गैस्ट्रिक कैंसर (पेट का कैंसर): कारण, लक्षण, जाँच, इलाज और बचाव
परिचय
पेट का कैंसर, जिसे चिकित्सा भाषा में गैस्ट्रिक कैंसर या स्टमक कैंसर कहा जाता है, दुनिया भर में सबसे आम कैंसरों में गिना जाता है। यह तब होता है जब पेट की भीतरी परत की कोशिकाएँ असामान्य रूप से और अनियंत्रित ढंग से बढ़ने लगती हैं और धीरे-धीरे गाँठ (ट्यूमर) का रूप ले लेती हैं। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती अवस्था में इसके लक्षण बहुत हल्के होते हैं और अक्सर आम अपच या एसिडिटी जैसे लगते हैं। इसी कारण कई मरीज़ों में इसका पता तब चलता है जब बीमारी काफ़ी आगे बढ़ चुकी होती है।
पेट की बनावट और कैंसर कैसे शुरू होता है
पेट भोजन नली (इसोफेगस) और छोटी आँत के बीच स्थित एक थैलीनुमा अंग है, जो भोजन को पचाने में मदद करता है। इसकी दीवार में कई परतें होती हैं। कैंसर आमतौर पर सबसे भीतरी परत (म्यूकोसा) की ग्रंथि कोशिकाओं से शुरू होता है और समय के साथ बाहरी परतों, आसपास के लिम्फ नोड्स और फिर लिवर, फेफड़ों या पेट की झिल्ली जैसे दूर के अंगों तक फैल सकता है।
गैस्ट्रिक कैंसर के प्रमुख प्रकार
- एडेनोकार्सिनोमा: लगभग 90 से 95 प्रतिशत मामले इसी प्रकार के होते हैं। यह पेट की ग्रंथि कोशिकाओं से बनता है।
- गैस्ट्रिक लिम्फोमा: यह पेट की दीवार के प्रतिरक्षा ऊतकों में शुरू होता है और अपेक्षाकृत कम पाया जाता है।
- गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल स्ट्रोमल ट्यूमर (GIST): यह पेट की दीवार की विशेष कोशिकाओं से बनता है।
- न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर: ये हार्मोन बनाने वाली कोशिकाओं से उत्पन्न होते हैं और दुर्लभ हैं।
प्रमुख कारण और जोखिम कारक
पेट के कैंसर का कोई एक निश्चित कारण नहीं है। कई कारक मिलकर इसका जोखिम बढ़ाते हैं।
1. हेलिकोबैक्टर पाइलोरी (H. pylori) संक्रमण: यह जीवाणु पेट में लंबे समय तक रहकर पुरानी सूजन और अल्सर पैदा कर सकता है। इसे पेट के कैंसर का सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारक माना जाता है।
2. खान-पान की आदतें: बहुत अधिक नमक वाला भोजन, अचार, नमक में संरक्षित या धुएँ में पकाया हुआ भोजन, प्रोसेस्ड मीट और फल-सब्ज़ियों की कमी जोखिम बढ़ाती है।
3. धूम्रपान और तंबाकू: सिगरेट, बीड़ी और तंबाकू चबाने से जोखिम काफ़ी बढ़ जाता है। अत्यधिक शराब का सेवन भी हानिकारक है।
4. उम्र और लिंग: यह रोग अधिकतर 50 वर्ष से ऊपर के लोगों में होता है और पुरुषों में महिलाओं की तुलना में अधिक देखा जाता है।
5. पारिवारिक इतिहास और आनुवंशिक कारण: यदि परिवार में किसी निकट रिश्तेदार को पेट का कैंसर रहा हो, तो जोखिम बढ़ जाता है। कुछ वंशानुगत स्थितियाँ, जैसे CDH1 जीन में बदलाव, भी इसका कारण बन सकती हैं।
6. पेट की पुरानी बीमारियाँ: लंबे समय से चली आ रही गैस्ट्राइटिस, पेट की परत का पतला होना (एट्रोफिक गैस्ट्राइटिस), पेट के पॉलिप्स और पर्निशियस एनीमिया जोखिम बढ़ाते हैं। पहले पेट की सर्जरी हो चुकी हो, तब भी जोखिम कुछ अधिक रहता है।
7. मोटापा: अधिक वज़न और मोटापा, ख़ासकर पेट के ऊपरी हिस्से के कैंसर का जोखिम बढ़ा सकता है।
लक्षण: किन संकेतों को नज़रअंदाज़ न करें
शुरुआती चरण में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते। जब लक्षण दिखते हैं, तो वे इस प्रकार हो सकते हैं:
- पेट के ऊपरी हिस्से में लगातार दर्द या बेचैनी
- बार-बार अपच, सीने में जलन या खट्टी डकारें, जो दवा से भी ठीक न हों
- थोड़ा सा खाने पर ही पेट भरा हुआ महसूस होना
- भूख में कमी और बिना कारण वज़न घटना
- मतली और बार-बार उल्टी होना
- निगलने में कठिनाई, ख़ासकर जब ट्यूमर पेट के ऊपरी भाग में हो
- मल का काला होना (टार जैसा) या उल्टी में खून आना
- कमज़ोरी, थकान और ख़ून की कमी (एनीमिया)
- पेट में सूजन या पानी भरना (बीमारी बढ़ने पर)
इनमें से कई लक्षण सामान्य पेट की समस्याओं में भी होते हैं। लेकिन यदि ये दो से तीन हफ़्ते से अधिक समय तक बने रहें, बढ़ते जाएँ या वज़न घटने और ख़ून की कमी के साथ हों, तो डॉक्टर से जाँच कराना ज़रूरी है।
निदान: जाँच कैसे होती है
1. अपर GI एंडोस्कोपी: यह सबसे महत्वपूर्ण जाँच है। इसमें एक पतली लचीली नली, जिसके सिरे पर कैमरा होता है, मुँह के रास्ते पेट में डाली जाती है। डॉक्टर सीधे पेट की भीतरी परत देखते हैं।
2. बायोप्सी: संदिग्ध हिस्से से ऊतक का छोटा टुकड़ा लेकर माइक्रोस्कोप से जाँचा जाता है। कैंसर की पुष्टि इसी से होती है।
3. इमेजिंग जाँचें: CT स्कैन, PET-CT, एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड (EUS) और कभी-कभी MRI से यह पता लगाया जाता है कि कैंसर कितना फैला है।
4. डायग्नोस्टिक लेप्रोस्कोपी: कुछ मामलों में पेट की झिल्ली में छिपे हुए फैलाव को देखने के लिए यह की जाती है।
5. मॉलिक्यूलर टेस्ट: ट्यूमर में HER2, MSI/MMR और PD-L1 जैसे बायोमार्कर की जाँच की जाती है, जिससे यह तय करने में मदद मिलती है कि कौन सा आधुनिक इलाज उपयुक्त रहेगा।
6. रक्त जाँचें: हीमोग्लोबिन, लिवर और किडनी की स्थिति जानने के लिए ये कराई जाती हैं।
स्टेज (अवस्था)
कैंसर की अवस्था यह बताती है कि वह कितना बढ़ चुका है और इलाज की दिशा तय करती है। स्टेज 0 और स्टेज I में कैंसर पेट की परतों तक सीमित होता है। स्टेज II और III में वह पेट की गहरी परतों और आसपास के लिम्फ नोड्स तक पहुँच जाता है। स्टेज IV में कैंसर लिवर, फेफड़े या पेट की झिल्ली जैसे दूर के अंगों तक फैल चुका होता है।
इलाज के विकल्प
इलाज कैंसर की अवस्था, स्थान, मरीज़ की उम्र और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। आमतौर पर कैंसर विशेषज्ञों, सर्जन और रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट की टीम मिलकर योजना बनाती है।
1. एंडोस्कोपिक उपचार: बहुत शुरुआती और छोटे कैंसर को कभी-कभी एंडोस्कोपी के ज़रिए ही निकाला जा सकता है, बिना बड़े ऑपरेशन के।
2. सर्जरी: यह इलाज का मुख्य आधार है। ट्यूमर की जगह के अनुसार पेट का कुछ हिस्सा (सबटोटल गैस्ट्रेक्टोमी) या पूरा पेट (टोटल गैस्ट्रेक्टोमी) निकाला जाता है। साथ में आसपास के लिम्फ नोड्स भी हटाए जाते हैं। आजकल कई जगह लेप्रोस्कोपिक और रोबोटिक सर्जरी भी उपलब्ध है।
3. कीमोथेरेपी: दवाओं से कैंसर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है। यह ऑपरेशन से पहले (ट्यूमर छोटा करने के लिए), बाद में (बची कोशिकाएँ नष्ट करने के लिए) या उन्नत अवस्था में बीमारी को नियंत्रित करने के लिए दी जाती है।
4. रेडिएशन थेरेपी: उच्च ऊर्जा किरणों से कैंसर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है। कई बार इसे कीमोथेरेपी के साथ दिया जाता है और दर्द या रक्तस्राव कम करने के लिए भी इस्तेमाल होता है।
5. टार्गेटेड थेरेपी: यदि ट्यूमर में HER2 जैसे विशेष मार्कर पाए जाएँ, तो उन्हें लक्षित करने वाली दवाएँ दी जा सकती हैं।
6. इम्यूनोथेरेपी: ये दवाएँ शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कैंसर से लड़ने में मदद करती हैं। चुने हुए मरीज़ों में, ख़ासकर उन्नत अवस्था में, ये उपयोगी साबित हुई हैं।
7. पैलिएटिव (सहायक) देखभाल: उन्नत अवस्था में दर्द, उल्टी, भोजन में रुकावट और अन्य तकलीफ़ों को कम करके जीवन की गुणवत्ता सुधारने पर ध्यान दिया जाता है।
इलाज के बाद जीवन और पोषण
पेट का हिस्सा या पूरा पेट निकलने के बाद खान-पान में बदलाव करने पड़ते हैं। थोड़ा-थोड़ा करके दिन में कई बार खाना, धीरे-धीरे चबाकर खाना और प्रोटीन व पोषक तत्वों पर ध्यान देना ज़रूरी होता है। कुछ मरीज़ों को डंपिंग सिंड्रोम (खाने के बाद चक्कर, पसीना, दस्त) हो सकता है। पूरा पेट निकलने पर विटामिन B12 के इंजेक्शन जीवनभर लेने पड़ सकते हैं। पोषण विशेषज्ञ (डायटीशियन) की सलाह इस दौरान बहुत मददगार होती है। नियमित फॉलो-अप जाँचें भी ज़रूरी हैं।
रोग का पूर्वानुमान
जीवित रहने की संभावना मुख्य रूप से इस पर निर्भर करती है कि कैंसर का पता किस अवस्था में चला। शुरुआती अवस्था में पकड़ में आने पर इलाज से अच्छे परिणाम मिलने की संभावना काफ़ी बेहतर होती है, जबकि उन्नत अवस्था में बीमारी को केवल नियंत्रित करना ही संभव हो पाता है। इसीलिए समय पर जाँच सबसे बड़ा हथियार है। हर मरीज़ की स्थिति अलग होती है, इसलिए अपना पूर्वानुमान अपने ऑन्कोलॉजिस्ट से ही समझना चाहिए।
भारत में स्थिति
भारत में पेट का कैंसर कुछ क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है, जैसे पूर्वोत्तर राज्य (विशेषकर मिज़ोरम), दक्षिण भारत के कुछ हिस्से और कश्मीर घाटी। इसका संबंध क्षेत्रीय खान-पान की आदतों, जैसे नमकीन, स्मोक्ड और संरक्षित भोजन तथा तंबाकू के सेवन, और H. pylori संक्रमण की अधिकता से जोड़ा जाता है। कई मरीज़ देर से अस्पताल पहुँचते हैं, इसलिए जागरूकता की बहुत आवश्यकता है।
बचाव के उपाय
- ताज़े फल, हरी सब्ज़ियाँ और साबुत अनाज भरपूर खाएँ।
- अचार, अधिक नमक वाले, जले या धुएँ में पके और प्रोसेस्ड भोजन का सेवन कम करें।
- धूम्रपान, तंबाकू और शराब से पूरी तरह दूर रहें।
- स्वस्थ वज़न बनाए रखें और नियमित व्यायाम करें।
- स्वच्छ पानी पिएँ और भोजन की स्वच्छता का ध्यान रखें, ताकि H. pylori जैसे संक्रमण से बचाव हो।
- यदि H. pylori संक्रमण की पुष्टि हो, तो डॉक्टर की सलाह से उसका पूरा इलाज कराएँ।
- पारिवारिक इतिहास होने पर या पेट की पुरानी समस्या होने पर डॉक्टर से पूछकर नियमित एंडोस्कोपी कराएँ।
- लगातार बने रहने वाले पाचन संबंधी लक्षणों को अनदेखा न करें और स्वयं दवा लेते न रहें।
डॉक्टर से कब मिलें
यदि आपको बिना कारण वज़न घट रहा हो, भूख बहुत कम हो गई हो, लगातार उल्टी या निगलने में दिक्कत हो, काला मल या ख़ून की उल्टी हो, या बार-बार दवा लेने पर भी पेट का दर्द और जलन ठीक न हो, तो देर न करें। गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट या कैंसर विशेषज्ञ से तुरंत संपर्क करें।
निष्कर्ष
पेट का कैंसर गंभीर बीमारी है, लेकिन जागरूकता, सही जीवनशैली और समय पर जाँच से इसका जोखिम घटाया जा सकता है और शुरुआती अवस्था में पकड़ने पर बेहतर इलाज संभव है। आधुनिक सर्जरी, कीमोथेरेपी, टार्गेटेड और इम्यूनोथेरेपी ने उपचार के विकल्प बढ़ाए हैं। याद रखें, लगातार बने रहने वाले पेट के लक्षणों को मामूली समझकर टालना नहीं चाहिए। समय पर डॉक्टरी सलाह जीवन बचाने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
