रीनल आर्टरी स्टेनोसिस (Renal Artery Stenosis)
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रीनल आर्टरी स्टेनोसिस (Renal Artery Stenosis): कारण, लक्षण, जाँच और इलाज

परिचय

हमारे शरीर में दो गुर्दे (किडनी) होते हैं, जो रक्त को छानकर अपशिष्ट पदार्थों और अतिरिक्त पानी को मूत्र के रूप में बाहर निकालते हैं। इन गुर्दों तक खून पहुँचाने का काम “रीनल आर्टरी” यानी वृक्क धमनी करती है। जब यह धमनी सँकरी हो जाती है, तो गुर्दे तक पर्याप्त रक्त नहीं पहुँच पाता। इस स्थिति को रीनल आर्टरी स्टेनोसिस कहते हैं।

यह समस्या धीरे-धीरे बढ़ती है और शुरुआत में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते। फिर भी, यह अनियंत्रित उच्च रक्तचाप और किडनी की कार्यक्षमता में गिरावट का एक महत्वपूर्ण कारण है। समय पर पहचान और सही इलाज से गंभीर जटिलताओं से बचा जा सकता है।

रीनल आर्टरी स्टेनोसिस क्या है?

रीनल आर्टरी स्टेनोसिस में एक या दोनों गुर्दों की धमनियाँ सँकरी हो जाती हैं। जब गुर्दे को कम रक्त मिलता है, तो वे इसे शरीर में रक्त की कमी समझ लेते हैं। इसके जवाब में गुर्दे “रेनिन” नामक हार्मोन अधिक मात्रा में बनाते हैं। रेनिन एक श्रृंखला (रेनिन-एंजियोटेंसिन-एल्डोस्टेरोन प्रणाली) को सक्रिय करता है, जिससे रक्त वाहिकाएँ सिकुड़ती हैं और शरीर में नमक व पानी रुकता है। नतीजा यह होता है कि रक्तचाप बढ़ जाता है। इस प्रकार के उच्च रक्तचाप को रीनोवैस्कुलर हाइपरटेंशन कहा जाता है।

रीनल आर्टरी स्टेनोसिस के प्रमुख कारण

इस रोग के मुख्य रूप से दो कारण होते हैं:

1. एथेरोस्क्लेरोसिस (धमनी में प्लाक जमना)

यह सबसे आम कारण है, जो लगभग 90 प्रतिशत मामलों में पाया जाता है। इसमें कोलेस्ट्रॉल, वसा और अन्य पदार्थ धमनी की दीवार पर जमकर “प्लाक” बना लेते हैं, जिससे रास्ता तंग हो जाता है। यह प्रायः 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में होता है। इसके जोखिम कारक हैं:

  • लंबे समय से उच्च रक्तचाप
  • उच्च कोलेस्ट्रॉल
  • मधुमेह
  • धूम्रपान और तंबाकू का सेवन
  • मोटापा और निष्क्रिय जीवनशैली
  • परिवार में हृदय रोग का इतिहास

2. फाइब्रोमस्कुलर डिस्प्लेसिया (FMD)

यह अपेक्षाकृत कम आम कारण है और मुख्यतः 50 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं, विशेषकर युवा महिलाओं में देखा जाता है। इसमें धमनी की दीवार की मांसपेशियों और ऊतकों की असामान्य वृद्धि के कारण धमनी सँकरी हो जाती है। इसका सटीक कारण पूरी तरह ज्ञात नहीं है।

अन्य दुर्लभ कारण

  • धमनी में सूजन (जैसे टाकायासु आर्टराइटिस, जो भारत सहित एशियाई देशों में युवा महिलाओं में देखी जाती है)
  • गुर्दे की धमनी पर बाहरी दबाव (ट्यूमर आदि)
  • चोट या रेडिएशन के कारण धमनी को क्षति

लक्षण

रीनल आर्टरी स्टेनोसिस के लक्षण अक्सर तब तक नहीं दिखते जब तक रोग काफी बढ़ न जाए। कई बार इसका पता किसी और जाँच के दौरान संयोग से चलता है। संभावित लक्षण और संकेत इस प्रकार हैं:

  • कठिनाई से नियंत्रित होने वाला उच्च रक्तचाप: तीन या अधिक दवाइयाँ लेने के बाद भी रक्तचाप का काबू में न आना
  • कम उम्र में उच्च रक्तचाप: 30 वर्ष से पहले या 55 वर्ष के बाद अचानक शुरू हुआ हाई ब्लड प्रेशर
  • रक्तचाप का अचानक बिगड़ना: पहले नियंत्रित रक्तचाप का अचानक बढ़ जाना
  • पैरों, टखनों या शरीर में सूजन: शरीर में तरल पदार्थ रुकने के कारण
  • मूत्र की मात्रा में कमी
  • थकान, कमज़ोरी और भूख में कमी: किडनी की कार्यक्षमता घटने पर
  • खून की जाँच में क्रिएटिनिन का बढ़ना, खासकर कुछ रक्तचाप की दवाइयाँ (ACE इनहिबिटर या ARB) शुरू करने के बाद
  • अचानक फेफड़ों में पानी भरना (फ्लैश पल्मोनरी एडिमा): इसमें अचानक साँस फूलने की तकलीफ होती है और यह आपात स्थिति है
  • पेट में या पीठ के किनारे धमनी की आवाज़ (ब्रूट): डॉक्टर स्टेथोस्कोप से इसे सुन सकते हैं

जटिलताएँ

यदि इसका इलाज न किया जाए, तो निम्न समस्याएँ हो सकती हैं:

  • क्रॉनिक किडनी डिज़ीज़ (CKD): गुर्दे की कार्यक्षमता धीरे-धीरे घटती जाती है
  • किडनी का सिकुड़ना: लंबे समय तक रक्त की कमी से प्रभावित किडनी छोटी हो जाती है
  • हृदय रोग: हार्ट फेल्योर, दिल का दौरा
  • स्ट्रोक (लकवा): अनियंत्रित रक्तचाप के कारण
  • किडनी फेल्योर: गंभीर मामलों में डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की आवश्यकता

निदान (जाँच)

डॉक्टर लक्षणों, चिकित्सा इतिहास और शारीरिक जाँच के बाद निम्न जाँचें सुझा सकते हैं:

  1. रक्त और मूत्र परीक्षण: क्रिएटिनिन, यूरिया, इलेक्ट्रोलाइट्स और मूत्र में प्रोटीन की जाँच से किडनी की स्थिति का पता चलता है।
  2. रीनल डुप्लेक्स अल्ट्रासाउंड: यह सबसे पहली और सुरक्षित जाँच है। इसमें ध्वनि तरंगों से धमनी में रक्त प्रवाह की गति और किडनी का आकार देखा जाता है। इसमें कोई विकिरण या डाई नहीं लगती।
  3. सीटी एंजियोग्राफी (CTA): डाई के माध्यम से धमनियों की विस्तृत तस्वीर मिलती है।
  4. एमआर एंजियोग्राफी (MRA): चुंबकीय तरंगों से धमनियों की तस्वीर ली जाती है। जिन मरीज़ों की किडनी बहुत कमज़ोर हो, उनमें गैडोलिनियम डाई के उपयोग को लेकर सावधानी बरतनी पड़ती है।
  5. कैथेटर एंजियोग्राफी: यह सबसे सटीक जाँच मानी जाती है और अक्सर उपचार (स्टेंटिंग) के साथ ही की जाती है।

उपचार

उपचार का लक्ष्य रक्तचाप को नियंत्रित करना, किडनी की कार्यक्षमता को बचाना और हृदय-संबंधी जोखिम घटाना है। उपचार के तीन मुख्य तरीके हैं।

1. दवाइयाँ (मेडिकल थेरेपी)

अधिकांश मरीज़ों में शुरुआती और मुख्य उपचार दवाइयाँ ही होती हैं:

  • रक्तचाप की दवाइयाँ: ACE इनहिबिटर, ARB, कैल्शियम चैनल ब्लॉकर, बीटा-ब्लॉकर और मूत्रवर्धक। दोनों गुर्दों की धमनी सँकरी होने पर ACE इनहिबिटर/ARB बहुत सावधानी और डॉक्टर की निगरानी में ही दिए जाते हैं, क्योंकि ये किडनी की कार्यक्षमता को अचानक घटा सकती हैं।
  • स्टैटिन: कोलेस्ट्रॉल कम करने और प्लाक को बढ़ने से रोकने के लिए
  • एस्पिरिन या अन्य एंटीप्लेटलेट दवाइयाँ: रक्त के थक्के बनने का जोखिम घटाने के लिए
  • मधुमेह का नियंत्रण, यदि मरीज़ को मधुमेह है

2. एंजियोप्लास्टी और स्टेंटिंग

इसमें पैर या हाथ की धमनी के रास्ते एक पतली नली (कैथेटर) सँकरी जगह तक पहुँचाई जाती है। वहाँ गुब्बारा फुलाकर धमनी को चौड़ा किया जाता है और कई बार जाली जैसा स्टेंट लगाया जाता है ताकि धमनी खुली रहे। यह प्रक्रिया आमतौर पर तब विचार में ली जाती है जब:

  • दवाइयों के बावजूद रक्तचाप नियंत्रित न हो
  • किडनी की कार्यक्षमता तेज़ी से घट रही हो
  • बार-बार फेफड़ों में पानी भरने जैसी आपात स्थितियाँ हों

FMD के मामलों में केवल बैलून एंजियोप्लास्टी अक्सर बहुत अच्छे परिणाम देती है और स्टेंट की आवश्यकता कम पड़ती है।

3. शल्य चिकित्सा (सर्जरी)

जब एंजियोप्लास्टी संभव न हो या असफल रहे, तब बाईपास सर्जरी जैसी प्रक्रिया की जाती है, जिसमें रक्त के लिए नया रास्ता बनाया जाता है। आजकल यह अपेक्षाकृत कम ही की जाती है।

जीवनशैली में बदलाव

दवाइयों और उपचार के साथ जीवनशैली में सुधार अत्यंत आवश्यक है:

  • नमक कम खाएँ: रोज़ाना 5 ग्राम (लगभग एक छोटा चम्मच) से कम नमक लेने का प्रयास करें। अचार, पापड़, नमकीन और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों से बचें।
  • संतुलित आहार लें: ताज़े फल, सब्ज़ियाँ, साबुत अनाज और कम वसा वाले खाद्य पदार्थ अपनाएँ। तला-भुना और घी-तेल का अधिक सेवन कम करें।
  • धूम्रपान और तंबाकू पूरी तरह छोड़ें: यह धमनियों को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाने वाली आदतों में से है।
  • नियमित व्यायाम करें: डॉक्टर की सलाह से रोज़ 30 मिनट तेज़ चलना या हल्का व्यायाम लाभकारी है।
  • वज़न नियंत्रित रखें।
  • शराब सीमित करें या छोड़ दें।
  • घर पर रक्तचाप की नियमित जाँच करें और उसका रिकॉर्ड रखें।
  • बिना डॉक्टर की सलाह के दर्द निवारक दवाइयाँ (जैसे NSAIDs) न लें, क्योंकि ये किडनी पर बुरा असर डाल सकती हैं।

डॉक्टर से कब मिलें?

निम्न स्थितियों में तुरंत चिकित्सक से परामर्श लें:

  • रक्तचाप दवाइयों के बावजूद लगातार ऊँचा रहे
  • चेहरे, पैरों या शरीर में सूजन आए
  • पेशाब कम हो जाए या उसका रंग बदल जाए
  • अचानक साँस फूलने लगे या लेटने पर साँस लेने में तकलीफ हो
  • किडनी की जाँच में क्रिएटिनिन बढ़ा हुआ आए

किसी भी मरीज़ को, जिसे कम उम्र में हाई ब्लड प्रेशर हुआ हो या जिसका रक्तचाप नियंत्रित न हो रहा हो, नेफ्रोलॉजिस्ट (किडनी रोग विशेषज्ञ) या कार्डियोलॉजिस्ट से जाँच अवश्य करानी चाहिए।

बचाव

रीनल आर्टरी स्टेनोसिस से पूरी तरह बचाव हमेशा संभव नहीं होता, खासकर FMD जैसे कारणों में। लेकिन एथेरोस्क्लेरोसिस से होने वाले मामलों में जोखिम काफी हद तक घटाया जा सकता है। इसके लिए रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल और शुगर को नियंत्रण में रखें, स्वस्थ आहार लें, सक्रिय रहें और धूम्रपान से दूर रहें। 40 वर्ष की उम्र के बाद नियमित स्वास्थ्य जाँच कराते रहना भी उपयोगी है।

निष्कर्ष

रीनल आर्टरी स्टेनोसिस एक गंभीर लेकिन नियंत्रित की जा सकने वाली स्थिति है। यह चुपचाप बढ़ती है और अनियंत्रित उच्च रक्तचाप तथा किडनी की क्षति का कारण बन सकती है। यदि आपका रक्तचाप दवाइयों से काबू में नहीं आ रहा, या कम उम्र में ही हाई ब्लड प्रेशर हो गया है, तो इसे हल्के में न लें। समय पर जाँच, उचित दवाइयाँ, ज़रूरत पड़ने पर एंजियोप्लास्टी और स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर किडनी और हृदय दोनों की रक्षा की जा सकती है।

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