टार्डिव डिस्किनेसिया (Tardive Dyskinesia)
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टार्डिव डिस्किनेसिया: जब दवा का दुष्प्रभाव शरीर की हरकतों पर हावी हो जाए

परिचय

कल्पना कीजिए कि किसी व्यक्ति की जीभ बार-बार अपने आप बाहर निकल रही है, होंठ चबाने जैसी मुद्रा में हिल रहे हैं या आँखें बिना चाहे झपक रही हैं। वह चाहकर भी इन हरकतों को रोक नहीं पाता। यह स्थिति न केवल शारीरिक रूप से असहज होती है, बल्कि सामाजिक जीवन और आत्मविश्वास पर भी गहरा असर डालती है। चिकित्सा जगत में इसे टार्डिव डिस्किनेसिया (Tardive Dyskinesia, TD) कहा जाता है।

“टार्डिव” का अर्थ है “देर से प्रकट होने वाला” और “डिस्किनेसिया” का अर्थ है “असामान्य, अनैच्छिक गतिविधि”। यानी यह ऐसी समस्या है जो दवा शुरू करने के महीनों या वर्षों बाद सामने आती है। इस लेख में हम इसके कारण, लक्षण, निदान, उपचार और बचाव के बारे में विस्तार से जानेंगे।

टार्डिव डिस्किनेसिया क्या है?

टार्डिव डिस्किनेसिया एक न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका-तंत्र से जुड़ा) विकार है। इसमें चेहरे, जीभ, होंठ, जबड़े, हाथ-पैर या धड़ की मांसपेशियों में बार-बार होने वाली, अनियंत्रित और बेमतलब हरकतें दिखाई देती हैं। यह मुख्य रूप से कुछ खास दवाओं के लंबे समय तक सेवन का दुष्प्रभाव है।

ये हरकतें व्यक्ति की इच्छा से नहीं होतीं। नींद के दौरान ये आमतौर पर रुक जाती हैं, जबकि तनाव, घबराहट या उत्तेजना में बढ़ सकती हैं। कई मामलों में मरीज को खुद इन हरकतों का पता नहीं चलता और परिवार वाले या डॉक्टर सबसे पहले इन्हें नोटिस करते हैं।

टार्डिव डिस्किनेसिया के कारण

इसका मुख्य कारण उन दवाओं का लंबे समय तक इस्तेमाल है जो मस्तिष्क में डोपामिन नामक रसायन के रिसेप्टर्स को रोकती हैं। इनमें शामिल हैं:

  • एंटीसाइकोटिक दवाएँ: हैलोपेरिडोल और क्लोरप्रोमेज़ीन जैसी पुरानी दवाएँ इसका सबसे बड़ा कारण मानी जाती हैं। रिसपेरिडोन और ओलानज़ापीन जैसी नई दवाओं में जोखिम कम होता है, पर शून्य नहीं।
  • मितली और पेट की दवाएँ: मेटोक्लोप्रामाइड (जैसे रेग्लान) और प्रोक्लोरपेराज़ीन।
  • कुछ अन्य दवाएँ: कभी-कभी कुछ एंटीडिप्रेसेंट या अन्य दवाएँ भी इससे जुड़ी पाई गई हैं।

माना जाता है कि डोपामिन रिसेप्टर्स लंबे समय तक अवरुद्ध रहने पर मस्तिष्क की कोशिकाएँ उनके प्रति अति-संवेदनशील हो जाती हैं। इससे गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले मस्तिष्क-मार्ग असंतुलित हो जाते हैं और अनैच्छिक हरकतें शुरू हो जाती हैं। हालाँकि इसकी सटीक क्रियाविधि पर अब भी शोध जारी है।

आमतौर पर लक्षण दवा लेने के कम से कम कुछ महीनों बाद दिखते हैं। बुजुर्गों में यह अवधि और छोटी हो सकती है।

किन लोगों में जोखिम अधिक होता है?

हर व्यक्ति में यह समस्या नहीं होती, लेकिन कुछ कारक जोखिम बढ़ाते हैं:

  • उम्र: बुजुर्गों में जोखिम अधिक है।
  • लिंग: रजोनिवृत्ति के बाद की महिलाओं में अपेक्षाकृत अधिक मामले देखे गए हैं।
  • दवा की अवधि और खुराक: जितने लंबे समय और जितनी अधिक खुराक में दवा ली जाए, जोखिम उतना बढ़ता है।
  • पुरानी प्रकार की एंटीसाइकोटिक दवाएँ
  • मधुमेह जैसी स्वास्थ्य स्थितियाँ
  • शराब या नशीले पदार्थों का सेवन
  • पहले से मस्तिष्क को क्षति या मूड संबंधी विकार

अध्ययनों के अनुसार, एंटीसाइकोटिक दवा लेने वाले लगभग 20 से 30 प्रतिशत लोगों में लंबे समय में यह समस्या विकसित हो सकती है। यह आँकड़ा अलग-अलग अध्ययनों में भिन्न मिलता है।

लक्षण

लक्षण हल्के से लेकर गंभीर तक हो सकते हैं और शरीर के अलग-अलग हिस्सों में दिखते हैं।

चेहरे और मुँह में:

  • होंठ सिकोड़ना या चटकाना
  • जीभ बार-बार बाहर निकालना या मुँह के अंदर घुमाना
  • लगातार चबाने जैसी हरकत
  • गाल फुलाना
  • बार-बार आँखें झपकाना या चेहरे पर अजीब भाव-भंगिमाएँ

हाथ-पैर में:

  • उँगलियों का अपने आप हिलना, जैसे पियानो बजा रहे हों
  • हाथ या पैर का झटकना, ऐंठना या थिरकना
  • पैर थपथपाना

धड़ में:

  • शरीर का आगे-पीछे झूलना
  • कमर या कूल्हों का हिलना

गंभीर मामलों में: बोलने, निगलने और चलने में कठिनाई हो सकती है। बहुत कम मामलों में साँस लेने के पैटर्न पर भी असर पड़ता है।

ये लक्षण केवल शारीरिक कष्ट तक सीमित नहीं रहते। मरीज अक्सर शर्मिंदगी महसूस करते हैं, लोगों से मिलना-जुलना कम कर देते हैं और अवसाद या चिंता का शिकार हो सकते हैं। जिन लोगों को पहले से मानसिक बीमारी है, उनके लिए यह दोहरी चुनौती बन जाती है।

निदान कैसे होता है?

टार्डिव डिस्किनेसिया की पुष्टि के लिए कोई एक खून या स्कैन की जाँच नहीं है। निदान मुख्यतः क्लिनिकल आकलन पर आधारित होता है:

  1. दवा का इतिहास: डॉक्टर पूछते हैं कि कौन-सी दवा, कितनी खुराक में और कितने समय से ली जा रही है।
  2. शारीरिक परीक्षण: डॉक्टर मरीज को बैठाकर या चलाकर, मुँह खोलने और जीभ निकालने को कहकर हरकतों को परखते हैं।
  3. मानकीकृत स्केल: एब्नॉर्मल इनवॉलंटरी मूवमेंट स्केल (AIMS) जैसे पैमाने से हरकतों की गंभीरता नापी जाती है।
  4. अन्य कारणों को बाहर करना: हंटिंग्टन रोग, विल्सन रोग, पार्किंसन से जुड़े लक्षण, थायरॉइड की समस्या या अन्य दवाओं के प्रभाव जैसी स्थितियाँ इससे मिलते-जुलते लक्षण दे सकती हैं। इसलिए ज़रूरत पड़ने पर खून की जाँच या ब्रेन इमेजिंग करवाई जा सकती है।

जो लोग एंटीसाइकोटिक दवाएँ ले रहे हैं, उनकी नियमित अंतराल पर ऐसी जाँच होनी चाहिए ताकि समस्या शुरुआती चरण में पकड़ी जा सके।

उपचार

उपचार की योजना हमेशा डॉक्टर तय करते हैं। मरीज को कभी भी अपनी मर्ज़ी से दवा अचानक बंद नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे मूल मानसिक बीमारी के लक्षण लौट सकते हैं और कभी-कभी हरकतें और बिगड़ भी सकती हैं।

1. दवा की समीक्षा: पहला कदम आमतौर पर वर्तमान दवा की समीक्षा है। डॉक्टर खुराक घटा सकते हैं, दवा बदल सकते हैं या कम जोखिम वाली दवा (जैसे क्लोज़ापीन) पर ले जा सकते हैं। मेटोक्लोप्रामाइड जैसी दवा से समस्या हुई हो तो उसे बंद करना ज़रूरी होता है।

2. VMAT2 अवरोधक दवाएँ: पिछले कुछ वर्षों में इस स्थिति के लिए विशेष दवाएँ आई हैं, जैसे वैलबेनाज़ीन और ड्यूटेट्राबेनाज़ीन। ये मस्तिष्क में डोपामिन के स्तर को नियंत्रित करके अनैच्छिक हरकतें घटाती हैं और अमेरिका में टीडी के इलाज के लिए स्वीकृत हैं। टेट्राबेनाज़ीन का उपयोग भी कुछ मामलों में किया जाता है। इन दवाओं के दुष्प्रभाव, जैसे उनींदापन और अवसाद की संभावना, पर ध्यान रखना पड़ता है। भारत में इनकी उपलब्धता और विकल्प अलग हो सकते हैं, इसलिए अपने मनोचिकित्सक या न्यूरोलॉजिस्ट से पूछना बेहतर है।

3. गंभीर मामलों में सर्जरी: जब दवाएँ कारगर न हों और लक्षण बहुत गंभीर हों, तब डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) पर विचार किया जा सकता है। यह विशेषज्ञ केंद्रों में ही उपलब्ध है।

4. सहायक उपाय: विटामिन ई और जिंकगो बिलोबा जैसे पूरकों पर कुछ अध्ययन हुए हैं, लेकिन उनके प्रभाव के प्रमाण सीमित हैं। इन्हें भी डॉक्टर की सलाह से ही लें।

कई मरीजों में दवा बदलने या रोकने के बाद लक्षण धीरे-धीरे सुधरते हैं, पर सभी में ऐसा नहीं होता। कुछ लोगों में यह स्थिति लंबे समय तक या स्थायी रूप से बनी रह सकती है। इसीलिए शुरुआती पहचान बहुत महत्वपूर्ण है।

रोकथाम

टीडी से बचाव इलाज से कहीं आसान है:

  • दवा तभी लें जब आवश्यक हो और सबसे कम प्रभावी खुराक में, जितने कम समय के लिए संभव हो।
  • नियमित जाँच करवाएँ। एंटीसाइकोटिक दवा लेने वालों की हर 6 से 12 महीने में हरकतों की जाँच होनी चाहिए।
  • मेटोक्लोप्रामाइड जैसी दवाएँ लंबे समय तक बिना डॉक्टरी सलाह के न लें। पेट की सामान्य समस्याओं में भी इनका दीर्घकालिक उपयोग टालना चाहिए।
  • नई दवाओं के विकल्प पर डॉक्टर से चर्चा करें, जहाँ चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त हो।
  • शराब और नशे से दूर रहें, और मधुमेह जैसी बीमारियों को नियंत्रण में रखें।
  • लक्षण दिखते ही बताएँ। जीभ या होंठ की कोई नई असामान्य हरकत दिखे तो उसे नज़रअंदाज़ न करें।

मरीज और परिवार के लिए सलाह

टीडी से जूझ रहे व्यक्ति को सबसे ज़्यादा ज़रूरत समझ और सहयोग की होती है। परिवार के सदस्यों को यह जानना चाहिए कि ये हरकतें व्यक्ति के नियंत्रण में नहीं हैं और इसके लिए उसे दोष नहीं देना चाहिए। यदि मरीज मानसिक बीमारी का इलाज करवा रहा है, तो दवा के लाभ और जोखिम दोनों को समझकर डॉक्टर के साथ मिलकर निर्णय लें।

मरीज को भी चाहिए कि वह अपने डॉक्टर से खुलकर बात करे, समय पर फॉलो-अप करवाए और भावनात्मक तनाव होने पर काउंसलिंग या सहायता समूहों की मदद ले। तनाव कम करने वाले उपाय, जैसे हल्का व्यायाम, पर्याप्त नींद और संतुलित आहार, समग्र स्वास्थ्य के लिए लाभदायक हैं, हालाँकि ये टीडी का इलाज नहीं हैं।

कब तुरंत डॉक्टर से मिलें?

  • चेहरे, जीभ या हाथ-पैर में नई अनैच्छिक हरकतें शुरू हों
  • मौजूदा हरकतें बढ़ती जा रही हों
  • खाने, बोलने या निगलने में परेशानी हो
  • हरकतों के कारण रोज़मर्रा के काम प्रभावित हों
  • उदासी, निराशा या अवसाद के लक्षण महसूस हों

निष्कर्ष

टार्डिव डिस्किनेसिया एक गंभीर लेकिन काफी हद तक टाली जा सकने वाली और प्रबंधन योग्य स्थिति है। मानसिक स्वास्थ्य और अन्य बीमारियों के लिए एंटीसाइकोटिक जैसी दवाएँ अनेक लोगों के जीवन को बेहतर बनाती हैं, इसलिए उन्हें डर के कारण छोड़ना समाधान नहीं है। ज़रूरी है जागरूकता, नियमित निगरानी और डॉक्टर के साथ खुला संवाद। समय पर पहचान होने पर दवा में बदलाव या आधुनिक उपचारों से लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

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