 (नियासिन)
- विटामिन B6 और B12
- फोलिक एसिड
- आयरन (लौह तत्व)
- ज़िंक
शाकाहारी लोगों में विटामिन B12 और आयरन की कमी अपेक्षाकृत आम है, इसलिए उन्हें अपने आहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
4. डेंचर या दाँतों की समस्याएँ
ढीले या गलत माप के डेंचर से मुँह के कोनों पर सिलवटें बन जाती हैं, जहाँ लार जमा होती रहती है। दाँत गिरने या जबड़े की बनावट बदलने से भी यही स्थिति बनती है। ब्रेसेस पहनने वाले बच्चों और किशोरों में भी यह दिख सकती है।
5. उम्र के साथ त्वचा में बदलाव
बढ़ती उम्र में मुँह के आसपास की त्वचा ढीली हो जाती है और कोनों पर गहरी सिलवटें बन जाती हैं। इनमें नमी रुकती है, जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ता है।
6. अँगूठा चूसना और पैसिफायर का उपयोग
छोटे बच्चों में अँगूठा चूसने, पैसिफायर या बोतल के निप्पल के अधिक इस्तेमाल से मुँह के कोने लगातार गीले रहते हैं।
7. कुछ चिकित्सीय स्थितियाँ
- मधुमेह (डायबिटीज): ब्लड शुगर अधिक होने पर संक्रमण का खतरा बढ़ता है।
- कमज़ोर प्रतिरक्षा तंत्र: किसी बीमारी या दवा के कारण रोग-प्रतिरोधक क्षमता घटने पर।
- एनीमिया (खून की कमी)।
- एक्ज़िमा या एटोपिक डर्मेटाइटिस जैसी त्वचा की बीमारियाँ।
- मुँह सूखने की समस्या (ड्राई माउथ): कुछ दवाओं या स्थितियों के कारण।
8. एलर्जी और जलन
टूथपेस्ट, लिप बाम, लिपस्टिक, माउथवॉश या कुछ खाद्य पदार्थों से होने वाली एलर्जी भी कोनों में सूजन पैदा कर सकती है।
9. मौसम और जीवनशैली
सर्दियों में शुष्क हवा और ठंड से त्वचा फटती है। धूम्रपान, तंबाकू का सेवन और पर्याप्त पानी न पीना भी जोखिम बढ़ाते हैं।
लक्षण: कैसे पहचानें?
एंगुलर चेलाइटिस के लक्षण हल्के से लेकर गंभीर तक हो सकते हैं:
- मुँह के कोनों में लालिमा और सूजन
- त्वचा का फटना या दरारें पड़ना
- जलन, खुजली और दर्द
- मुँह खोलने पर खिंचाव या चुभन
- कोनों से खून आना
- पपड़ी जमना या सफेद/पीली परत बनना
- छाले या घाव का बनना
- कभी-कभी मवाद निकलना (बैक्टीरियल संक्रमण में)
- त्वचा का रूखापन और कठोर होना
यह एक या दोनों तरफ हो सकती है। अगर संक्रमण फंगल है, तो कोनों पर सफेद या लाल चकत्ते दिख सकते हैं।
निदान (डायग्नोसिस)
अधिकतर मामलों में डॉक्टर केवल देखकर ही इसकी पहचान कर लेते हैं। लेकिन अगर समस्या बार-बार लौटती है या ठीक नहीं होती, तो डॉक्टर कुछ जाँचें करवा सकते हैं:
- संक्रमण के प्रकार का पता लगाने के लिए स्वैब टेस्ट
- खून की जाँच (हीमोग्लोबिन, विटामिन B12, आयरन, ब्लड शुगर)
- एलर्जी का पता लगाने के लिए पैच टेस्ट
इलाज और उपचार
इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि समस्या का मूल कारण क्या है।
चिकित्सा उपचार
1. एंटीफंगल क्रीम: फंगल संक्रमण होने पर क्लोट्रिमेज़ोल, माइकोनाज़ोल या केटोकोनाज़ोल जैसी क्रीम दी जाती हैं।
2. एंटीबैक्टीरियल मरहम: बैक्टीरियल संक्रमण में म्यूपिरोसिन जैसे मरहम उपयोगी होते हैं।
3. हल्की स्टेरॉयड क्रीम: सूजन और जलन कम करने के लिए डॉक्टर कभी-कभी हाइड्रोकॉर्टिसोन की हल्की क्रीम देते हैं, अक्सर एंटीफंगल के साथ मिलाकर। इसे केवल डॉक्टर की सलाह पर ही और सीमित समय के लिए लगाना चाहिए।
4. सप्लीमेंट्स: अगर जाँच में विटामिन या आयरन की कमी निकले, तो डॉक्टर उचित सप्लीमेंट सुझाते हैं।
5. दंत चिकित्सक से परामर्श: डेंचर ढीला हो तो उसे ठीक करवाना या बदलवाना ज़रूरी है। साथ ही डेंचर को रोज़ साफ़ करना और रात में निकालकर रखना चाहिए।
घरेलू देखभाल के उपाय
हल्के मामलों में ये उपाय राहत दे सकते हैं, पर इन्हें डॉक्टरी इलाज का विकल्प न समझें:
- पेट्रोलियम जेली (वैसलीन): कोनों पर लगाने से नमी से सुरक्षा मिलती है और त्वचा को ठीक होने का मौका मिलता है।
- नारियल तेल: इसमें हल्के रोगाणुरोधी गुण माने जाते हैं और यह त्वचा को नरम रखता है। एलर्जी न हो तो ही लगाएँ।
- शहद: शुद्ध शहद की पतली परत लगाने से कुछ लोगों को आराम मिलता है।
- एलोवेरा जेल: ठंडक और राहत देता है।
- कोनों को साफ़ और सूखा रखें: हल्के गुनगुने पानी से धोकर मुलायम कपड़े से थपथपाकर सुखाएँ।
सावधानी: नींबू, टूथपेस्ट या किसी भी तेज़ चीज़ को घाव पर न लगाएँ, इससे जलन और बढ़ सकती है।
आहार: क्या खाएँ?
संतुलित पोषण इस समस्या के उपचार और बचाव में अहम भूमिका निभाता है।
- विटामिन B12 और B2: दूध, दही, पनीर, अंडे, मछली
- आयरन: पालक, चुकंदर, अनार, गुड़, दालें, राजमा, चना
- ज़िंक: कद्दू के बीज, तिल, काजू, बादाम, साबुत अनाज
- फोलिक एसिड: हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, दालें, खट्टे फल
- विटामिन C: आँवला, संतरा, नींबू, अमरूद (आयरन के अवशोषण में मदद करता है)
पर्याप्त पानी पिएँ और ज़्यादा मीठे व प्रोसेस्ड भोजन से बचें, क्योंकि अधिक शुगर फंगस को बढ़ावा दे सकती है।
बचाव के तरीके
- होंठ चाटने की आदत छोड़ें। इसकी जगह लिप बाम का उपयोग करें।
- होठों को मॉइस्चराइज़ रखें, खासकर सर्दियों में।
- संतुलित आहार लें और ज़रूरत पड़े तो जाँच करवाकर कमी पूरी करें।
- डेंचर की सफ़ाई और फिटिंग का ध्यान रखें।
- मुँह की स्वच्छता बनाए रखें: दिन में दो बार ब्रश करें और नियमित रूप से दंत चिकित्सक को दिखाएँ।
- बच्चों में अँगूठा चूसने या पैसिफायर की आदत धीरे-धीरे छुड़वाएँ।
- लार को कोनों में जमने न दें, खाने के बाद मुँह पोंछ लें।
- डायबिटीज को नियंत्रण में रखें अगर आपको यह समस्या है।
- एलर्जी पैदा करने वाले उत्पाद पहचानें और उनसे बचें।
- धूम्रपान और तंबाकू छोड़ें।
ठीक होने में कितना समय लगता है?
सही इलाज शुरू करने पर आमतौर पर एक से दो हफ्ते में आराम मिल जाता है। लेकिन अगर मूल कारण (जैसे पोषण की कमी या डेंचर की समस्या) को दूर न किया जाए, तो यह बार-बार लौट सकती है। इसलिए केवल क्रीम लगाकर रुक जाना काफ़ी नहीं है, कारण की पहचान और उसका समाधान ज़रूरी है।
डॉक्टर को कब दिखाएँ?
निम्न स्थितियों में देर न करें:
- घरेलू उपायों से एक से दो हफ्ते में सुधार न हो
- समस्या बार-बार लौट रही हो
- दर्द बहुत तेज़ हो या खून लगातार आ रहा हो
- मवाद निकल रहा हो या सूजन फैल रही हो
- बुखार या थकान जैसे अन्य लक्षण भी हों
- आपको डायबिटीज हो या प्रतिरक्षा तंत्र कमज़ोर हो
- बच्चे में यह समस्या हो और ठीक न हो रही हो
आप त्वचा रोग विशेषज्ञ (डर्मेटोलॉजिस्ट), सामान्य चिकित्सक या दंत चिकित्सक से सलाह ले सकते हैं।
आम भ्रांतियाँ
भ्रांति 1: यह सिर्फ़ ठंड की वजह से होता है।
सच: ठंड एक कारण हो सकती है, पर संक्रमण, पोषण की कमी और अन्य कारण भी अहम हैं।
भ्रांति 2: यह छूने से फैलती है।
सच: यह आमतौर पर संक्रामक बीमारी नहीं है, हालाँकि मुँह के संक्रमण के कीटाणु अन्य जगहों पर फैल सकते हैं, इसलिए स्वच्छता रखें।
भ्रांति 3: सिर्फ़ विटामिन की गोली खाने से ठीक हो जाएगी।
सच: अगर संक्रमण मौजूद है, तो उसका इलाज भी ज़रूरी है।
निष्कर्ष
एंगुलर चेलाइटिस भले ही गंभीर बीमारी न हो, पर यह बेहद असुविधाजनक और कष्टदायक हो सकती है। इसके पीछे संक्रमण, पोषण की कमी, होंठ चाटने की आदत, डेंचर की समस्या या किसी अंतर्निहित बीमारी जैसे कई कारण हो सकते हैं। इसलिए सही इलाज के लिए कारण की पहचान सबसे ज़रूरी कदम है।
मुँह के कोनों को साफ़ और सूखा रखना, संतुलित आहार लेना, होंठ चाटने की आदत छोड़ना और मुँह की स्वच्छता का ध्यान रखना इस समस्या से बचाव के सबसे कारगर उपाय हैं। अगर समस्या लंबे समय तक बनी रहे या बार-बार लौटे, तो स्वयं इलाज करने के बजाय किसी योग्य डॉक्टर से परामर्श अवश्य लें।
