ज़ोलिंगर-एलिसन सिंड्रोम (Zollinger-Ellison Syndrome)
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ज़ोलिंगर-एलिसन सिंड्रोम: कारण, लक्षण, जाँच और इलाज

परिचय

पेट में अम्ल (एसिड) बनना पाचन के लिए ज़रूरी है, लेकिन जब यह ज़रूरत से बहुत ज़्यादा बनने लगे तो पेट और आँतों की भीतरी परत को नुकसान पहुँचाता है। ज़ोलिंगर-एलिसन सिंड्रोम (ZES) एक दुर्लभ बीमारी है जिसमें शरीर में एक छोटा ट्यूमर “गैस्ट्रिन” नामक हार्मोन बहुत अधिक मात्रा में बनाने लगता है। इससे पेट में एसिड का उत्पादन असामान्य रूप से बढ़ जाता है और बार-बार, कई जगह अल्सर (छाले) होने लगते हैं।

इस बीमारी की पहचान 1955 में अमेरिकी सर्जन डॉ. रॉबर्ट ज़ोलिंगर और डॉ. एडविन एलिसन ने की थी, इसी कारण इसका नाम उनके नाम पर पड़ा। यह बीमारी आम नहीं है, पर समय पर पहचान न हो तो गंभीर जटिलताएँ पैदा कर सकती है। इसलिए इसकी जानकारी होना ज़रूरी है।

यह बीमारी कैसे होती है?

सामान्य स्थिति में पेट की G-कोशिकाएँ भोजन के अनुसार सीमित मात्रा में गैस्ट्रिन हार्मोन छोड़ती हैं। यह हार्मोन पेट की अम्ल बनाने वाली कोशिकाओं को सक्रिय करता है। भोजन पचने के बाद यह प्रक्रिया अपने आप नियंत्रित हो जाती है।

ज़ोलिंगर-एलिसन सिंड्रोम में गैस्ट्रिनोमा नाम का ट्यूमर बिना रुके गैस्ट्रिन बनाता रहता है। नतीजा यह होता है कि:

  • पेट की अम्ल बनाने वाली कोशिकाएँ लगातार उत्तेजित रहती हैं
  • पेट और छोटी आँत में अत्यधिक एसिड जमा होता है
  • भोजन और पाचक एंजाइमों का काम बिगड़ जाता है
  • आहार नली, पेट और आँत की परत क्षतिग्रस्त होती है

गैस्ट्रिनोमा कहाँ बनता है? अधिकतर ये ट्यूमर छोटी आँत के पहले हिस्से (ड्यूओडेनम) या अग्न्याशय (पैंक्रियास) में पाए जाते हैं। ये आकार में अक्सर बहुत छोटे होते हैं, कभी-कभी कुछ मिलीमीटर के ही, इसलिए इन्हें खोजना कठिन हो सकता है। इनमें से काफ़ी ट्यूमर धीमी गति से बढ़ते हैं, लेकिन एक बड़ा हिस्सा कैंसरयुक्त (मैलिग्नेंट) हो सकता है और लिवर व लिम्फ नोड्स तक फैल सकता है।

बीमारी के प्रकार

1. छिटपुट (Sporadic) प्रकार: अधिकांश मरीज़ों में यह बिना किसी पारिवारिक इतिहास के अपने आप होता है।

2. MEN-1 से जुड़ा प्रकार: लगभग चौथाई मरीज़ों में यह “मल्टीपल एंडोक्राइन नियोप्लेसिया टाइप-1 (MEN-1)” नामक आनुवंशिक स्थिति का हिस्सा होता है। इसमें पैराथायरॉइड ग्रंथि, पिट्यूटरी ग्रंथि और अग्न्याशय में एक से अधिक ट्यूमर बन सकते हैं। ऐसे मरीज़ों में अक्सर पैराथायरॉइड की अधिक सक्रियता से रक्त में कैल्शियम भी बढ़ा हुआ मिलता है, जो गैस्ट्रिन को और बढ़ा देता है।

यह बीमारी आमतौर पर 30 से 50 वर्ष की उम्र के बीच पहचानी जाती है और पुरुषों में थोड़ी अधिक देखी जाती है। इसकी घटना प्रति दस लाख लोगों में सालाना कुछ ही मामलों की है।

लक्षण

ज़ोलिंगर-एलिसन सिंड्रोम के लक्षण आम अल्सर या एसिडिटी जैसे लगते हैं, इसीलिए इसकी पहचान में अक्सर देरी हो जाती है। प्रमुख लक्षण ये हैं:

  • पेट के ऊपरी हिस्से में जलन या दर्द: सबसे आम लक्षण। दर्द अक्सर खाली पेट या रात में बढ़ता है और कभी-कभी खाने या एंटासिड लेने से कुछ देर राहत मिलती है।
  • दस्त: बड़ी मात्रा में एसिड आँतों की परत और पाचक एंजाइमों को नुकसान पहुँचाता है, जिससे पानी जैसा दस्त या चिकना, दुर्गंधयुक्त मल (स्टिएटोरिया) हो सकता है। कई बार दस्त ही पहला लक्षण होता है।
  • सीने में जलन और खट्टी डकारें (GERD): आहार नली में एसिड ऊपर चढ़ने से।
  • मतली और उल्टी: कभी-कभी उल्टी में खून भी आ सकता है।
  • भूख कम लगना और वज़न घटना
  • काला, तारकोल जैसा मल: पाचन तंत्र में रक्तस्राव का संकेत।
  • कमज़ोरी और थकान: खून की कमी या पोषक तत्वों के अवशोषण में गड़बड़ी के कारण।

कब सतर्क हो जाना चाहिए?

नीचे की स्थितियों में डॉक्टर को ZES की संभावना पर विचार करना चाहिए:

  • अल्सर बार-बार लौट आए या सामान्य इलाज से ठीक न हो
  • अल्सर आँत के असामान्य हिस्सों (जैसे ड्यूओडेनम के आगे के भाग) में मिले
  • एक साथ कई अल्सर हों
  • H. pylori संक्रमण और एस्पिरिन/दर्दनिवारक दवाओं जैसे सामान्य कारण न मिलें
  • अल्सर के साथ लंबे समय से दस्त हो
  • परिवार में MEN-1 या हार्मोन-ग्रंथि संबंधी ट्यूमर का इतिहास हो
  • अल्सर के साथ रक्त में कैल्शियम अधिक निकले
  • अल्सर की सर्जरी के बाद भी अल्सर दोबारा बन जाए

जाँच और निदान

निदान कई चरणों में होता है।

1. फास्टिंग सीरम गैस्ट्रिन: पहली और सबसे महत्वपूर्ण जाँच। ZES में गैस्ट्रिन का स्तर आमतौर पर काफ़ी बढ़ा होता है। अगर स्तर बहुत ऊँचा हो और पेट का pH अम्लीय (लगभग 2 से कम) हो, तो निदान लगभग पक्का माना जाता है।

2. गैस्ट्रिक pH की जाँच: गैस्ट्रिन बढ़ने के कई अन्य कारण भी होते हैं, जैसे एट्रोफिक गैस्ट्राइटिस, जिसमें एसिड कम होता है। पेट के एसिड की जाँच इन दोनों स्थितियों में फ़र्क़ करने में मदद करती है।

3. सीक्रेटिन उत्तेजना परीक्षण: जब गैस्ट्रिन का स्तर संदिग्ध सीमा में हो, तब यह परीक्षण किया जाता है। सीक्रेटिन देने के बाद ZES के मरीज़ों में गैस्ट्रिन असामान्य रूप से बढ़ता है, जबकि सामान्य अल्सर में नहीं।

4. एंडोस्कोपी: ऊपरी पाचन तंत्र के अल्सर, सूजन और मोटी परतों को देखने के लिए।

5. ट्यूमर की स्थिति जानने के लिए इमेजिंग: CT स्कैन, MRI, एंडोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड (EUS) और सोमैटोस्टैटिन रिसेप्टर आधारित स्कैन (जैसे Ga-68 DOTATATE PET) से ट्यूमर की जगह और फैलाव का पता लगाया जाता है।

ज़रूरी सावधानी: प्रोटॉन पंप इनहिबिटर (PPI, जैसे ओमेप्राज़ोल, पैंटोप्राज़ोल) लेने से गैस्ट्रिन का स्तर बढ़ सकता है, जिससे जाँच के नतीजे भ्रामक हो सकते हैं। पर ZES में इन दवाओं को अचानक बंद करना ख़तरनाक हो सकता है, क्योंकि एसिड तेज़ी से बढ़कर जटिलताएँ पैदा कर सकता है। इसलिए दवा रोकने या बदलने का फ़ैसला केवल विशेषज्ञ डॉक्टर की निगरानी में ही लें।

इलाज

इलाज के दो मुख्य लक्ष्य हैं: पहला, एसिड को नियंत्रित करना, और दूसरा, ट्यूमर का इलाज करना।

1. एसिड नियंत्रण की दवाएँ

इलाज का आधार प्रोटॉन पंप इनहिबिटर (PPI) हैं, जिन्हें ZES में सामान्य से अधिक मात्रा में दिया जाता है। ये दवाएँ एसिड बनने की प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से रोकती हैं और ज़्यादातर मरीज़ों में लक्षणों से जल्दी राहत मिल जाती है। खुराक का निर्धारण डॉक्टर मरीज़ की स्थिति और एसिड की मात्रा के आधार पर करते हैं। खुराक समय पर और नियमित लेना बेहद ज़रूरी है। कुछ मरीज़ों में H2 ब्लॉकर जैसी अन्य दवाएँ भी सहायक के रूप में दी जाती हैं।

2. सर्जरी

अगर ट्यूमर एक ही जगह सीमित है और निकाला जा सकता है, तो सर्जरी सबसे अच्छा विकल्प हो सकती है, क्योंकि इससे बीमारी के पूरी तरह ठीक होने की संभावना रहती है। छिटपुट ZES में सर्जरी अधिक कारगर रहती है। MEN-1 वाले मरीज़ों में ट्यूमर कई और छोटे होते हैं, इसलिए सर्जरी का फ़ैसला अधिक सावधानी से लिया जाता है। ऐसे मरीज़ों में पैराथायरॉइड की समस्या का इलाज पहले करने से गैस्ट्रिन कम हो सकता है।

3. फैल चुके ट्यूमर का इलाज

अगर कैंसर लिवर या अन्य अंगों तक फैल गया हो, तो इलाज में ये विकल्प शामिल हो सकते हैं:

  • सोमैटोस्टैटिन एनालॉग्स (जैसे ऑक्ट्रियोटाइड) जो हार्मोन के उत्पादन और ट्यूमर की वृद्धि को धीमा करते हैं
  • कीमोथेरेपी या लक्षित (टार्गेटेड) दवाएँ
  • पेप्टाइड रिसेप्टर रेडियोन्यूक्लाइड थेरेपी (PRRT)
  • लिवर के ट्यूमर के लिए विशेष प्रक्रियाएँ, जैसे एम्बोलाइज़ेशन या एब्लेशन

मरीज़ के लिए कौन-सा इलाज उपयुक्त है, यह गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, सर्जन और ऑन्कोलॉजिस्ट की टीम मिलकर तय करती है।

संभावित जटिलताएँ

इलाज न होने या देर से इलाज होने पर ये समस्याएँ हो सकती हैं:

  • अल्सर से गंभीर रक्तस्राव
  • आँत में छेद (परफोरेशन)
  • आहार नली या आँत में संकुचन (स्ट्रिक्चर)
  • लंबे समय तक दस्त से कुपोषण और पानी व लवणों की कमी
  • ट्यूमर का लिवर व अन्य अंगों में फैलना

लंबे समय तक PPI लेने वालों में विटामिन B12, आयरन और मैग्नीशियम की कमी की संभावना रहती है, इसलिए समय-समय पर रक्त जाँच कराना अच्छा है।

जीवनशैली और देखभाल

दवा और इलाज मुख्य हैं, पर कुछ आदतें भी लाभदायक हैं:

  • डॉक्टर की बताई दवाएँ नियमित और सही समय पर लें, खुराक अपने आप न बदलें
  • धूम्रपान बिल्कुल छोड़ें, क्योंकि यह अल्सर को ठीक होने से रोकता है और एसिड बढ़ाता है
  • शराब से दूर रहें
  • बिना डॉक्टर की सलाह के एस्पिरिन, आइबुप्रोफेन जैसी दर्दनिवारक दवाएँ न लें
  • बहुत तीखा, तला-भुना भोजन कम करें, और जो चीज़ें आपके लक्षण बढ़ाती हैं, उनसे बचें
  • दस्त की स्थिति में पर्याप्त तरल पदार्थ लें
  • नियमित फॉलो-अप और जाँच करवाएँ
  • MEN-1 की स्थिति में परिवार के करीबी सदस्यों की जेनेटिक काउंसलिंग और जाँच पर विचार करें

रोग का पूर्वानुमान

समय पर निदान और सही इलाज से अधिकांश मरीज़ अच्छा जीवन जी सकते हैं। दवाओं से एसिड नियंत्रित रहता है, और जिन मरीज़ों में ट्यूमर निकाला जा सकता है, उनमें बेहतर परिणाम मिलते हैं। सबसे अहम बात यह है कि ट्यूमर का पता चलने की अवस्था और उसका फैलाव ही दीर्घकालिक परिणाम तय करते हैं। इसलिए लगातार निगरानी ज़रूरी है।

निष्कर्ष

ज़ोलिंगर-एलिसन सिंड्रोम दुर्लभ है, पर इसे पहचानना इसलिए ज़रूरी है कि इसके लक्षण आम अल्सर जैसे दिखते हैं। अगर अल्सर बार-बार लौट रहा हो, सामान्य इलाज से ठीक न हो रहा हो, या साथ में लंबे समय से दस्त और वज़न घटने की शिकायत हो, तो जाँच में देरी न करें। सही समय पर निदान, नियमित दवा और विशेषज्ञ की निगरानी से इस बीमारी को अच्छी तरह नियंत्रित किया जा सकता है।

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