कॉर्नियल अल्सर (कॉर्निया पर घाव): कारण, लक्षण, इलाज और बचाव
परिचय
हमारी आँख के सबसे आगे वाले हिस्से में एक पारदर्शी, गुंबद जैसी परत होती है, जिसे कॉर्निया (पुतली की ऊपरी पारदर्शी परत) कहते हैं। यह आँख की खिड़की की तरह काम करती है। इसी से होकर रोशनी आँख के अंदर जाती है और हमें साफ दिखाई देता है। जब इस परत पर संक्रमण या चोट के कारण घाव बन जाता है, तो उसे कॉर्नियल अल्सर या कॉर्निया का अल्सर कहते हैं। आम बोलचाल में लोग इसे “आँख में छाला” या “आँख का घाव” भी कह देते हैं।
यह एक गंभीर आँखों की समस्या है। समय पर इलाज न मिले तो स्थायी दृष्टि-हानि या अंधापन तक हो सकता है। भारत जैसे देशों में, जहाँ खेती-किसानी और धूल-मिट्टी वाले काम बहुत होते हैं, कॉर्नियल अल्सर एक बड़ी जन-स्वास्थ्य समस्या है।
कॉर्निया की बनावट: संक्षेप में
कॉर्निया में पाँच परतें होती हैं, और इसमें रक्त वाहिकाएँ नहीं होतीं। यह आँसुओं और आँख के भीतरी द्रव से पोषण लेती है। रक्त का प्रवाह न होने के कारण इसमें संक्रमण से लड़ने की क्षमता कम होती है। एक बार इसकी बाहरी सुरक्षा परत (एपिथीलियम) टूट जाए तो कीटाणु आसानी से अंदर घुस जाते हैं और घाव गहरा होता जाता है।
कॉर्नियल अल्सर के प्रमुख कारण
1. जीवाणु (बैक्टीरिया) संक्रमण
यह सबसे आम कारणों में से एक है। स्यूडोमोनास, स्टैफिलोकोकस और स्ट्रेप्टोकोकस जैसे बैक्टीरिया कॉर्निया को तेज़ी से नुकसान पहुँचाते हैं।
2. फफूंद (फंगल) संक्रमण
खेतों में काम करने वालों में यह अधिक देखा जाता है। पेड़ की टहनी, फसल के तिनके या धान-गेहूँ की भूसी आँख में लगने से फफूंद कॉर्निया में पहुँच सकती है। फंगल अल्सर का इलाज अपेक्षाकृत लंबा और कठिन होता है।
3. वायरल संक्रमण
हर्पीज़ सिम्प्लेक्स वायरस और हर्पीज़ ज़ोस्टर (दाद का वायरस) कॉर्निया में बार-बार घाव पैदा कर सकते हैं।
4. कॉन्टैक्ट लेंस का गलत उपयोग
लेंस पहनकर सोना, गंदे हाथों से लेंस लगाना, लेंस की सफाई ठीक से न करना, या लेंस को नल के पानी में धोना कॉर्नियल अल्सर के बड़े कारण हैं। इसके अलावा लेंस की समय-सीमा से ज़्यादा इस्तेमाल भी खतरनाक है।
5. आँख में चोट
धूल का कण, लोहे का टुकड़ा, नाखून, पत्ती, कीड़ा या रासायनिक पदार्थ लगने से कॉर्निया की सतह छिल सकती है। इसके बाद संक्रमण आसानी से फैलता है।
6. आँख का सूखापन
जिन लोगों की आँखों में आँसू कम बनते हैं, उनकी कॉर्निया की सुरक्षा कमज़ोर हो जाती है।
7. पलकों की बीमारियाँ
पलकें पूरी तरह बंद न होना, पलकों का अंदर की ओर मुड़ना (ट्राइकियासिस) या पलकों में बार-बार संक्रमण रहना भी कारण बन सकता है।
8. कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता और अन्य रोग
मधुमेह, कुपोषण, विटामिन-A की कमी, या लंबे समय तक स्टेरॉयड आई ड्रॉप का बिना सलाह उपयोग जोखिम बढ़ाता है। कई बार लोग आँख लाल होने पर खुद से स्टेरॉयड ड्रॉप डाल लेते हैं, जो संक्रमण को और भड़का सकती है।
लक्षण: कैसे पहचानें?
कॉर्नियल अल्सर के लक्षण अक्सर अचानक शुरू होते हैं और तेज़ी से बढ़ते हैं:
- आँख में तेज़ दर्द और जलन
- आँख का लाल हो जाना
- लगातार पानी बहना या गाढ़ा पीला-हरा स्राव (पीप) निकलना
- रोशनी में आँख खोलने में परेशानी (फोटोफोबिया)
- धुंधला दिखाई देना या दृष्टि कम हो जाना
- ऐसा महसूस होना कि आँख में कुछ गड़ रहा है
- कॉर्निया पर सफेद या धूसर धब्बा दिखना
- पलकों में सूजन
- कभी-कभी आँख के अंदर पीप जम जाना, जिसे “हाइपोपायन” कहते हैं
सावधानी: यदि कॉन्टैक्ट लेंस पहनने वाले व्यक्ति की आँख अचानक लाल हो जाए और दर्द हो, तो तुरंत लेंस निकालें और नेत्र-चिकित्सक को दिखाएँ। इंतज़ार करना खतरनाक हो सकता है।
जाँच और निदान
नेत्र-रोग विशेषज्ञ निम्न जाँचें करते हैं:
- स्लिट लैंप जाँच: विशेष माइक्रोस्कोप से कॉर्निया की बारीकी से जाँच
- फ्लोरेसीन स्टेन टेस्ट: आँख में एक विशेष रंग डाला जाता है, जो घाव वाले हिस्से को हरे रंग में चमकाकर दिखाता है
- कॉर्नियल स्क्रेपिंग: घाव से थोड़ा नमूना लेकर माइक्रोस्कोप और कल्चर द्वारा यह पता किया जाता है कि संक्रमण बैक्टीरिया, फफूंद या वायरस में से किसका है। इससे सही दवा चुनने में मदद मिलती है।
- दृष्टि की जाँच और ज़रूरत पड़ने पर आँख का दबाव मापना
इलाज
इलाज की दिशा कारण पर निर्भर करती है, इसलिए कभी भी बिना जाँच के खुद से दवा न चुनें।
1. एंटीबायोटिक आई ड्रॉप: बैक्टीरियल अल्सर में शुरुआती दिनों में हर घंटे या हर कुछ घंटों पर ड्रॉप डालने की सलाह दी जाती है।
2. एंटीफंगल दवाएँ: फंगल अल्सर में आई ड्रॉप, मरहम और कभी-कभी गोलियाँ दी जाती हैं। इलाज कई हफ्तों तक चल सकता है।
3. एंटीवायरल दवाएँ: हर्पीज़ संक्रमण में एसाइक्लोविर जैसी दवाएँ दी जाती हैं।
4. सहायक दवाएँ: दर्द कम करने, पुतली को आराम देने (साइक्लोप्लेजिक ड्रॉप) और सूजन कम करने की दवाएँ चिकित्सक की सलाह से दी जाती हैं।
5. भर्ती और निगरानी: गंभीर मामलों में मरीज़ को अस्पताल में भर्ती कर नियमित निगरानी की जाती है।
6. सर्जरी: यदि दवाओं से घाव न भरे, कॉर्निया पतली होकर छेद होने की कगार पर हो, या छेद हो जाए, तब सर्जरी की ज़रूरत पड़ सकती है:
- कॉर्नियल ग्लूइंग (विशेष चिपकाने वाला पदार्थ लगाना)
- एमनियोटिक मेम्ब्रेन ग्राफ्ट
- कॉर्निया प्रत्यारोपण (कॉर्नियल ट्रांसप्लांट), जिसमें खराब हिस्से की जगह दान की गई स्वस्थ कॉर्निया लगाई जाती है
संभावित जटिलताएँ
समय पर और सही इलाज न मिलने पर ये समस्याएँ हो सकती हैं:
- कॉर्निया पर स्थायी सफेद निशान (कॉर्नियल स्कार या “फूली”), जिससे दृष्टि कमज़ोर रहती है
- कॉर्निया में छेद (परफोरेशन)
- आँख के अंदर संक्रमण फैलना (एंडोफ्थैल्माइटिस)
- मोतियाबिंद या काला मोतिया (ग्लूकोमा) जैसी समस्याएँ
- आंशिक या पूर्ण अंधापन
घरेलू देखभाल: इलाज के दौरान क्या करें
- चिकित्सक द्वारा बताई गई दवा समय पर और पूरी अवधि तक डालें, भले ही आराम महसूस होने लगे।
- दवा डालने से पहले हाथ साबुन से अच्छी तरह धोएँ।
- ड्रॉप की शीशी का सिरा आँख या पलक से न छुआएँ।
- आँख को बार-बार न छुएँ और न रगड़ें।
- धूप का चश्मा पहनें, इससे रोशनी की चुभन कम होती है।
- कॉन्टैक्ट लेंस का उपयोग पूरी तरह बंद रखें।
- आँख पर कोई घरेलू नुस्खा (जैसे दूध, शहद, गुलाब जल, पान का रस या किसी भी तरह का तेल) न लगाएँ। ये संक्रमण को और बढ़ा सकते हैं।
- नियमित फॉलो-अप के लिए अस्पताल ज़रूर जाएँ।
बचाव के उपाय
कॉर्नियल अल्सर से बचाव काफी हद तक संभव है:
- कॉन्टैक्ट लेंस की सफाई: केवल निर्धारित सॉल्यूशन से सफाई करें, लेंस पहनकर कभी न सोएँ और न तैरें, और समय-सीमा के बाद लेंस बदल दें।
- सुरक्षात्मक चश्मा: खेत, निर्माण-स्थल, वेल्डिंग, लकड़ी या धातु का काम करते समय सुरक्षा चश्मा पहनें।
- आँख में चोट लगे तो: आँख को रगड़ें नहीं। साफ पानी से धोकर तुरंत नेत्र-चिकित्सक के पास जाएँ।
- खुद से स्टेरॉयड ड्रॉप न डालें: कोई भी आई ड्रॉप बिना डॉक्टरी सलाह के इस्तेमाल न करें।
- हाथों की स्वच्छता: आँखों को छूने से पहले हाथ धोएँ।
- सूखी आँखों का इलाज: आँखें लगातार सूखी रहती हों तो कृत्रिम आँसू (लुब्रिकेंट ड्रॉप) डॉक्टर की सलाह से इस्तेमाल करें।
- पोषण: विटामिन-A युक्त भोजन जैसे गाजर, पपीता, पालक, आम और अंडा आहार में शामिल करें।
- मधुमेह नियंत्रण: यदि मधुमेह है तो शुगर नियंत्रित रखें और नियमित आँखों की जाँच कराएँ।
- तौलिया और रुमाल साझा न करें: इससे संक्रमण फैल सकता है।
डॉक्टर के पास कब जाएँ?
इन स्थितियों में बिना देर किए नेत्र-विशेषज्ञ से मिलें:
- आँख में अचानक तेज़ दर्द और लालिमा
- दृष्टि में अचानक कमी या धुंधलापन
- कॉर्निया पर सफेद धब्बा
- आँख से पीप या गाढ़ा स्राव
- चोट लगने के बाद आँख में लगातार गड़न
कॉर्नियल अल्सर में कुछ घंटों की देरी भी नुकसान बढ़ा सकती है, इसलिए इसे सामान्य “आँख आना” समझकर नज़रअंदाज़ न करें।
निष्कर्ष
कॉर्नियल अल्सर एक गंभीर लेकिन काफी हद तक रोकी जा सकने वाली बीमारी है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका जागरूकता और समय पर इलाज की है। कॉन्टैक्ट लेंस की सही देखभाल, चोट से बचाव, स्वच्छता और बिना सलाह के दवाओं से परहेज़ जैसे छोटे कदम आपकी आँखों की रोशनी बचा सकते हैं। यदि आँख में दर्द, लालिमा या धुंधलापन जैसे लक्षण दिखें, तो घरेलू नुस्खों के भरोसे न रहें और तुरंत योग्य नेत्र-चिकित्सक से परामर्श लें। याद रखें, आँखें अनमोल हैं और एक बार खोई रोशनी हमेशा वापस नहीं आती।
