अफ्रीकन स्लीपिंग सिकनेस (African Trypanosomiasis)
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अफ्रीकन स्लीपिंग सिकनेस (African Trypanosomiasis)

परिचय

अफ्रीकन स्लीपिंग सिकनेस, जिसे चिकित्सीय भाषा में ह्यूमन अफ्रीकन ट्रिपैनोसोमियासिस (Human African Trypanosomiasis – HAT) कहा जाता है, एक परजीवी जनित रोग है जो उप-सहारा अफ्रीका के ग्रामीण क्षेत्रों में पाया जाता है। यह रोग ट्रिपैनोसोमा (Trypanosoma) नामक प्रोटोजोआ परजीवी के कारण होता है, जो संक्रमित त्सेत्से मक्खी (Tsetse Fly) के काटने से मनुष्यों में फैलता है। समय पर इलाज न मिलने पर यह रोग लगभग हमेशा घातक सिद्ध होता है, इसलिए इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा एक उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग (Neglected Tropical Disease) की श्रेणी में रखा गया है।

रोग का इतिहास और वर्तमान स्थिति

बीसवीं सदी में यह रोग अफ्रीका में एक बड़ी महामारी के रूप में सामने आया था। 1995 में लगभग 25,000 मामले दर्ज किए गए थे, जबकि लगभग 3,00,000 मामलों के अनदेखे रह जाने का अनुमान लगाया गया था, और उस समय लगभग 6 करोड़ लोगों को संक्रमण का खतरा माना गया था। हालांकि, पिछले दो दशकों में निरंतर निगरानी, स्क्रीनिंग और उपचार कार्यक्रमों के चलते मामलों की संख्या में भारी गिरावट आई है। 2022 में विश्व भर में केवल 837 मामले दर्ज किए गए, जो लगातार पांचवें वर्ष 1,000 से कम रहे।

इस उपलब्धि को देखते हुए WHO ने कई देशों को इस रोग को “सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या” के रूप में समाप्त करने का प्रमाणपत्र दिया है। टोगो पहला अफ्रीकी देश बना जिसने यह उपलब्धि हासिल की, इसके बाद बेनिन, कोत दिव्वार, युगांडा, इक्वेटोरियल गिनी, घाना और चाड जैसे देशों ने भी यह लक्ष्य प्राप्त किया। रवांडा ने रोग के रोडेसिएंस रूप को समाप्त करने में सफलता पाई है। WHO का लक्ष्य 2030 तक इस रोग के गैम्बिएंस स्वरूप के संचरण (transmission) को पूरी तरह समाप्त करना है।

रोग के कारण

यह रोग दो प्रकार के परजीवियों के कारण होता है:

1. ट्रिपैनोसोमा ब्रूसाई गैम्बिएंस (Trypanosoma brucei gambiense) — यह पश्चिमी और मध्य अफ्रीका के 24 देशों में पाया जाता है और वर्तमान में लगभग 97% मामलों के लिए जिम्मेदार है। यह रूप धीमी गति से बढ़ता है और रोगी को महीनों या वर्षों तक बिना गंभीर लक्षणों के संक्रमित रख सकता है, जिससे निदान में देरी होती है।

2. ट्रिपैनोसोमा ब्रूसाई रोडेसिएंस (Trypanosoma brucei rhodesiense) — यह पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका के लगभग 13 देशों में पाया जाता है और शेष मामलों के लिए जिम्मेदार है। यह रूप तेजी से बढ़ता है और कुछ ही हफ्तों में गंभीर स्थिति उत्पन्न कर सकता है।

संचरण की प्रक्रिया

यह रोग मुख्य रूप से संक्रमित त्सेत्से मक्खी के काटने से फैलता है। त्सेत्से मक्खी नदियों, झीलों और जंगलों के आसपास पाई जाती है, और यह संक्रमित मनुष्यों या जानवरों (जैसे मवेशी और जंगली जानवरों) से परजीवी ग्रहण करती है। इसके अतिरिक्त, यह रोग कुछ दुर्लभ मामलों में मां से बच्चे को गर्भावस्था के दौरान (मातृ-भ्रूण संचरण), संक्रमित रक्त चढ़ाने से, या दूषित सुइयों के माध्यम से भी फैल सकता है, हालांकि ऐसे मामले बहुत कम देखे गए हैं।

लक्षण

रोग के लक्षण दो चरणों में विकसित होते हैं:

पहला चरण (हीमोलिम्फेटिक चरण)

इस चरण में परजीवी रक्त, लसीका तंत्र और त्वचा के नीचे के ऊतकों में फैलते हैं। इस दौरान रोगी को हल्के फ्लू जैसे लक्षण दिखाई देते हैं:

  • बुखार
  • सिरदर्द
  • जोड़ों में दर्द
  • खुजली
  • गर्दन में सूजी हुई लसीका ग्रंथियां (विशेष रूप से गैम्बिएंस रूप में)

चूंकि ये लक्षण मलेरिया या टाइफाइड जैसे सामान्य रोगों से मिलते-जुलते हैं, इसलिए अक्सर इस चरण में सही निदान नहीं हो पाता।

दूसरा चरण (न्यूरोलॉजिकल चरण)

जब परजीवी रक्त-मस्तिष्क अवरोध (blood-brain barrier) को पार कर केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में प्रवेश कर जाते हैं, तब रोग अपने गंभीर चरण में पहुंच जाता है। इस चरण के लक्षणों में शामिल हैं:

  • व्यवहार में बदलाव
  • भ्रम की स्थिति
  • नींद के चक्र में गड़बड़ी (दिन में अत्यधिक नींद और रात में जागते रहना — इसी लक्षण के कारण रोग को “स्लीपिंग सिकनेस” नाम मिला)
  • समन्वय की कमी
  • यदि इलाज न हो तो अंततः कोमा और मृत्यु

निदान

रोग की पुष्टि के लिए तीन प्रमुख चरणों का पालन किया जाता है:

  1. स्क्रीनिंग — रक्त परीक्षण के माध्यम से संक्रमण के संकेतों की जांच की जाती है, जैसे कार्ड एग्लूटिनेशन टेस्ट (CATT)।
  2. निदान की पुष्टि — सूक्ष्मदर्शी के माध्यम से रक्त, लसीका ग्रंथि द्रव या रीढ़ की हड्डी के द्रव में परजीवी की उपस्थिति की पुष्टि की जाती है।
  3. चरण निर्धारण — रोगी के रीढ़ की हड्डी के तरल पदार्थ (cerebrospinal fluid) की जांच करके यह तय किया जाता है कि रोग पहले चरण में है या दूसरे (न्यूरोलॉजिकल) चरण में पहुंच चुका है, क्योंकि इसी आधार पर उपचार तय होता है।

शुरुआती जांच से न केवल रोग की जटिल और जोखिम भरी अवस्था से बचा जा सकता है, बल्कि इलाज की सफलता दर भी काफी बेहतर हो जाती है।

उपचार

उपचार रोग के परजीवी के प्रकार और चरण पर निर्भर करता है:

  • पहले चरण में पेंटामिडीन (गैम्बिएंस रूप के लिए) और सुरामिन (रोडेसिएंस रूप के लिए) जैसी दवाओं का प्रयोग किया जाता है।
  • दूसरे चरण में, जब परजीवी मस्तिष्क तक पहुंच चुके होते हैं, तब अधिक शक्तिशाली दवाओं की आवश्यकता होती है। पहले इस चरण के लिए मेलार्सोप्रोल नामक अत्यंत विषैली आर्सेनिक-आधारित दवा का उपयोग होता था, जो स्वयं कई रोगियों के लिए जानलेवा साबित होती थी। अब इसकी जगह अधिक सुरक्षित विकल्पों — जैसे निफर्टिमॉक्स-एफ्लोर्निथिन संयोजन चिकित्सा (NECT) और हाल के वर्षों में विकसित मौखिक दवा फेक्सिनिडाजोल — ने ले ली है, जिससे उपचार अधिक सुलभ और सुरक्षित हो गया है।

रोकथाम के उपाय

चूंकि इस रोग के लिए अभी तक कोई टीका उपलब्ध नहीं है, इसलिए रोकथाम मुख्य रूप से निम्नलिखित उपायों पर निर्भर करती है:

  • जोखिम वाले क्षेत्रों की जनसंख्या की सक्रिय स्क्रीनिंग ताकि संक्रमण का शुरुआती दौर में ही पता लगाया जा सके
  • त्सेत्से मक्खी की आबादी पर नियंत्रण, जैसे कीटनाशक-उपचारित जाल और पशुओं में परजीवी के जलाशय को कम करना
  • व्यक्तिगत सुरक्षा उपाय, जैसे हल्के रंग के पूरी बांह के कपड़े पहनना, क्योंकि त्सेत्से मक्खियां गहरे रंगों और चमकीले रंगों की ओर आकर्षित होती हैं
  • जंगली इलाकों और नदी किनारे झाड़ियों के पास जाने से बचना, जहां मक्खियों का घनत्व अधिक होता है

निष्कर्ष

अफ्रीकन स्लीपिंग सिकनेस एक ऐसा उदाहरण है जहां सतत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयासों, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और वैज्ञानिक अनुसंधान के मेल से एक कभी अत्यंत घातक मानी जाने वाली महामारी को नियंत्रण के करीब लाया जा सका है। हालांकि मामलों की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट आई है, फिर भी उप-सहारा अफ्रीका के दूरदराज और संसाधन-विहीन क्षेत्रों में यह रोग अब भी एक चुनौती बना हुआ है। निरंतर निगरानी, समय पर निदान और सुलभ उपचार सुविधाओं के बिना इस रोग के फिर से उभरने का खतरा बना रह सकता है। WHO का 2030 तक इस रोग के संचरण को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य इस दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते वैश्विक स्तर पर इस उपेक्षित रोग पर ध्यान और संसाधन निरंतर बने रहें

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