एक्टोपिक प्रेग्नेंसी (Ectopic Pregnancy - फैलोपियन ट्यूब में गर्भ ठहरना)
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एक्टोपिक प्रेगनेंसी (अस्थानिक गर्भावस्था): कारण, लक्षण, जांच और इलाज

परिचय

सामान्य गर्भावस्था में निषेचित अंडा (फर्टिलाइज़्ड एग) फैलोपियन ट्यूब से होता हुआ गर्भाशय (यूटरस) में पहुँचता है और उसकी दीवार से चिपककर विकसित होता है। लेकिन कभी-कभी यह अंडा गर्भाशय के बाहर कहीं और ठहर जाता है। इस स्थिति को एक्टोपिक प्रेगनेंसी कहते हैं।

लगभग 90 से 95 प्रतिशत मामलों में यह गर्भ फैलोपियन ट्यूब में ठहरता है, इसलिए इसे “ट्यूबल प्रेगनेंसी” भी कहा जाता है। कुछ मामलों में यह अंडाशय (ओवरी), गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स), पेट की गुहा या सिजेरियन ऑपरेशन के पुराने निशान में भी ठहर सकता है। अनुमान है कि लगभग 1 से 2 प्रतिशत गर्भावस्थाएँ एक्टोपिक होती हैं।

सबसे ज़रूरी बात यह है कि एक्टोपिक प्रेगनेंसी में गर्भ गर्भाशय के बाहर किसी भी हालत में सामान्य रूप से विकसित नहीं हो सकता। फैलोपियन ट्यूब या दूसरी जगहों में बढ़ते भ्रूण के लिए पर्याप्त स्थान और पोषण नहीं होता। समय पर इलाज न मिले तो ट्यूब फट सकती है और जानलेवा आंतरिक रक्तस्राव हो सकता है।

एक्टोपिक प्रेगनेंस�ी क्यों होती है? (कारण)

कई बार इसका कोई स्पष्ट कारण नहीं मिलता, पर कुछ स्थितियाँ फैलोपियन ट्यूब को क्षतिग्रस्त करती हैं या अंडे की गति को धीमा कर देती हैं:

  • पेल्विक इन्फ्लेमेटरी डिज़ीज़ (PID): क्लैमाइडिया या गोनोरिया जैसे संक्रमणों से ट्यूब में सूजन और निशान बन जाते हैं।
  • पहले हुई एक्टोपिक प्रेगनेंसी: एक बार हो चुकी हो तो दोबारा होने का जोखिम बढ़ जाता है।
  • पेट या पेल्विस की सर्जरी: फैलोपियन ट्यूब, अपेंडिक्स या पेल्विक क्षेत्र के ऑपरेशन के बाद चिपकाव (एडहेज़न) बन सकते हैं।
  • एंडोमेट्रियोसिस: इसमें गर्भाशय जैसी परत उसके बाहर बढ़ने लगती है और ट्यूब को प्रभावित कर सकती है।
  • ट्यूबल लिगेशन (नसबंदी) की विफलता या उसे खोलने का ऑपरेशन: ऐसी स्थिति में यदि गर्भ ठहरे, तो उसके एक्टोपिक होने की संभावना अधिक रहती है।
  • कॉपर-टी या हार्मोनल IUD के साथ गर्भ: ये गर्भधारण को बहुत कम करते हैं, पर यदि गर्भ ठहर जाए तो उसके एक्टोपिक होने की संभावना सामान्य से अधिक होती है।
  • प्रजनन उपचार: IVF जैसी तकनीकों के बाद जोखिम थोड़ा बढ़ सकता है।
  • धूम्रपान: यह ट्यूब की कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है।
  • उम्र: 35 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में जोखिम अपेक्षाकृत अधिक होता है।

ध्यान रखें कि कई महिलाओं में इनमें से कोई भी जोखिम कारक नहीं होता, फिर भी एक्टोपिक प्रेगनेंसी हो सकती है।

लक्षण

शुरुआती दौर में इसके लक्षण सामान्य गर्भावस्था जैसे ही लग सकते हैं: माहवारी का रुकना, जी मिचलाना, स्तनों में भारीपन और थकान। प्रेगनेंसी टेस्ट भी पॉज़िटिव आता है। आमतौर पर गर्भावस्था के 4 से 12 हफ्ते के बीच ये लक्षण दिखने लगते हैं:

  • पेट के निचले हिस्से या पेल्विस में दर्द, जो अक्सर एक तरफ़ ज़्यादा होता है
  • योनि से हल्का या असामान्य रक्तस्राव, जो आमतौर पर माहवारी से अलग होता है और गहरे भूरे या पानी जैसे रंग का भी हो सकता है
  • कंधे में दर्द, जो पेट में जमा रक्त के डायाफ्राम को परेशान करने से होता है
  • मलत्याग या पेशाब के समय दर्द या दबाव
  • कमज़ोरी, चक्कर आना या बेहोशी जैसा महसूस होना

आपातकालीन चेतावनी के संकेत

यदि ट्यूब फट जाए तो स्थिति गंभीर हो जाती है। ऐसे में निम्न लक्षण दिखें तो तुरंत अस्पताल पहुँचें या एम्बुलेंस बुलाएँ:

  • पेट में अचानक तेज़, असहनीय दर्द
  • बहुत चक्कर आना, बेहोशी या गिर पड़ना
  • चेहरे का पीला पड़ना, ठंडा पसीना आना
  • तेज़ धड़कन और रक्तचाप में गिरावट के लक्षण
  • कंधे में तेज़ दर्द के साथ कमज़ोरी

ये आंतरिक रक्तस्राव और शॉक के संकेत हो सकते हैं, जिनमें हर मिनट कीमती होता है।

जांच और निदान

यदि गर्भावस्था की पुष्टि के बाद ऊपर बताए लक्षण हों, तो डॉक्टर निम्न जांचें करते हैं:

  1. पेल्विक जांच: पेट के निचले हिस्से में कोमलता या गांठ की जाँच।
  2. ट्रांसवेजाइनल अल्ट्रासाउंड: यह सबसे अहम जाँच है। इसमें देखा जाता है कि गर्भ की थैली गर्भाशय के भीतर है या नहीं। कभी-कभी ट्यूब में गर्भ या पेट में मुक्त रक्त भी दिख जाता है।
  3. सीरम बीटा-hCG जांच: यह गर्भावस्था का हार्मोन है। सामान्य गर्भावस्था में शुरुआती दिनों में यह हर 48 घंटे में लगभग दोगुना होता है। एक्टोपिक में इसकी बढ़त धीमी या अनियमित होती है। इसलिए डॉक्टर 48 घंटे के अंतर पर दो बार जाँच दोहरा सकते हैं।
  4. खून की जांच: हीमोग्लोबिन और ब्लड ग्रुप (Rh फैक्टर) देखने के लिए।
  5. लैप्रोस्कोपी: जब निदान स्पष्ट न हो या स्थिति गंभीर हो, तब कैमरे वाली दूरबीन से पेट के भीतर देखा जाता है।

कई बार शुरुआती हफ्तों में अल्ट्रासाउंड में कुछ साफ़ नहीं दिखता। इसे “प्रेगनेंसी ऑफ़ अननोन लोकेशन” कहा जाता है, और ऐसे में डॉक्टर निगरानी में रखकर बार-बार जाँच करते हैं।

इलाज के विकल्प

इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि गर्भ कितना बड़ा है, hCG का स्तर क्या है, ट्यूब फटी है या नहीं, और महिला की स्थिति कैसी है।

1. प्रतीक्षा और निगरानी

कुछ चुनिंदा मामलों में, जब hCG का स्तर कम हो और अपने आप घट रहा हो और कोई गंभीर लक्षण न हों, तो डॉक्टर नियमित जाँच के साथ इंतज़ार कर सकते हैं। यह निर्णय केवल विशेषज्ञ की निगरानी में ही लिया जाता है।

2. दवा द्वारा इलाज (मेथोट्रेक्सेट)

यदि गर्भ छोटा हो, ट्यूब न फटी हो और महिला की हालत स्थिर हो, तो मेथोट्रेक्सेट नामक इंजेक्शन दिया जा सकता है। यह दवा तेज़ी से बढ़ने वाली कोशिकाओं को रोक देती है और शरीर गर्भ के ऊतक को धीरे-धीरे सोख लेता है। इसमें सर्जरी की ज़रूरत नहीं पड़ती, पर कई हफ्तों तक hCG की जाँच जारी रखनी पड़ती है। इस दौरान डॉक्टर की सलाह के अनुसार कुछ सावधानियाँ ज़रूरी हैं, जैसे फोलिक एसिड सप्लीमेंट न लेना, शराब से परहेज़ और कुछ दर्द-निवारक दवाओं से बचाव।

3. सर्जरी

यदि ट्यूब फट गई हो, तेज़ रक्तस्राव हो रहा हो या मेथोट्रेक्सेट उपयुक्त न हो, तो सर्जरी की जाती है। यह आमतौर पर लैप्रोस्कोपी (छोटे चीरों से) द्वारा होती है, और आपातकाल में खुली सर्जरी भी करनी पड़ सकती है। दो तरह की प्रक्रियाएँ होती हैं:

  • सैल्पिंगोस्टॉमी: ट्यूब को बचाते हुए केवल गर्भ को निकालना।
  • सैल्पिंजेक्टॉमी: क्षतिग्रस्त ट्यूब को पूरी तरह निकाल देना।

एक ट्यूब निकल जाने पर भी, यदि दूसरी ट्यूब स्वस्थ हो, तो भविष्य में प्राकृतिक रूप से गर्भधारण संभव रहता है।

Rh नेगेटिव ब्लड ग्रुप वाली महिलाएँ

यदि महिला का ब्लड ग्रुप Rh नेगेटिव है, तो भविष्य की गर्भावस्थाओं को सुरक्षित रखने के लिए डॉक्टर एंटी-D इम्युनोग्लोबुलिन का इंजेक्शन देते हैं।

क्या एक्टोपिक प्रेगनेंसी को बचाया या दूसरी जगह लगाया जा सकता है?

आम तौर पर नहीं। यह एक चिकित्सकीय सच्चाई है कि गर्भाशय के बाहर ठहरे गर्भ को सामान्य रूप से आगे बढ़ाया नहीं जा सकता। इसलिए इलाज का उद्देश्य माँ की जान और स्वास्थ्य की रक्षा करना है। यह किसी की गलती नहीं है, और इसे रोकने के लिए महिला ने कुछ “गलत” नहीं किया होता।

रिकवरी और भावनात्मक पक्ष

शारीरिक रूप से ठीक होने में सर्जरी के बाद आमतौर पर कुछ हफ्ते लगते हैं। दवा से इलाज में hCG के सामान्य होने तक कई हफ्ते लग सकते हैं।

भावनात्मक रूप से यह अनुभव बहुत कठिन हो सकता है। गर्भ का खोना, चिंता और अपराध-बोध की भावनाएँ स्वाभाविक हैं। परिवार, जीवनसाथी और ज़रूरत पड़ने पर काउंसलर से बात करना मददगार होता है। खुद को दोष न दें।

दोबारा गर्भधारण कब करें?

  • आमतौर पर डॉक्टर मेथोट्रेक्सेट के बाद कम से कम 3 महीने रुकने की सलाह देते हैं। सर्जरी के बाद का समय स्थिति के अनुसार तय होता है। अपने डॉक्टर से पूछकर ही योजना बनाएँ।
  • एक बार एक्टोपिक हो चुकी हो तो भी अधिकतर महिलाएँ बाद में स्वस्थ गर्भावस्था पाती हैं।
  • अगली बार गर्भ ठहरते ही जल्दी डॉक्टर से मिलें और शुरुआती अल्ट्रासाउंड करवाएँ, ताकि यह पुष्टि हो सके कि गर्भ गर्भाशय के भीतर है।

बचाव के उपाय

हर एक्टोपिक प्रेगनेंसी को रोका नहीं जा सकता, पर जोखिम कम किया जा सकता है:

  • सुरक्षित यौन व्यवहार अपनाएँ और यौन संचारित संक्रमणों की समय पर जाँच और इलाज कराएँ।
  • धूम्रपान छोड़ें।
  • पेल्विक संक्रमण के लक्षण (असामान्य स्राव, पेट दर्द, बुखार) को नज़रअंदाज़ न करें।
  • गर्भधारण की योजना बनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें, खासकर यदि पहले एक्टोपिक प्रेगनेंसी, ट्यूब की सर्जरी या IUD का इतिहास हो।
  • गर्भावस्था की पुष्टि होते ही शुरुआती हफ्तों में अल्ट्रासाउंड करवाएँ।

निष्कर्ष

एक्टोपिक प्रेगनेंसी एक गंभीर लेकिन पहचानी और इलाज की जा सकने वाली स्थिति है। मुख्य बात है जल्दी पहचान और समय पर इलाज। गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में पेट के निचले हिस्से में दर्द, असामान्य रक्तस्राव या चक्कर आने जैसे लक्षणों को कभी हल्के में न लें। सही समय पर इलाज मिलने पर अधिकतर महिलाएँ पूरी तरह स्वस्थ हो जाती हैं और भविष्य में माँ बनने की संभावना भी बनी रहती है।

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