टेस्टिकुलर कैंसर (अंडकोष का कैंसर): लक्षण, कारण, जांच और इलाज
परिचय
टेस्टिकुलर कैंसर, जिसे हिंदी में अंडकोष का कैंसर या वृषण कैंसर कहा जाता है, पुरुषों के प्रजनन तंत्र का एक कैंसर है। यह उन अंडकोषों (टेस्टिस) में शुरू होता है जो अंडकोश की थैली में स्थित होते हैं। अंडकोष शुक्राणु और पुरुष हार्मोन टेस्टोस्टेरोन बनाने का काम करते हैं।
यह कैंसर अपेक्षाकृत दुर्लभ है और पुरुषों में पाए जाने वाले कुल कैंसरों का लगभग 1 प्रतिशत ही होता है। लेकिन यह 15 से 35 वर्ष की उम्र के युवा पुरुषों में सबसे आम ठोस कैंसरों में गिना जाता है। अच्छी बात यह है कि यह उन कैंसरों में से है जिनका इलाज सबसे अधिक सफल रहता है। समय पर पहचान होने पर अधिकांश मरीज पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, यहां तक कि कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल जाने के बाद भी।
अंडकोष की बनावट और कार्य
हर पुरुष में दो अंडकोष होते हैं, जो अंडकोश की थैली में लटके रहते हैं। इनका आकार लगभग एक छोटे अंडे जितना होता है। इनके दो मुख्य कार्य हैं:
- शुक्राणुओं का निर्माण
- टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का निर्माण, जो पुरुषों की आवाज, दाढ़ी-मूंछ, मांसपेशियों और यौन क्षमता के लिए जरूरी है
अंडकोष में शुक्राणु बनाने वाली कोशिकाओं को जर्म सेल कहते हैं। लगभग 95 प्रतिशत टेस्टिकुलर कैंसर इन्हीं जर्म सेल से शुरू होते हैं।
टेस्टिकुलर कैंसर के प्रकार
1. जर्म सेल ट्यूमर (सबसे आम)
इसके दो मुख्य उपप्रकार हैं:
- सेमिनोमा: यह धीमी गति से बढ़ता है और अक्सर 25 से 45 वर्ष की उम्र में होता है। यह रेडिएशन और कीमोथेरेपी दोनों के प्रति अच्छी प्रतिक्रिया देता है।
- नॉन-सेमिनोमा: यह अपेक्षाकृत कम उम्र में होता है और तेजी से बढ़ सकता है। इसमें एम्ब्रायोनल कार्सिनोमा, योक सैक ट्यूमर, कोरियोकार्सिनोमा और टेराटोमा जैसे प्रकार आते हैं। कई बार एक ही ट्यूमर में दोनों प्रकार मिले होते हैं।
2. स्ट्रोमल ट्यूमर
ये अंडकोष के सहायक ऊतकों से शुरू होते हैं, जैसे लेडिग सेल और सर्टोली सेल ट्यूमर। ये दुर्लभ होते हैं और अधिकतर कैंसर रहित होते हैं।
टेस्टिकुलर कैंसर के कारण और जोखिम कारक
इस कैंसर का सटीक कारण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। डॉक्टर मानते हैं कि जब अंडकोष की स्वस्थ कोशिकाओं के डीएनए में बदलाव (म्यूटेशन) आता है, तो वे अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं और ट्यूमर बना लेती हैं। कुछ कारक इसका खतरा बढ़ा सकते हैं:
- अंडकोष का नीचे न उतरना (क्रिप्टोऑर्किडिज्म): जन्म के समय अगर अंडकोष थैली में न उतरा हो, तो बाद में कैंसर का जोखिम काफी बढ़ जाता है। ऑपरेशन से अंडकोष को सही जगह लाने के बाद भी जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होता।
- पारिवारिक इतिहास: पिता या भाई को यह कैंसर हुआ हो तो खतरा अधिक होता है।
- पहले एक अंडकोष में कैंसर होना: ऐसे व्यक्ति में दूसरे अंडकोष में कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है।
- उम्र: यह किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन युवाओं में अधिक आम है।
- नस्ल: श्वेत पुरुषों में यह एशियाई और अफ्रीकी मूल के पुरुषों की तुलना में अधिक देखा जाता है।
- कुछ अन्य स्थितियां: अंडकोष का असामान्य विकास या कुछ जन्मजात विकार भी जोखिम बढ़ा सकते हैं।
ध्यान रहे कि जोखिम कारक होने का मतलब यह नहीं कि कैंसर होगा ही, और कई मरीजों में कोई भी जोखिम कारक नहीं मिलता।
लक्षण: किन संकेतों को नजरअंदाज न करें
शुरुआती अवस्था में अक्सर दर्द नहीं होता, इसलिए लोग इसे हल्के में ले लेते हैं। आम लक्षण ये हैं:
- अंडकोष में गांठ या सख्त हिस्सा, जो आमतौर पर मटर के दाने या उससे बड़े आकार का होता है
- एक अंडकोष का आकार बढ़ना या सूजन आना
- अंडकोश में भारीपन या खिंचाव महसूस होना
- पेट के निचले हिस्से, कमर या अंडकोश में हल्का दर्द या बेचैनी
- अंडकोश में अचानक तरल जमा हो जाना
- एक अंडकोष का दूसरे से अधिक सख्त या अलग महसूस होना
- स्तनों में कोमलता या उनका बढ़ना (कुछ ट्यूमर में हार्मोन बनने के कारण)
कैंसर फैलने पर दिखने वाले लक्षण:
- पीठ के निचले हिस्से में दर्द (पेट की लिम्फ नोड्स में फैलाव के कारण)
- सांस फूलना, खांसी या खांसी में खून (फेफड़ों में फैलाव)
- पेट में दर्द, बिना कारण वजन घटना और थकान
- गर्दन में गांठ
अंडकोष में हर गांठ कैंसर नहीं होती। संक्रमण, सिस्ट, हाइड्रोसील या वैरिकोसील जैसी स्थितियां भी गांठ या सूजन का कारण बन सकती हैं। फिर भी, किसी भी नई गांठ या बदलाव की जांच डॉक्टर से जरूर करानी चाहिए।
स्वयं जांच कैसे करें
हर पुरुष, खासकर 15 से 40 वर्ष के युवाओं को महीने में एक बार अंडकोष की स्वयं जांच करनी चाहिए। इसका सही तरीका:
- गुनगुने पानी से नहाने के बाद जांच करें, क्योंकि तब अंडकोश की त्वचा ढीली होती है।
- आईने के सामने खड़े होकर देखें कि किसी तरफ सूजन या आकार में अंतर तो नहीं है।
- एक समय में एक अंडकोष को दोनों हाथों के अंगूठे और उंगलियों के बीच रखकर हल्के से घुमाएं।
- देखें कि कोई गांठ, सख्त हिस्सा या असामान्य उभार तो नहीं है।
- अंडकोष के पीछे की ओर मौजूद नली जैसी संरचना (एपिडिडाइमिस) को पहचानना सीखें, ताकि उसे गांठ समझने की गलती न हो।
अगर कोई बदलाव महसूस हो, तो घबराएं नहीं, लेकिन देर किए बिना यूरोलॉजिस्ट से मिलें।
जांच और निदान
डॉक्टर लक्षणों और शारीरिक जांच के बाद आमतौर पर ये जांचें कराते हैं:
1. अल्ट्रासाउंड (स्क्रोटल सोनोग्राफी): यह सबसे पहली और महत्वपूर्ण जांच है। इससे पता चलता है कि गांठ अंडकोष के अंदर है या बाहर, और वह ठोस है या तरल से भरी।
2. ब्लड टेस्ट (ट्यूमर मार्कर): कुछ ट्यूमर खून में खास प्रोटीन छोड़ते हैं। इनमें अल्फा-फीटोप्रोटीन (AFP), बीटा-एचसीजी (β-hCG) और एलडीएच (LDH) शामिल हैं। ये जांचें निदान, कैंसर के चरण और इलाज के असर को परखने में मदद करती हैं।
3. रेडिकल इंग्विनल ऑर्किडेक्टोमी: अगर कैंसर का संदेह मजबूत हो, तो प्रभावित अंडकोष को पेट के निचले हिस्से (जांघ के जोड़) में चीरा लगाकर निकाला जाता है और जांच के लिए भेजा जाता है। इसमें आमतौर पर सुई से बायोप्सी नहीं की जाती, क्योंकि उससे कैंसर फैलने का खतरा रहता है। यह प्रक्रिया निदान और इलाज, दोनों का पहला कदम होती है।
4. सीटी स्कैन या एमआरआई: पेट, श्रोणि और छाती का स्कैन यह देखने के लिए किया जाता है कि कैंसर लिम्फ नोड्स या अन्य अंगों में फैला है या नहीं।
कैंसर के चरण
- स्टेज 1: कैंसर केवल अंडकोष तक सीमित होता है।
- स्टेज 2: कैंसर पेट की लिम्फ नोड्स तक पहुंच चुका होता है।
- स्टेज 3: कैंसर फेफड़ों, लिवर, मस्तिष्क या दूर की लिम्फ नोड्स जैसे अंगों में फैल चुका होता है।
इलाज की योजना कैंसर के प्रकार, चरण और ट्यूमर मार्करों के स्तर पर निर्भर करती है।
इलाज के विकल्प
1. सर्जरी (ऑर्किडेक्टोमी)
लगभग सभी मरीजों में पहला इलाज प्रभावित अंडकोष को निकालना है। एक अंडकोष के रहते हुए भी पुरुष सामान्य टेस्टोस्टेरोन बनाता है और सामान्य यौन जीवन जी सकता है, साथ ही पिता भी बन सकता है। चाहें तो सौंदर्य के लिए कृत्रिम अंडकोष (प्रोस्थेसिस) लगवाया जा सकता है।
2. रेट्रोपेरिटोनियल लिम्फ नोड डिसेक्शन (RPLND)
कुछ मामलों में, खासकर नॉन-सेमिनोमा में, पेट की प्रभावित लिम्फ नोड्स को सर्जरी से निकाला जाता है।
3. रेडिएशन थेरेपी
यह मुख्यतः सेमिनोमा के शुरुआती चरणों में दी जाती है, क्योंकि सेमिनोमा रेडिएशन के प्रति संवेदनशील होता है। इसमें उच्च ऊर्जा की किरणों से बची हुई कैंसर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है।
4. कीमोथेरेपी
जब कैंसर लिम्फ नोड्स या दूसरे अंगों में फैल चुका हो, या दोबारा लौटने का जोखिम अधिक हो, तब दवाओं से कीमोथेरेपी दी जाती है। सामान्य दवा संयोजनों में बीईपी (ब्लियोमाइसिन, एटोपोसाइड, सिस्प्लैटिन) शामिल है।
5. निगरानी (सर्विलांस)
स्टेज 1 के कुछ मरीजों में सर्जरी के बाद तुरंत अतिरिक्त इलाज न देकर नियमित जांच, ब्लड टेस्ट और स्कैन के साथ सतर्क निगरानी रखी जाती है। यह निर्णय डॉक्टर मरीज की स्थिति देखकर लेते हैं।
6. स्टेम सेल ट्रांसप्लांट
जिन दुर्लभ मामलों में कैंसर बार-बार लौटता है, वहां हाई-डोज कीमोथेरेपी के साथ स्टेम सेल ट्रांसप्लांट पर विचार किया जाता है।
प्रजनन क्षमता (फर्टिलिटी) पर प्रभाव
यह कई युवा मरीजों की सबसे बड़ी चिंता होती है। सर्जरी, रेडिएशन और कीमोथेरेपी, तीनों शुक्राणुओं की संख्या और गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए इलाज शुरू करने से पहले स्पर्म बैंकिंग (शुक्राणुओं को फ्रीज करके सुरक्षित रखना) की सलाह दी जाती है। भविष्य में संतान की इच्छा रखने वाले हर मरीज को यह विकल्प अपने डॉक्टर से जरूर पूछना चाहिए। बहुत से पुरुष इलाज के बाद भी प्राकृतिक रूप से पिता बन पाते हैं।
इलाज के बाद की देखभाल और फॉलो-अप
इलाज पूरा होने के बाद भी कुछ वर्षों तक नियमित फॉलो-अप जरूरी है, क्योंकि कैंसर के लौटने का खतरा शुरुआती वर्षों में अधिक रहता है। इसमें शामिल हैं:
- समय-समय पर डॉक्टर से जांच
- ट्यूमर मार्कर के लिए ब्लड टेस्ट
- सीटी स्कैन या एक्स-रे
- दूसरे अंडकोष की नियमित स्वयं जांच
कीमोथेरेपी के बाद थकान, सुनने में दिक्कत, हाथ-पैर में झनझनाहट या हृदय संबंधी जोखिम जैसे दीर्घकालिक प्रभाव हो सकते हैं, इसलिए डॉक्टर के निर्देशों का पालन करना चाहिए।
जीवित रहने की दर और भविष्य की उम्मीद
टेस्टिकुलर कैंसर के इलाज के नतीजे बहुत उत्साहजनक हैं। जब कैंसर अंडकोष तक सीमित हो, तो पांच साल की जीवित रहने की दर 95 प्रतिशत से अधिक होती है। यहां तक कि फैल चुके मामलों में भी आधुनिक कीमोथेरेपी की बदौलत बहुत से मरीज पूरी तरह ठीक हो जाते हैं। निश्चित आंकड़े कैंसर के प्रकार, चरण और मरीज की सेहत के अनुसार अलग-अलग होते हैं, इसलिए अपने मामले की सटीक जानकारी डॉक्टर से ही लें।
रोकथाम और जागरूकता
इस कैंसर को पूरी तरह रोकने का कोई सिद्ध तरीका नहीं है, लेकिन जल्द पहचान से जान बचाई जा सकती है:
- महीने में एक बार स्वयं जांच की आदत डालें
- किसी भी गांठ, सूजन या भारीपन को नजरअंदाज न करें और शर्म या झिझक छोड़कर डॉक्टर से मिलें
- बचपन में अंडकोष नीचे न उतरने की समस्या का समय पर इलाज कराएं
- परिवार में इस कैंसर का इतिहास हो तो डॉक्टर को बताएं
- संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और धूम्रपान से परहेज जैसी स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं
हमारे समाज में पुरुष अक्सर निजी अंगों से जुड़ी समस्याओं पर बात करने में हिचकिचाते हैं। यही झिझक देरी का सबसे बड़ा कारण बनती है। परिवार और दोस्तों को भी चाहिए कि वे इस विषय पर खुलकर चर्चा करें।
डॉक्टर से कब मिलें
अगर आपको नीचे दिए गए संकेतों में से कोई भी दिखे, तो एक-दो सप्ताह के भीतर यूरोलॉजिस्ट या ऑन्कोलॉजिस्ट से सलाह लें:
- अंडकोष में कोई नई गांठ या सख्त हिस्सा
- एक अंडकोष का आकार या बनावट बदलना
- अंडकोश में लगातार भारीपन या दर्द
- पीठ दर्द, सांस की तकलीफ या बिना कारण वजन घटना, साथ में अंडकोष की समस्या
निष्कर्ष
टेस्टिकुलर कैंसर भले ही युवाओं को प्रभावित करता है, लेकिन यह सबसे अधिक इलाज योग्य कैंसरों में से एक है। इसकी सबसे बड़ी कुंजी है जागरूकता और जल्दी पहचान। नियमित स्वयं जांच, लक्षणों के प्रति सतर्कता और समय पर डॉक्टर से परामर्श से इस बीमारी पर प्रभावी ढंग से जीत पाई जा सकती है। अगर निदान हो भी जाए, तो घबराने की जरूरत नहीं है। आधुनिक चिकित्सा, सही इलाज और परिवार के सहयोग से अधिकांश मरीज सामान्य और स्वस्थ जीवन जीते हैं।
