पोस्टपार्टम हैमरेज (Postpartum Hemorrhage - प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव)
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पोस्टपार्टम हेमरेज (Postpartum Hemorrhage): डिलीवरी के बाद अत्यधिक रक्तस्राव

प्रस्तावना

माँ बनना किसी भी महिला के जीवन का सबसे सुंदर अनुभव होता है, लेकिन प्रसव के दौरान और उसके बाद कुछ जटिलताएँ भी हो सकती हैं। इनमें सबसे गंभीर और जानलेवा जटिलताओं में से एक है पोस्टपार्टम हेमरेज (PPH), यानी बच्चे के जन्म के बाद अत्यधिक रक्तस्राव। दुनिया भर में और भारत में भी यह मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में गिना जाता है। अच्छी बात यह है कि समय पर पहचान, सही इलाज और उचित तैयारी से अधिकांश मामलों में माँ की जान बचाई जा सकती है।

पोस्टपार्टम हेमरेज क्या है?

सामान्य प्रसव के बाद कुछ मात्रा में रक्तस्राव होना स्वाभाविक है, क्योंकि गर्भाशय से प्लेसेंटा (नाल) अलग होती है। लेकिन जब यह रक्तस्राव सामान्य सीमा से अधिक हो जाए, तो उसे पोस्टपार्टम हेमरेज कहा जाता है।

सामान्यतः इसकी परिभाषा इस प्रकार है:

  • सामान्य (नॉर्मल) डिलीवरी में: 500 मिलीलीटर या उससे अधिक रक्तस्राव
  • सिजेरियन ऑपरेशन में: 1000 मिलीलीटर या उससे अधिक रक्तस्राव
  • कोई भी ऐसा रक्तस्राव जिससे माँ का रक्तचाप गिरने लगे या उसकी हालत बिगड़ने लगे, चाहे मात्रा कुछ भी हो

पोस्टपार्टम हेमरेज के प्रकार

1. प्राइमरी (प्रारंभिक) PPH: यह बच्चे के जन्म के बाद पहले 24 घंटों में होता है। अधिकांश मामले इसी श्रेणी में आते हैं और यह अधिक खतरनाक होता है।

2. सेकेंडरी (द्वितीयक) PPH: यह डिलीवरी के 24 घंटे बाद से लेकर 12 सप्ताह के बीच कभी भी हो सकता है। इसके कारणों में गर्भाशय में बचा हुआ प्लेसेंटा का टुकड़ा या संक्रमण शामिल हैं।

पोस्टपार्टम हेमरेज के प्रमुख कारण

डॉक्टर इन कारणों को आसानी से याद रखने के लिए “4T” में बाँटते हैं:

1. टोन (Tone) – गर्भाशय का ढीला पड़ना: यह सबसे आम कारण है, जो लगभग 70-80 प्रतिशत मामलों में पाया जाता है। प्रसव के बाद गर्भाशय को सिकुड़कर कठोर हो जाना चाहिए, ताकि रक्त वाहिकाएँ दब जाएँ और खून बहना बंद हो जाए। जब गर्भाशय ठीक से नहीं सिकुड़ता, तो इसे यूटेराइन एटोनी (Uterine Atony) कहते हैं और रक्तस्राव जारी रहता है।

2. ट्रॉमा (Trauma) – चोट या कटाव: प्रसव के दौरान गर्भाशय, गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स), योनि या पेरिनियम में चोट या फटाव हो सकता है। गर्भाशय के फटने (यूटेराइन रप्चर) की स्थिति भी इसमें आती है।

3. टिश्यू (Tissue) – प्लेसेंटा के अवशेष: अगर प्लेसेंटा पूरी तरह बाहर न निकले या उसका कोई टुकड़ा अंदर रह जाए, तो गर्भाशय पूरी तरह सिकुड़ नहीं पाता और रक्तस्राव होता रहता है। प्लेसेंटा एक्रीटा जैसी स्थितियों में प्लेसेंटा गर्भाशय की दीवार से चिपक जाती है।

4. थ्रोम्बिन (Thrombin) – खून जमने की समस्या: कुछ महिलाओं में खून जमने की क्षमता कम होती है, जैसे ब्लीडिंग डिसऑर्डर में। प्रीक्लेम्पसिया, प्लेसेंटा का समय से पहले अलग हो जाना (एब्रप्शन) या गंभीर संक्रमण जैसी स्थितियों में भी ऐसा हो सकता है।

जोखिम कारक

कुछ महिलाओं में PPH का खतरा अधिक होता है। हालाँकि कई बार बिना किसी जोखिम कारक के भी यह हो जाता है, इसलिए हर प्रसव में सावधानी जरूरी है। प्रमुख जोखिम कारक हैं:

  • पिछली डिलीवरी में PPH होना
  • खून की कमी (एनीमिया)
  • जुड़वाँ या एक से अधिक बच्चे
  • बहुत बड़े आकार का शिशु
  • गर्भाशय में अधिक पानी (पॉलीहाइड्रेमनियोस)
  • लंबे समय तक चलने वाला प्रसव, या बहुत तेज प्रसव
  • प्रसव के लिए दवाओं से दर्द बढ़ाना या इंडक्शन
  • कई बार गर्भधारण (चार या अधिक प्रसव)
  • प्लेसेंटा प्रीविया या प्लेसेंटल एब्रप्शन
  • प्रीक्लेम्पसिया या उच्च रक्तचाप
  • मोटापा
  • सिजेरियन डिलीवरी या फोरसेप्स/वैक्यूम से प्रसव

लक्षण: इन्हें पहचानना क्यों जरूरी है

प्रसव के बाद इन लक्षणों को हल्के में न लें और तुरंत चिकित्सकीय मदद लें:

  • अत्यधिक रक्तस्राव, जैसे एक घंटे में एक से अधिक पैड भीग जाना
  • बड़े आकार के खून के थक्के निकलना
  • रक्तस्राव का रुकना नहीं या बढ़ते जाना
  • चक्कर आना, कमजोरी या बेहोशी
  • धड़कन तेज होना
  • त्वचा का पीला, ठंडा और पसीने से भरा होना
  • धुंधला दिखाई देना
  • सांस फूलना
  • रक्तचाप का गिरना
  • पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द या सूजन

ध्यान रखें कि प्रसव के बाद शुरुआती दिनों में हल्का रक्तस्राव (लोकिया) सामान्य है, जो कुछ हफ्तों तक चलता है और धीरे-धीरे कम होता जाता है। लेकिन अचानक रक्तस्राव का बढ़ जाना खतरे का संकेत है।

इलाज कैसे किया जाता है?

PPH एक आपातकालीन स्थिति है और इलाज में हर मिनट कीमती होता है। चिकित्सक आमतौर पर एक साथ कई कदम उठाते हैं:

1. प्रारंभिक उपाय:

  • गर्भाशय की मालिश (यूटेराइन मसाज) ताकि वह सिकुड़ जाए
  • मूत्राशय खाली करना (कैथेटर द्वारा), क्योंकि भरा मूत्राशय गर्भाशय को सिकुड़ने से रोकता है
  • नस के रास्ते तरल पदार्थ (IV फ्लूइड) और जरूरत पड़ने पर रक्त चढ़ाना

2. दवाएँ:

  • ऑक्सीटोसिन, जो गर्भाशय को सिकुड़ने में मदद करती है
  • मिसोप्रोस्टोल और अन्य गर्भाशय संकुचन बढ़ाने वाली दवाएँ
  • ट्रेनेक्सैमिक एसिड, जो खून को जमने में मदद करता है और जिसे जल्दी देना अधिक लाभकारी होता है

3. कारण के अनुसार इलाज:

  • योनि या गर्भाशय ग्रीवा के कटाव की टांके लगाकर मरम्मत
  • प्लेसेंटा के बचे हुए अवशेषों को निकालना
  • खून जमने की समस्या में आवश्यक रक्त उत्पाद देना

4. यदि रक्तस्राव फिर भी न रुके:

  • गर्भाशय में बैलून टैम्पोनेड लगाना
  • सर्जरी द्वारा रक्त वाहिकाओं को बाँधना या विशेष टांके लगाना
  • इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी द्वारा रक्त वाहिकाओं को बंद करना (एम्बोलाइजेशन)
  • अत्यंत गंभीर स्थिति में, माँ की जान बचाने के लिए गर्भाशय निकालना (हिस्टेरेक्टॉमी)

बचाव और रोकथाम

PPH के कई मामलों को सही तैयारी से रोका जा सकता है।

गर्भावस्था के दौरान:

  • नियमित प्रसवपूर्व जाँच (एंटीनेटल चेकअप) करवाएँ
  • हीमोग्लोबिन की जाँच कराएँ और खून की कमी हो तो आयरन-फोलिक एसिड की गोलियाँ लें तथा पौष्टिक आहार (हरी पत्तेदार सब्जियाँ, गुड़, चना, दालें, फल) लें
  • यदि पहले PPH हुआ हो, जुड़वाँ बच्चे हों या प्लेसेंटा नीचे हो, तो डॉक्टर को पहले से बताएँ ताकि ऐसे अस्पताल में प्रसव की योजना बने जहाँ रक्त और आपातकालीन सुविधाएँ उपलब्ध हों

प्रसव के समय:

  • प्रसव हमेशा प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी की देखरेख में, अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में कराएँ
  • तीसरे चरण का सक्रिय प्रबंधन (AMTSL) अपनाया जाए, जिसमें बच्चे के जन्म के तुरंत बाद ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन, नाल को नियंत्रित तरीके से निकालना और गर्भाशय की मालिश शामिल है। यह PPH का जोखिम काफी घटाता है

प्रसव के बाद:

  • कम से कम पहले कुछ घंटे तक माँ की निगरानी जरूरी है, जिसमें रक्तस्राव, नाड़ी और रक्तचाप देखे जाते हैं
  • शिशु को जल्दी स्तनपान शुरू कराएँ, इससे गर्भाशय के सिकुड़ने में मदद मिलती है
  • घर जाने के बाद भी रक्तस्राव पर नजर रखें

परिवार की भूमिका

पोस्टपार्टम हेमरेज में परिवार की जागरूकता जीवन बचा सकती है:

  • प्रसव से पहले ही नजदीकी ऐसे अस्पताल की पहचान कर लें जहाँ आपातकालीन सुविधाएँ और रक्त उपलब्ध हो
  • रक्तदाताओं की जानकारी पहले से रखें, और माँ का ब्लड ग्रुप पता रखें
  • वाहन या एम्बुलेंस की व्यवस्था तैयार रखें
  • घर पर प्रसव कराने की जिद न करें, क्योंकि PPH अचानक और बिना चेतावनी के हो सकता है
  • प्रसव के बाद अधिक रक्तस्राव को “सामान्य” कहकर टालें नहीं

ठीक होने के बाद

PPH से उबरने में समय लगता है। ऐसी माँ को अधिक आराम, आयरन युक्त पौष्टिक आहार और डॉक्टर के बताए अनुसार आयरन की दवाओं की जरूरत होती है। थकान, कमजोरी और चक्कर कुछ समय तक रह सकते हैं। कभी-कभी महिलाएँ भावनात्मक रूप से भी प्रभावित होती हैं, जैसे डर, चिंता या उदासी। ऐसे में परिवार का सहयोग और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या परामर्शदाता से बात करना मददगार होता है। अगली गर्भावस्था की योजना बनाते समय डॉक्टर को पिछले PPH के बारे में जरूर बताएँ, ताकि विशेष तैयारी की जा सके।

कुछ आम भ्रांतियाँ

  • “प्रसव के बाद खूब खून बहना शुभ या सामान्य है”: यह गलत है। अत्यधिक रक्तस्राव खतरनाक हो सकता है।
  • “घर पर दाई से प्रसव सुरक्षित है”: PPH जैसी जटिलताओं के लिए अस्पताल की सुविधाएँ अनिवार्य हैं।
  • “पहले प्रसव सामान्य रहा तो इस बार कोई खतरा नहीं”: PPH किसी भी प्रसव में हो सकता है।

निष्कर्ष

पोस्टपार्टम हेमरेज एक गंभीर लेकिन काफी हद तक रोकी जा सकने वाली स्थिति है। गर्भावस्था में खून की कमी दूर करना, नियमित जाँच, अस्पताल में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की देखरेख में प्रसव और प्रसव के बाद सतर्क निगरानी, इन सबसे माँ की जान को सुरक्षित रखा जा सकता है। यदि प्रसव के बाद रक्तस्राव असामान्य लगे, तो देर न करें और तुरंत चिकित्सकीय सहायता लें।

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