अकैलेसिआ (Achalasia - निगलने में कठिनाई)
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अकैलेसिआ (Achalasia): निगलने में कठिनाई का एक दुर्लभ विकार

परिचय

खाना निगलना हमें एक साधारण और स्वतः होने वाली क्रिया लगती है, लेकिन इसमें मुँह, गले और भोजन नली की मांसपेशियों और नसों का सटीक तालमेल काम करता है। जब यह तालमेल बिगड़ जाता है, तो भोजन निगलना कठिन और कष्टदायक हो सकता है। ऐसा ही एक विकार अकैलेसिआ (Achalasia) है, जिसमें भोजन नली (इसोफेगस) भोजन को पेट तक ठीक से नहीं पहुँचा पाती।

अकैलेसिआ अपेक्षाकृत दुर्लभ बीमारी है। अनुमान है कि हर एक लाख लोगों में लगभग एक से दो नए मामले हर साल सामने आते हैं। यह किसी भी उम्र में हो सकती है, पर अधिकतर 25 से 60 वर्ष की उम्र के बीच दिखाई देती है। इसके लक्षण आम अपच या एसिडिटी जैसे लगते हैं, इसलिए कई बार सही निदान में वर्षों लग जाते हैं।

अकैलेसिआ क्या है?

भोजन नली एक लंबी मांसपेशीय नली है जो गले को पेट से जोड़ती है। इसके निचले सिरे पर एक गोलाकार मांसपेशी होती है, जिसे निचला इसोफेजियल स्फिंक्टर (Lower Esophageal Sphincter, LES) कहते हैं। यह एक द्वार की तरह काम करती है।

सामान्य स्थिति में निगलते समय भोजन नली की दीवार तरंग की तरह सिकुड़कर भोजन को नीचे धकेलती है। इस तरंग को पेरिस्टाल्सिस कहते हैं। साथ ही LES ढीली होकर खुल जाती है ताकि भोजन पेट में चला जाए। भोजन के बाद यह फिर बंद हो जाती है, जिससे पेट का अम्ल ऊपर नहीं आता।

अकैलेसिआ में दो गड़बड़ियाँ एक साथ होती हैं:

  1. भोजन नली की मांसपेशियों की पेरिस्टाल्टिक गति कमज़ोर हो जाती है या बंद हो जाती है।
  2. LES निगलने पर पूरी तरह ढीली नहीं होती और कसकर बंद रहती है।

नतीजा यह कि भोजन नली में ही अटकने लगता है। समय के साथ नली चौड़ी और फैल जाती है।

अकैलेसिआ के कारण

अकैलेसिआ का सटीक कारण अभी पूरी तरह ज्ञात नहीं है। इसका मूल कारण भोजन नली की दीवार में मौजूद नसों की कोशिकाओं (मायेंटेरिक प्लेक्सस की गैंग्लियन कोशिकाओं) का धीरे-धीरे नष्ट होना माना जाता है। ये कोशिकाएँ ही मांसपेशियों को ढीला होने का संकेत देती हैं।

शोधकर्ताओं ने इसके पीछे कई संभावित कारण बताए हैं:

  • स्वप्रतिरक्षा (Autoimmune) प्रक्रिया: शरीर की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से इन नसों की कोशिकाओं पर हमला कर सकती है।
  • वायरल संक्रमण: कुछ वायरस, जैसे हर्पीज़ समूह के वायरस, इसकी शुरुआत से जोड़े गए हैं, हालाँकि यह पूरी तरह सिद्ध नहीं है।
  • आनुवंशिक कारक: कुछ दुर्लभ मामलों में परिवार में एक से अधिक सदस्यों को यह रोग होता है।
  • चागास रोग (Chagas disease): दक्षिण अमेरिका में पाए जाने वाले एक परजीवी संक्रमण से अकैलेसिआ जैसी स्थिति बन सकती है। इसे द्वितीयक अकैलेसिआ कहते हैं।

यह रोग आमतौर पर संक्रामक नहीं है और खान-पान की किसी गलती से नहीं होता।

प्रमुख लक्षण

अकैलेसिआ के लक्षण धीरे-धीरे शुरू होते हैं और महीनों या वर्षों में बढ़ते हैं। मुख्य लक्षण ये हैं:

  • डिस्फेजिया (निगलने में कठिनाई): यह सबसे प्रमुख लक्षण है। शुरू में ठोस भोजन निगलने में दिक्कत होती है, बाद में तरल पदार्थ भी अटकने लगते हैं। यह इसे कई अन्य रोगों से अलग करता है, जिनमें अक्सर पहले केवल ठोस भोजन में परेशानी होती है।
  • रिगर्जिटेशन (भोजन का वापस मुँह में आना): निगला हुआ बिना पचा भोजन या लार मुँह में लौट आती है। यह उल्टी से अलग है, क्योंकि इसमें खट्टा अम्लीय स्वाद अक्सर नहीं होता।
  • सीने में दर्द: छाती के बीच में दबाव या ऐंठन जैसा दर्द, जो कभी-कभी हृदय रोग के दर्द जैसा लग सकता है।
  • सीने में जलन: कई मरीज़ इसे एसिड रिफ्लक्स समझ लेते हैं, जबकि यहाँ जलन भोजन के नली में सड़ने और किण्वन से होती है।
  • वज़न घटना: खाने में कठिनाई के कारण मरीज़ कम खाने लगते हैं और धीरे-धीरे वज़न गिरता है।
  • रात में खाँसी या साँस की तकलीफ़: लेटने पर नली में रुका भोजन साँस की नली में जा सकता है, जिससे खाँसी, घरघराहट या निमोनिया हो सकता है।
  • डकार और हिचकी: अक्सर बार-बार आती हैं।

मरीज़ अनजाने में कई आदतें अपना लेते हैं, जैसे खाने के साथ बहुत पानी पीना, खाते समय पीठ सीधी करना या हाथ ऊपर उठाना, और भोजन बहुत धीरे खाना।

निदान कैसे होता है?

चूँकि लक्षण गैस्ट्रोइसोफेजियल रिफ्लक्स रोग (GERD) से मिलते हैं, इसलिए सही जाँच ज़रूरी है। प्रमुख जाँचें ये हैं:

1. बेरियम स्वैलो (Barium Swallow) एक्स-रे: मरीज़ को बेरियम का घोल पिलाकर एक्स-रे लिया जाता है। इसमें भोजन नली का निचला हिस्सा पतला होकर “बर्ड्स बीक” (पक्षी की चोंच) जैसा दिखता है और ऊपर की नली फैली होती है।

2. अपर जी.आई. एंडोस्कोपी: कैमरे वाली पतली नली से भोजन नली और पेट देखा जाता है। इससे कैंसर या ट्यूमर जैसी अन्य वजहों को अलग किया जाता है, जो ऐसे ही लक्षण दे सकती हैं।

3. इसोफेजियल मैनोमेट्री: यह निदान की सबसे विश्वसनीय जाँच है। इसमें नली के भीतर दबाव मापा जाता है। अकैलेसिआ में LES का दबाव बढ़ा रहता है और निगलने पर वह ठीक से ढीली नहीं होती। साथ ही नली में सामान्य तरंगें नहीं बनतीं। हाई-रिज़ॉल्यूशन मैनोमेट्री के आधार पर अकैलेसिआ को शिकागो वर्गीकरण के अनुसार तीन प्रकारों (टाइप I, II और III) में बाँटा जाता है, जो उपचार चुनने में मदद करता है।

कभी-कभी टाइमड बेरियम इसोफैगोग्राम और अन्य जाँचें भी की जाती हैं।

उपचार के विकल्प

अकैलेसिआ का कोई ऐसा इलाज नहीं है जो नसों की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को वापस ठीक कर दे। उपचार का लक्ष्य LES का दबाव घटाना है ताकि भोजन आसानी से पेट में जा सके और लक्षणों से राहत मिले।

1. न्यूमेटिक डायलेटेशन (गुब्बारे से फैलाव)

एंडोस्कोपी की मदद से LES के स्थान पर एक गुब्बारा फुलाया जाता है, जिससे मांसपेशी खिंचकर कमज़ोर हो जाती है। इसमें अस्पताल में कम समय लगता है, पर असर कुछ वर्षों बाद कम हो सकता है और प्रक्रिया दोहरानी पड़ सकती है। इसमें नली के फटने का थोड़ा जोखिम रहता है।

2. लैप्रोस्कोपिक हेलर मायोटॉमी

यह शल्य चिकित्सा लंबे समय तक अच्छे परिणाम देने वाला उपचार माना जाता है। इसमें सर्जन LES की मांसपेशी को सावधानी से काटकर ढीला कर देता है। इसके बाद अक्सर रिफ्लक्स रोकने के लिए पेट के ऊपरी हिस्से से हल्का आवरण (फंडोप्लिकेशन) बनाया जाता है।

3. पर-ओरल एंडोस्कोपिक मायोटॉमी (POEM)

यह नई और कम चीरे वाली तकनीक है। इसमें मुँह के रास्ते एंडोस्कोप डालकर नली की भीतरी परत के नीचे सुरंग बनाई जाती है और LES की मांसपेशी काटी जाती है। बाहर कोई चीरा नहीं लगता। इसके परिणाम बहुत अच्छे हैं, पर बाद में एसिड रिफ्लक्स की संभावना कुछ अधिक रहती है, जिसके लिए दवा की ज़रूरत पड़ सकती है।

4. बोटुलिनम टॉक्सिन इंजेक्शन

एंडोस्कोपी के दौरान LES में इंजेक्शन लगाया जाता है, जो मांसपेशी को अस्थायी रूप से ढीला करता है। इसका असर कुछ महीनों तक ही रहता है, इसलिए यह उन बुज़ुर्ग या कमज़ोर मरीज़ों के लिए है जो सर्जरी या अन्य प्रक्रियाएँ सहन नहीं कर सकते।

5. दवाएँ

नाइट्रेट और कैल्शियम चैनल ब्लॉकर जैसी दवाएँ मांसपेशी को ढीला कर सकती हैं, पर उनका असर सीमित और अल्पकालिक होता है। दुष्प्रभाव भी होते हैं, इसलिए ये मुख्य उपचार नहीं मानी जातीं।

उपचार का चुनाव मरीज़ की उम्र, सामान्य स्वास्थ्य, अकैलेसिआ के प्रकार और विशेषज्ञ की उपलब्धता पर निर्भर करता है। इसका निर्णय गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट या जी.आई. सर्जन से विचार-विमर्श के बाद लेना चाहिए।

संभावित जटिलताएँ

इलाज न होने पर या देर से इलाज होने पर ये समस्याएँ हो सकती हैं:

  • कुपोषण और अत्यधिक वज़न घटना
  • एस्पिरेशन निमोनिया: रुका हुआ भोजन फेफड़ों में चले जाने से बार-बार फेफड़ों में संक्रमण
  • भोजन नली का अत्यधिक फैलना (मेगाइसोफेगस)
  • इसोफेजियल कैंसर का थोड़ा बढ़ा जोखिम: लंबे समय तक रोग रहने पर नली में भोजन के रुकने से होने वाली सूजन के कारण। इसीलिए चिकित्सक लंबे समय तक नियमित निगरानी की सलाह दे सकते हैं।

जीवनशैली और खान-पान संबंधी सुझाव

उपचार के साथ कुछ सावधानियाँ राहत देती हैं:

  • थोड़ा-थोड़ा करके, धीरे-धीरे और अच्छी तरह चबाकर खाएँ।
  • खाने के साथ पर्याप्त पानी या गुनगुने तरल लें, इससे भोजन नीचे सरकने में मदद मिलती है।
  • सोने से कम से कम तीन घंटे पहले भोजन कर लें।
  • सोते समय सिर और छाती को तकिए से ऊँचा रखें।
  • बहुत ठंडे पेय या बहुत सख्त और सूखे खाद्य पदार्थों से, जो अटकते हों, परहेज़ करें।
  • एक बार में भारी भोजन करने के बजाय दिन में कई बार हल्का भोजन लें।
  • सर्जरी या प्रक्रिया के बाद चिकित्सक के बताए आहार का पालन करें।

डॉक्टर से कब मिलें?

निम्न स्थितियों में विलंब न करें और विशेषज्ञ से परामर्श लें:

  • कई हफ्तों से भोजन या पानी निगलने में लगातार कठिनाई
  • बिना कारण वज़न घटना
  • बार-बार भोजन का वापस मुँह में आना
  • रात में खाँसी या साँस फूलना
  • सीने में बार-बार दर्द, जिसकी हृदय संबंधी जाँच में कोई कारण न मिले

छाती में तेज़ दर्द को कभी हल्के में न लें। पहले हृदय संबंधी कारणों की जाँच अवश्य करवाएँ।

निष्कर्ष

अकैलेसिआ एक दीर्घकालिक लेकिन उपचार योग्य विकार है। इसके लक्षण एसिडिटी जैसे लगने के कारण अक्सर पहचान में देर हो जाती है, इसलिए निगलने में लगातार परेशानी को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। समय पर जाँच और उचित उपचार से अधिकांश मरीज़ सामान्य जीवन जी पाते हैं। हेलर मायोटॉमी, POEM और गुब्बारे से फैलाव जैसे उपचार लक्षणों में काफ़ी राहत देते हैं, लेकिन चूँकि बीमारी का मूल कारण ठीक नहीं होता, इसलिए नियमित फॉलो-अप ज़रूरी है।

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