एपिग्लोटाइटिस (Epiglottitis - श्वासनली के ढक्कन की सूजन, जो जानलेवा हो सकती है)
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एपिग्लोटाइटिस: श्वासनली के ढक्कन की सूजन, जो जानलेवा हो सकती है

परिचय

हमारे गले में एक छोटी, पत्ती के आकार की संरचना होती है जिसे एपिग्लॉटिस (Epiglottis) या “घांटी ढक्कन” कहते हैं। यह जीभ की जड़ के पीछे, स्वर यंत्र (voice box) के ठीक ऊपर स्थित होती है। इसका काम बहुत महत्वपूर्ण है: जब हम कुछ निगलते हैं, तो यह श्वासनली के मुँह को ढक देती है ताकि भोजन या पानी फेफड़ों में न जाए। सामान्य साँस लेते समय यह खुली रहती है और हवा को आराम से गुज़रने देती है।

जब इसी एपिग्लॉटिस और आसपास के ऊतकों में संक्रमण या चोट के कारण तेज़ सूजन आ जाती है, तो इस स्थिति को एपिग्लोटाइटिस कहते हैं। सूजा हुआ ढक्कन श्वासनली के रास्ते को बंद करने लगता है और व्यक्ति को साँस लेने में गंभीर कठिनाई होती है। यह एक मेडिकल इमरजेंसी है, क्योंकि कुछ ही घंटों में स्थिति बिगड़कर साँस पूरी तरह रुक सकती है। समय पर इलाज मिलने पर अधिकांश मरीज़ पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, लेकिन देरी जानलेवा साबित हो सकती है।

यह किसे होता है?

पहले यह बीमारी मुख्यतः 2 से 6 वर्ष के बच्चों में देखी जाती थी। लेकिन बच्चों को दिए जाने वाले Hib टीके (Haemophilus influenzae type b) के व्यापक उपयोग के बाद बच्चों में इसके मामले बहुत कम हो गए हैं। आज वयस्कों में इसके मामले अपेक्षाकृत अधिक देखे जाते हैं, खासकर 40 से 50 वर्ष की उम्र के पुरुषों में। जिन बच्चों को टीकाकरण नहीं हुआ है, उनमें जोखिम अब भी बना रहता है।

निम्न लोगों में जोखिम अधिक होता है:

  • जिन बच्चों को Hib का टीका नहीं लगा या अधूरा लगा है
  • कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग (मधुमेह, एचआईवी, कैंसर का इलाज, स्टेरॉइड का लंबे समय तक सेवन)
  • धूम्रपान करने वाले और नशीले पदार्थों का धुआँ लेने वाले लोग
  • बार-बार गले के संक्रमण से पीड़ित लोग

एपिग्लोटाइटिस के कारण

1. जीवाणु संक्रमण (सबसे आम कारण)

  • हीमोफिलस इन्फ्लुएंज़ा टाइप b (Hib): बच्चों में सबसे प्रमुख कारण रहा है।
  • स्ट्रेप्टोकोकस न्यूमोनिया और ग्रुप A स्ट्रेप्टोकोकस: वयस्कों में आम।
  • स्टैफिलोकोकस ऑरियस, जिसमें MRSA भी शामिल है।

2. वायरल और फंगल संक्रमण

कभी-कभी वायरस या फंगस भी कारण बनते हैं, विशेषकर उन लोगों में जिनकी प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होती है।

3. गैर-संक्रामक कारण

  • बहुत गर्म खाना, पेय या भाप से गला जलना
  • रासायनिक पदार्थों का निगल जाना
  • गले में किसी बाहरी वस्तु का फँस जाना या चोट लगना
  • क्रैक कोकीन या अन्य नशीले पदार्थों का धुआँ लेना
  • गले में गंभीर एलर्जी की प्रतिक्रिया

लक्षण

एपिग्लोटाइटिस के लक्षण बहुत तेज़ी से, अक्सर कुछ घंटों में, बढ़ते हैं। शुरुआत सामान्य गले के दर्द जैसी लग सकती है, लेकिन यह जल्दी ही गंभीर रूप ले लेती है।

प्रमुख लक्षण:

  • बहुत तेज़ गले का दर्द, जो सामान्य गले की खराश से कहीं ज़्यादा होता है
  • निगलने में दर्द और कठिनाई
  • तेज़ बुखार और ठंड लगना
  • आवाज़ का दब जाना या “मुँह में आलू रखकर बोलने” जैसी धीमी, दबी आवाज़
  • साँस लेते समय स्ट्राइडर यानी ऊँची सीटी जैसी आवाज़
  • साँस लेने में कठिनाई और तेज़ साँस चलना
  • लार निगल न पाने के कारण मुँह से लार टपकना (विशेषकर बच्चों में)
  • बेचैनी, घबराहट और डर

खतरे का संकेत: ऐसे मरीज़ अक्सर आगे की ओर झुककर, गर्दन बाहर निकालकर, मुँह खोले और जीभ बाहर निकाले बैठते हैं। इसे ट्राइपॉड पोज़िशन कहते हैं। इस मुद्रा में उन्हें साँस लेना थोड़ा आसान लगता है। बच्चे लेटने से मना करते हैं और रोने या चिल्लाने से स्थिति और बिगड़ सकती है।

बच्चों में डॉक्टर तीन प्रमुख लक्षणों पर ध्यान देते हैं: लार टपकना, निगलने में कठिनाई और साँस लेने में परेशानी। ये तीनों साथ दिखें तो तुरंत अस्पताल पहुँचना चाहिए।

एपिग्लोटाइटिस खतरनाक क्यों है?

एपिग्लॉटिस की सूजन से श्वासनली का मार्ग संकरा होता जाता है। बच्चों में यह मार्ग वैसे ही छोटा होता है, इसलिए थोड़ी सी सूजन भी हवा का रास्ता लगभग बंद कर सकती है। यदि सूजन और बढ़ जाए तो अचानक पूर्ण वायुमार्ग अवरोध हो सकता है, जिसमें कुछ मिनटों में मरीज़ की साँस रुक जाती है और ऑक्सीजन की कमी से बेहोशी या मृत्यु तक हो सकती है।

इसके अलावा संक्रमण खून में फैलकर सेप्सिस, गले या छाती में फोड़ा (abscess), निमोनिया और अन्य जटिलताएँ भी पैदा कर सकता है।

निदान कैसे होता है?

एपिग्लोटाइटिस के निदान में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सबसे पहले वायुमार्ग की सुरक्षा देखी जाती है, जाँचें उसके बाद आती हैं।

नैदानिक जाँच: डॉक्टर मरीज़ के लक्षण, साँस की स्थिति और मुद्रा देखकर संदेह करते हैं। बच्चों में गले के अंदर जीभ दबाने वाले उपकरण (टंग डिप्रेसर) से जाँच नहीं की जाती, क्योंकि इससे गला अचानक सिकुड़ सकता है और साँस रुक सकती है। यदि मरीज़ की हालत गंभीर है तो जाँच ऑपरेशन थिएटर या ICU जैसी जगह पर की जाती है, जहाँ तुरंत साँस की नली डालने की व्यवस्था हो।

फ्लेक्सिबल लैरिंगोस्कोपी: एक पतली, लचीली नली (कैमरे के साथ) नाक के रास्ते से डालकर एपिग्लॉटिस को सीधे देखा जाता है। सूजा हुआ, लाल “चेरी जैसा” ढक्कन निदान की पुष्टि करता है। यह जाँच केवल अनुभवी डॉक्टर ही करते हैं।

गर्दन का एक्स-रे: साइड से लिए गए एक्स-रे में सूजी हुई एपिग्लॉटिस अँगूठे जैसी दिखती है, जिसे “थंब साइन” कहते हैं। हालाँकि गंभीर मरीज़ को एक्स-रे के लिए भेजने से पहले वायुमार्ग सुरक्षित करना ज़रूरी है।

अन्य जाँचें: खून की जाँच, ब्लड कल्चर और गले का कल्चर संक्रमण के प्रकार की पहचान में मदद करते हैं। कुछ मामलों में CT स्कैन भी किया जाता है।

इलाज

1. वायुमार्ग की सुरक्षा (सबसे पहली प्राथमिकता)

इलाज का पहला कदम साँस का रास्ता खुला रखना है। मरीज़ को अस्पताल के इमरजेंसी या गहन चिकित्सा इकाई (ICU) में भर्ती किया जाता है। यदि साँस में गंभीर रुकावट हो तो एंडोट्रेकियल इंट्यूबेशन यानी मुँह या नाक से श्वास नली डालकर साँस दिलाई जाती है। बहुत गंभीर स्थिति में, जब नली डालना संभव न हो, तो गले में छोटा चीरा लगाकर ट्रैकियोस्टोमी या क्रिकोथायरोटॉमी की जाती है।

2. एंटीबायोटिक दवाएँ

जीवाणु संक्रमण के लिए नसों के ज़रिए (IV) एंटीबायोटिक दिए जाते हैं, जैसे सेफ्ट्रियाक्सोन या सेफोटैक्सिम। MRSA का संदेह होने पर वैंकोमाइसिन जैसी दवा भी जोड़ी जाती है। कल्चर रिपोर्ट आने पर दवा बदली जा सकती है। आमतौर पर 7 से 10 दिन का कोर्स दिया जाता है।

3. सहायक उपचार

  • IV द्रव (fluids) ताकि शरीर में पानी की कमी न हो
  • बुखार और दर्द के लिए दवाएँ
  • ऑक्सीजन और नमी वाली हवा
  • कुछ मामलों में डॉक्टर सूजन घटाने के लिए स्टेरॉइड दे सकते हैं, हालाँकि इसके उपयोग पर चिकित्सकों में एकमत नहीं है

आमतौर पर मरीज़ को तब तक ICU में रखा जाता है जब तक सूजन कम न हो जाए। ज़्यादातर मरीज़ 2 से 3 दिन में सुधरने लगते हैं और इलाज के बाद पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं।

घर पर क्या करें और क्या नहीं?

यदि किसी में ऊपर बताए लक्षण दिखें, विशेषकर लार टपकना, साँस में सीटी जैसी आवाज़ या साँस लेने में दिक्कत, तो:

  • तुरंत निकटतम अस्पताल के इमरजेंसी विभाग पहुँचें या एम्बुलेंस बुलाएँ।
  • मरीज़ को शांत रखें और उसे जिस मुद्रा में आराम मिले, उसी में बैठा रहने दें। बच्चे को उसके माता-पिता की गोद में रखें।
  • मरीज़ को ज़बरदस्ती लिटाएँ नहीं।
  • मुँह में उँगली या चम्मच डालकर गला देखने की कोशिश बिल्कुल न करें।
  • घरेलू नुस्खों, जैसे गरारे या काढ़े, में समय बर्बाद न करें। हर मिनट कीमती है।
  • कुछ खाने-पीने को न दें।

रोकथाम

  1. Hib टीकाकरण: बच्चों को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के अनुसार Hib युक्त पेंटावैलेंट टीका समय पर लगवाएँ। यह इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है।
  2. न्यूमोकोकल टीका: बच्चों और जोखिम वाले वयस्कों में यह अतिरिक्त सुरक्षा देता है।
  3. धूम्रपान और नशे से दूरी: धूम्रपान और नशीले पदार्थों का धुआँ गले को नुकसान पहुँचाता है।
  4. हाथों की स्वच्छता: बार-बार साबुन से हाथ धोने से संक्रमण फैलने की संभावना कम होती है।
  5. संक्रमित व्यक्ति से दूरी: यदि परिवार में किसी को Hib संक्रमण हुआ है, तो डॉक्टर की सलाह पर घर के अन्य सदस्यों, विशेषकर छोटे बच्चों, को रोकथाम की दवा दी जा सकती है।
  6. मधुमेह और अन्य बीमारियों का नियंत्रण: प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने के लिए पुरानी बीमारियों का सही इलाज कराएँ।

निष्कर्ष

एपिग्लोटाइटिस भले ही अपेक्षाकृत दुर्लभ बीमारी हो, लेकिन इसकी गंभीरता को कम नहीं आँकना चाहिए। गले में तेज़ दर्द, निगलने में तकलीफ़, दबी आवाज़ और साँस लेने में कठिनाई जैसे लक्षण सामान्य सर्दी-ज़ुकाम की तरह टाले नहीं जाने चाहिए। इस बीमारी में समय ही सबसे बड़ा कारक है: जितनी जल्दी अस्पताल पहुँचेंगे और वायुमार्ग सुरक्षित होगा, जीवन बचने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।

बच्चों का समय पर टीकाकरण, स्वस्थ जीवनशैली और लक्षणों के प्रति सतर्कता इस खतरे से बचाव के सबसे कारगर उपाय हैं। याद रखें, यदि किसी को गले के दर्द के साथ लार टपक रही हो और साँस लेने में परेशानी हो रही हो, तो इसे आपातकालीन स्थिति मानकर तुरंत चिकित्सा सहायता लें।

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