रिलैप्सिंग पॉलीकॉन्ड्राइटिस (Relapsing Polychondritis - कार्टिलेज की सूजन)
| |

रिलैप्सिंग पॉलीकॉन्ड्राइटिस: कान और नाक के कार्टिलेज की सूजन

परिचय

हमारे शरीर में कार्टिलेज, यानी उपास्थि, एक लचीला और मजबूत ऊतक है जो कान, नाक, श्वास नली, जोड़ों और पसलियों को आकार और सहारा देता है। जब प्रतिरक्षा तंत्र गलती से इसी कार्टिलेज पर हमला करने लगता है, तो उसमें बार-बार सूजन आती है। इस दुर्लभ बीमारी को रिलैप्सिंग पॉलीकॉन्ड्राइटिस (Relapsing Polychondritis, RP) कहा जाता है।

“रिलैप्सिंग” का अर्थ है बार-बार लौटने वाली और “पॉलीकॉन्ड्राइटिस” का अर्थ है कई जगहों के कार्टिलेज की सूजन। यानी यह रोग एक बार ठीक होने के बाद फिर से उभर सकता है और शरीर के अलग-अलग हिस्सों को प्रभावित कर सकता है। यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की रक्षा प्रणाली अपने ही ऊतकों को दुश्मन समझ बैठती है।

यह कितनी आम है?

यह बीमारी बहुत दुर्लभ है। अनुमान है कि प्रति दस लाख आबादी में लगभग तीन से चार नए मामले हर साल सामने आते हैं। यह आमतौर पर 40 से 60 वर्ष की उम्र के बीच शुरू होती है, हालांकि बच्चों और बुजुर्गों में भी देखी जा सकती है। पुरुषों और महिलाओं में इसकी संभावना लगभग समान मानी जाती है। यह किसी खास जाति या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। दुर्लभ होने के कारण अक्सर इसका निदान देर से होता है, कभी-कभी सालों बाद।

कारण

इस रोग का सटीक कारण अभी पूरी तरह ज्ञात नहीं है। वर्तमान जानकारी के अनुसार:

  • ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया: प्रतिरक्षा तंत्र कार्टिलेज में मौजूद कोलेजन (विशेषकर टाइप II कोलेजन) और अन्य प्रोटीनों के विरुद्ध एंटीबॉडी बनाता है।
  • आनुवंशिक झुकाव: कुछ अध्ययनों में HLA-DR4 नामक जीन प्रकार का संबंध देखा गया है, पर यह बीमारी सीधे वंशानुगत नहीं मानी जाती।
  • अन्य ऑटोइम्यून रोगों से संबंध: लगभग एक-तिहाई मरीजों में कोई और ऑटोइम्यून या रक्त संबंधी रोग भी पाया जाता है, जैसे रूमेटॉइड आर्थराइटिस, ल्यूपस, वैस्कुलाइटिस या सूजन वाली आंत की बीमारियाँ। कुछ मरीजों में माइलोडिस्प्लास्टिक सिंड्रोम (MDS) जैसी रक्त की बीमारी भी जुड़ी पाई गई है।
  • संभावित ट्रिगर: संक्रमण या कार्टिलेज को चोट जैसे कारक रोग को शुरू करने में भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन यह सिद्ध नहीं है।

यह बीमारी संक्रामक नहीं है, यानी एक व्यक्ति से दूसरे में नहीं फैलती।

लक्षण

लक्षण इस पर निर्भर करते हैं कि कार्टिलेज का कौन-सा हिस्सा प्रभावित है। रोग अचानक शुरू हो सकता है और कुछ दिनों से लेकर हफ्तों तक चल सकता है।

1. कान

कान की सूजन सबसे आम और पहचान योग्य लक्षण है, जो लगभग 80-90% मरीजों में दिखता है।

  • कान के बाहरी हिस्से (पिन्ना) का अचानक लाल, गर्म, सूजा हुआ और बहुत दर्दनाक हो जाना
  • कान की लोब (कान की नरम निचली गद्दी) आमतौर पर प्रभावित नहीं होती, क्योंकि उसमें कार्टिलेज नहीं होता। यह इस रोग की एक खास पहचान है
  • बार-बार सूजन के बाद कान का मुड़ जाना, मुरझाना या “फूलगोभी जैसा” आकार लेना
  • भीतरी कान प्रभावित होने पर सुनने में कमी, चक्कर आना, कान में आवाज़ गूँजना (टिनिटस) और संतुलन बिगड़ना

2. नाक

  • नाक के पुल पर दर्द और सूजन
  • नाक बहना, बंद रहना या नाक से खून आना
  • लंबे समय में नाक के पुल का धँस जाना, जिसे “सैडल नोज़ डिफॉर्मिटी” कहते हैं

3. श्वसन तंत्र

यह सबसे गंभीर पहलू है, क्योंकि श्वास नली में कार्टिलेज के छल्ले होते हैं।

  • आवाज़ में भारीपन या बैठना
  • खाँसी, साँस लेते समय घरघराहट या साँस फूलना
  • गले के सामने दर्द
  • गंभीर मामलों में श्वास नली संकरी या कमज़ोर होकर साँस लेने में गंभीर रुकावट पैदा कर सकती है

4. जोड़

  • एक या कई जोड़ों में दर्द और सूजन, जो अक्सर घुटनों, कलाइयों, उँगलियों और पसलियों के जोड़ों में होती है
  • यह सूजन आमतौर पर जोड़ को स्थायी रूप से खराब नहीं करती, पर दर्द काफी हो सकता है

5. आँखें

  • आँख की लाली, दर्द, प्रकाश से चुभन
  • स्क्लेराइटिस, एपिस्क्लेराइटिस, यूवाइटिस या कंजंक्टिवाइटिस
  • धुंधला दिखना और गंभीर मामलों में दृष्टि को खतरा

6. हृदय और रक्त वाहिकाएँ

  • हृदय के वाल्व, विशेषकर महाधमनी (aortic) वाल्व, का प्रभावित होना
  • महाधमनी में फैलाव (एन्यूरिज़्म) या वैस्कुलाइटिस
  • यह पहलू कम आम है, पर जानलेवा हो सकता है

7. सामान्य लक्षण

बुखार, थकान, वज़न घटना और सामान्य कमज़ोरी भी हो सकती है। त्वचा पर चकत्ते, गाँठें या किडनी की समस्याएँ भी कुछ मरीजों में दिखती हैं।

निदान कैसे होता है?

इस रोग के लिए कोई एक निर्णायक जाँच नहीं है, इसलिए निदान मुख्यतः लक्षणों और जाँचों के संयोजन पर आधारित होता है। डॉक्टर आमतौर पर पुराने नैदानिक मानदंडों का सहारा लेते हैं, जिनमें कान, नाक, श्वास नली के कार्टिलेज की सूजन, जोड़ों का दर्द, आँख की सूजन और सुनने या संतुलन की समस्याएँ शामिल हैं। आमतौर पर निम्न में से कई विशेषताएँ मौजूद होने पर निदान की पुष्टि की जाती है।

संभावित जाँचें:

  • रक्त जाँच: ESR और CRP जैसे सूजन के संकेतक बढ़े हुए मिल सकते हैं। रक्त की कमी (एनीमिया) भी हो सकती है। ऑटोइम्यून एंटीबॉडी जाँच अन्य रोगों को अलग करने में मदद करती है।
  • बायोप्सी: प्रभावित कान या नाक के कार्टिलेज का छोटा नमूना लेकर सूक्ष्मदर्शी से जाँच
  • इमेजिंग: छाती और गर्दन का सीटी स्कैन, श्वास नली की स्थिति देखने के लिए। एमआरआई और PET-CT से सूजन वाले हिस्से पहचाने जा सकते हैं।
  • पल्मोनरी फ़ंक्शन टेस्ट: फेफड़ों और साँस के प्रवाह की क्षमता नापने के लिए
  • ब्रोंकोस्कोपी: श्वास नली को सीधे देखने के लिए
  • इकोकार्डियोग्राम: हृदय वाल्व की जाँच
  • ऑडियोमेट्री: सुनने की क्षमता का मूल्यांकन

चूँकि लक्षण अन्य रोगों जैसे ग्रैन्युलोमैटोसिस विद पॉलीएंजाइटिस, संक्रमण या चोट से मिलते-जुलते हो सकते हैं, इसलिए इन्हें अलग करना महत्वपूर्ण है।

इलाज

इस रोग का कोई स्थायी इलाज नहीं है, पर उचित उपचार से सूजन पर नियंत्रण पाया जा सकता है और जटिलताओं को रोका जा सकता है। उपचार रोग की गंभीरता और प्रभावित अंगों पर निर्भर करता है।

हल्के मामले

  • NSAIDs (जैसे इबुप्रोफेन, नेप्रोक्सेन): हल्के दर्द और सूजन के लिए
  • डैप्सोन या कोल्चिसिन: कुछ मरीजों में चिकित्सक की सलाह से

मध्यम से गंभीर मामले

  • कॉर्टिकोस्टेरॉइड (जैसे प्रेडनिसोलोन): यह उपचार की मुख्य दवा है। अचानक रोग उभरने पर उच्च खुराक दी जाती है और फिर धीरे-धीरे घटाई जाती है
  • इम्यूनोसप्रेसेंट दवाएँ: मेथोट्रेक्सेट, एज़ाथायोप्रिन, साइक्लोफॉस्फेमाइड, माइकोफेनोलेट, साइक्लोस्पोरिन। ये स्टेरॉइड की मात्रा कम करने और रोग को नियंत्रित रखने में मदद करती हैं
  • बायोलॉजिक दवाएँ: टीएनएफ-अल्फा अवरोधक (जैसे इन्फ्लिक्सिमैब, एडालिमुमैब), टोसिलिज़ुमैब, रिटुक्सिमैब और अन्य। ये उन मरीजों में उपयोगी हो सकती हैं जिन पर पारंपरिक दवाएँ पर्याप्त असर नहीं करतीं

शल्य और विशेष प्रक्रियाएँ

  • श्वास नली अत्यधिक संकरी होने पर स्टेंट डालना या ट्रैकियोस्टॉमी करनी पड़ सकती है
  • हृदय वाल्व या महाधमनी की गंभीर क्षति में सर्जरी आवश्यक हो सकती है
  • नाक की बनावट बिगड़ने पर पुनर्निर्माण सर्जरी तभी की जाती है जब रोग शांत अवस्था में हो

उपचार लंबे समय तक चल सकता है, इसलिए दवाओं के दुष्प्रभाव जैसे हड्डियों की कमज़ोरी, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और संक्रमण का खतरा, पर नियमित निगरानी ज़रूरी है।

रोग का पूर्वानुमान

पिछले दशकों में उपचार की प्रगति से रोगियों की स्थिति काफ़ी बेहतर हुई है। ज़्यादातर मरीज़ सही इलाज से लंबा जीवन जी सकते हैं। फिर भी रोग का स्वरूप हर व्यक्ति में अलग होता है। कुछ में यह हल्का और रुक-रुक कर उभरता है, जबकि कुछ में यह तेज़ी से बढ़ता है।

मुख्य खतरे ये हैं:

  • श्वसन तंत्र की रुकावट या संक्रमण
  • हृदय वाल्व और रक्त वाहिकाओं की समस्याएँ
  • दृष्टि या सुनने की स्थायी क्षति
  • साथ में किसी अन्य गंभीर बीमारी, जैसे MDS, का होना

जल्दी निदान और नियमित फॉलो-अप से जटिलताओं का जोखिम काफी कम हो जाता है।

रोज़मर्रा की देखभाल और सावधानियाँ

रोग के साथ जीना एक लंबी प्रक्रिया है। कुछ व्यावहारिक सुझाव:

  1. नियमित चिकित्सा जाँच: रुमेटोलॉजिस्ट के साथ समय-समय पर मिलना। ज़रूरत पड़ने पर ईएनटी, नेत्र रोग, फेफड़े और हृदय के विशेषज्ञ भी शामिल हों।
  2. दवाएँ नियमित लें: स्टेरॉइड या अन्य दवाएँ अचानक बंद न करें, इससे रोग भड़क सकता है।
  3. लक्षणों पर नज़र रखें: आवाज़ बैठना, साँस लेने में परेशानी, कान या आँख में अचानक दर्द और लाली दिखें तो तुरंत डॉक्टर से मिलें।
  4. संक्रमण से बचाव: इम्यूनोसप्रेसेंट लेने वालों को हाथ धोने, भीड़ से बचने और उचित टीकाकरण (डॉक्टर की सलाह से) पर ध्यान देना चाहिए।
  5. हड्डियों की सुरक्षा: स्टेरॉइड लेने वालों के लिए कैल्शियम, विटामिन डी और हल्का व्यायाम लाभदायक है, पर पूरक डॉक्टर की सलाह से लें।
  6. संतुलित आहार: पौष्टिक भोजन, कम नमक और नियंत्रित शर्करा।
  7. कान और नाक की सुरक्षा: चोट से बचें, क्योंकि प्रभावित कार्टिलेज नाज़ुक हो सकता है।
  8. मानसिक स्वास्थ्य: दीर्घकालिक बीमारी तनाव और चिंता ला सकती है। परिवार का साथ, काउंसलिंग या सहायता समूह मददगार होते हैं।

कब तुरंत डॉक्टर के पास जाएँ?

निम्न स्थितियों में बिना देर किए चिकित्सा सहायता लें:

  • साँस लेने में अचानक कठिनाई या घरघराहट
  • आवाज़ का अचानक बदलना
  • अचानक सुनाई कम होना या तेज़ चक्कर आना
  • आँख में तेज़ दर्द या दृष्टि में कमी
  • सीने में दर्द या धड़कन में गड़बड़ी

निष्कर्ष

रिलैप्सिंग पॉलीकॉन्ड्राइटिस एक दुर्लभ और जटिल ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें कान, नाक, श्वास नली, जोड़ और आँखों जैसे कई अंग प्रभावित हो सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि लक्षण अक्सर आम समस्याओं जैसे दिखते हैं, जिससे निदान में देरी हो जाती है। यदि कान में बार-बार दर्दनाक लाली-सूजन (लोब को छोड़कर), नाक के पुल में दर्द, आवाज़ में बदलाव या जोड़ों और आँखों की सूजन जैसे लक्षण बार-बार उभरें, तो किसी रुमेटोलॉजिस्ट से सलाह लेना उचित है।

सही समय पर निदान, उपयुक्त दवाओं और नियमित निगरानी से इस रोग को काफ़ी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है और मरीज़ सामान्य, सक्रिय जीवन जी सकते हैं। जागरूकता और समय पर इलाज ही इस बीमारी से बचाव और बेहतर जीवन की कुंजी है।

नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और किसी योग्य चिकित्सक की सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी लक्षण के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श अवश्य करें।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *