लुडविग एंजाइना (Ludwig's Angina - मुंह के तल की सूजन)
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लुडविग एंजाइना (Ludwig’s Angina): मुंह के तल का जानलेवा संक्रमण

परिचय

लुडविग एंजाइना मुंह के तल (floor of the mouth) और गर्दन के ऊपरी हिस्से में फैलने वाला एक गंभीर और तेज़ी से बढ़ने वाला जीवाणु संक्रमण है। नाम में “एंजाइना” होने से लगता है कि यह हृदय की बीमारी है, पर ऐसा नहीं है। यहाँ “एंजाइना” का मूल अर्थ “गला घुटने या दम घुटने जैसी अनुभूति” है। इस रोग में जीभ के नीचे और जबड़े के नीचे के ऊतकों में सूजन आती है, जो सांस की नली को दबाकर जान के लिए खतरा बन सकती है।

इस रोग का वर्णन सबसे पहले 1836 में जर्मन चिकित्सक विल्हेल्म फ्रेडरिक वॉन लुडविग ने किया था, इसलिए इसे उन्हीं के नाम से जाना जाता है। एंटीबायोटिक दवाओं से पहले के दौर में इसकी मृत्यु दर बहुत अधिक थी। आज आधुनिक इलाज से स्थिति काफ़ी बेहतर हुई है, लेकिन देर होने पर यह अब भी जानलेवा हो सकता है।

यह संक्रमण कहाँ होता है?

हमारे निचले जबड़े के नीचे कुछ गहरी जगहें (fascial spaces) होती हैं। ये मांसपेशियों और झिल्लियों के बीच बनी खाली जगहें हैं, जिनमें ढीला ऊतक भरा रहता है। लुडविग एंजाइना में तीन जगहें प्रभावित होती हैं:

  • सबमैंडिबुलर स्पेस (जबड़े के नीचे की जगह)
  • सबलिंगुअल स्पेस (जीभ के नीचे की जगह)
  • सबमेंटल स्पेस (ठोड़ी के नीचे की जगह)

इस रोग की पहचान यह है कि संक्रमण दोनों तरफ़ फैलता है और आमतौर पर ऊतकों की सूजन या कड़ापन (cellulitis) के रूप में होता है, मवाद की एक थैली (abscess) के रूप में नहीं। ये जगहें आपस में जुड़ी होती हैं और गर्दन की गहरी जगहों से भी संपर्क रखती हैं। इसलिए संक्रमण बहुत जल्दी फैलता है।

प्रमुख कारण

लगभग 70 से 90 प्रतिशत मामलों में इसका स्रोत दाँत का संक्रमण होता है। निचले जबड़े की दूसरी और तीसरी दाढ़ों (wisdom tooth सहित) की जड़ें उस मांसपेशी-रेखा के नीचे तक पहुँचती हैं जो इन गहरी जगहों को अलग करती है। इसलिए इन दाँतों का मवाद सीधे इन जगहों में उतर सकता है।

अन्य कारण इस प्रकार हैं:

  • दाँत निकलवाने के बाद संक्रमण
  • मुंह या जबड़े में चोट या जबड़े का फ्रैक्चर
  • जीभ या होंठ में छेद करवाना (piercing)
  • टॉन्सिल के आसपास का फोड़ा
  • लार ग्रंथि (सबमैंडिबुलर ग्रंथि) का संक्रमण
  • मुंह के अंदर के घाव या कैंसर से जुड़े संक्रमण

किन लोगों में जोखिम अधिक है?

  • मधुमेह (डायबिटीज़) के रोगी, खासकर जिनकी शुगर नियंत्रित नहीं रहती
  • कमज़ोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता वाले लोग, जैसे HIV से ग्रसित, कीमोथेरेपी या स्टेरॉयड लेने वाले
  • कुपोषित लोग और अत्यधिक शराब पीने वाले
  • मुंह की सफ़ाई पर ध्यान न देने वाले और सड़े दाँतों का इलाज न कराने वाले
  • नशे के इंजेक्शन का सेवन करने वाले

भारत में दाँतों की समस्या को अक्सर टाल दिया जाता है। “दर्द है तो दर्द की गोली खा लो” वाली आदत इस रोग के मामलों को गंभीर बना देती है।

संक्रमण के जीवाणु

यह संक्रमण आमतौर पर कई प्रकार के जीवाणुओं का मिश्रण (polymicrobial) होता है। इनमें स्ट्रेप्टोकोकस और स्टैफिलोकोकस के साथ-साथ ऑक्सीजन के बिना पनपने वाले अवायवीय (anaerobic) जीवाणु, जैसे प्रीवोटेला, फ्यूसोबैक्टीरियम और पेप्टोस्ट्रेप्टोकोकस, प्रमुख हैं। एंटीबायोटिक का चुनाव इसी मिश्रण को ध्यान में रखकर किया जाता है।

लक्षण

शुरुआत अक्सर दाँत के दर्द और जबड़े के पास हल्की सूजन से होती है। कुछ घंटों से लेकर एक-दो दिन में लक्षण तेज़ी से बिगड़ सकते हैं:

  • जबड़े के नीचे और गर्दन के ऊपरी हिस्से में दोनों तरफ़ दर्दनाक सूजन, जो छूने पर लकड़ी की तरह सख्त लगती है
  • मुंह के तल का ऊपर उठ जाना और जीभ का ऊपर-पीछे की ओर धकेल दिया जाना
  • मुंह पूरा न खुल पाना (trismus)
  • निगलने में कठिनाई और दर्द, लार का मुंह से बाहर टपकना
  • आवाज़ का दबा हुआ या “मुंह में गर्म आलू” जैसा हो जाना
  • बुखार, कंपकंपी, कमज़ोरी और तेज़ धड़कन
  • साँस लेने में तकलीफ़, साँस के साथ सीटी जैसी आवाज़ (stridor), और मरीज़ का आगे झुककर बैठना, क्योंकि लेटने पर साँस और रुकती है
  • गंभीर स्थिति में होंठों या त्वचा का नीला पड़ना और बेचैनी

खतरनाक जटिलताएँ

इस रोग का सबसे बड़ा खतरा साँस की नली का बंद होना है। जीभ के पीछे खिसकने और गले के ऊतकों की सूजन से हवा का रास्ता तेज़ी से संकरा हो सकता है। इसके अलावा ये जटिलताएँ हो सकती हैं:

  • संक्रमण का गर्दन की गहरी जगहों से छाती में उतरना (मीडियास्टिनाइटिस), जो बेहद गंभीर स्थिति है
  • रक्त में संक्रमण फैलना (सेप्सिस) और सेप्टिक शॉक
  • गर्दन की बड़ी रक्त नलिकाओं में थक्का बनना या संक्रमण
  • फेफड़ों में संक्रमण, जब मवाद साँस के साथ अंदर चला जाए
  • मस्तिष्क या हृदय की झिल्ली तक संक्रमण का पहुँचना, हालाँकि यह दुर्लभ है

निदान (जाँच)

निदान मुख्यतः लक्षणों और शारीरिक जाँच पर आधारित होता है। डॉक्टर मुंह और गर्दन की जाँच करते हैं और सबसे पहले साँस की स्थिति देखते हैं। इसके बाद ये जाँचें की जाती हैं:

  • कंट्रास्ट CT स्कैन: संक्रमण की सीमा, मवाद की थैली और साँस की नली पर दबाव दिखाने के लिए यह सबसे उपयोगी जाँच है। यह तभी कराई जाती है जब मरीज़ की साँस स्थिर हो, क्योंकि स्कैन के दौरान लेटना जोखिम भरा हो सकता है।
  • रक्त जाँच: श्वेत रक्त कोशिकाएँ, इन्फ्लेमेशन के मार्कर, ब्लड शुगर और कल्चर
  • मवाद का कल्चर: सही एंटीबायोटिक चुनने के लिए
  • दाँतों का एक्स-रे: संक्रमित दाँत पहचानने के लिए

उपचार

इलाज के तीन मुख्य स्तंभ हैं: साँस की सुरक्षा, एंटीबायोटिक, और ज़रूरत पड़ने पर सर्जरी।

1. साँस की नली की सुरक्षा (सबसे ज़रूरी): मरीज़ को तुरंत अस्पताल, अधिकतर आईसीयू में भर्ती किया जाता है। जब साँस की नली को खतरा हो, तो अनुभवी विशेषज्ञ नाक या मुंह से ट्यूब डालकर (अक्सर फाइबरऑप्टिक तकनीक से, मरीज़ के जागते हुए) साँस का रास्ता सुरक्षित करते हैं। यह संभव न हो या स्थिति बिगड़ जाए, तो गर्दन में छेद करके (ट्रेकियोस्टॉमी या क्रिकोथायरोटॉमी) साँस का वैकल्पिक रास्ता बनाया जाता है।

2. नसों के ज़रिए एंटीबायोटिक: जाँच के नतीजों की प्रतीक्षा किए बिना तुरंत व्यापक असर वाले एंटीबायोटिक शुरू किए जाते हैं, जो कई प्रकार के जीवाणुओं पर काम करें। आम तौर पर पेनिसिलिन-समूह की दवा के साथ अवायवीय जीवाणुओं पर असर करने वाली दवा दी जाती है। अगर MRSA का संदेह हो, तो उसके लिए अलग दवा जोड़ी जाती है। कल्चर की रिपोर्ट आने पर दवा बदली जा सकती है। साथ में नसों से तरल पदार्थ, दर्द की दवा और मधुमेह के मरीज़ों में शुगर का नियंत्रण किया जाता है।

3. शल्य चिकित्सा (सर्जरी): अगर मवाद की थैली बन गई हो, गैस या ऊतक के गलने के संकेत हों, या केवल दवा से सुधार न हो, तो मवाद निकालने के लिए सर्जरी की जाती है। संक्रमण के स्रोत, यानी सड़े या संक्रमित दाँत, को भी निकालना या उसका इलाज करना ज़रूरी है, वरना संक्रमण दोबारा हो सकता है।

4. अन्य सहायक उपाय: कुछ मामलों में सूजन कम करने के लिए स्टेरॉयड पर विचार किया जाता है, पर इस पर चिकित्सकों में एक राय नहीं है और यह निर्णय विशेषज्ञ करते हैं। मरीज़ को तब तक निगरानी में रखा जाता है जब तक सूजन घट न जाए और वह ठीक से साँस और भोजन न ले सके।

पूर्वानुमान

समय पर पहचान और उचित इलाज मिलने पर अधिकांश मरीज़ ठीक हो जाते हैं। एंटीबायोटिक युग से पहले मृत्यु दर बहुत ऊँची थी, जबकि आज उन्नत चिकित्सा केंद्रों में यह काफ़ी कम रह गई है। लेकिन देर से अस्पताल पहुँचने, मधुमेह या कमज़ोर प्रतिरोधक क्षमता जैसी स्थितियों में और छाती तक संक्रमण फैल जाने पर जोखिम काफ़ी बढ़ जाता है।

रोकथाम

अधिकांश मामलों की जड़ दाँतों की उपेक्षा है, इसलिए रोकथाम सरल है:

  • दिन में दो बार ब्रश करें और नियमित रूप से फ्लॉस या माउथवॉश का उपयोग करें
  • साल में कम से कम एक बार दाँतों की जाँच कराएँ
  • दाँत के दर्द, सूजन या मवाद को नज़रअंदाज़ न करें और सड़े दाँत का समय पर इलाज कराएँ
  • मधुमेह को नियंत्रण में रखें
  • जीभ या होंठ में छेद करवाते समय साफ़-सफ़ाई और प्रशिक्षित व्यक्ति का ध्यान रखें
  • तंबाकू और शराब से बचें
  • दंत चिकित्सक की दी हुई एंटीबायोटिक का कोर्स पूरा करें और खुद से दवा बंद न करें

तुरंत डॉक्टर के पास कब जाएँ?

अगर दाँत के दर्द या सूजन के साथ इनमें से कोई भी लक्षण दिखे, तो बिना देर किए नज़दीकी अस्पताल के आपातकालीन विभाग पहुँचें:

  • जबड़े या गर्दन के नीचे तेज़ी से बढ़ती सूजन
  • साँस लेने या निगलने में तकलीफ़
  • मुंह न खुल पाना या लार टपकना
  • बुखार के साथ आवाज़ में बदलाव
  • जीभ का ऊपर उठा हुआ या मोटा लगना

ऐसी स्थिति में घरेलू नुस्खों या इंतज़ार में समय गँवाना खतरनाक हो सकता है।

निष्कर्ष

लुडविग एंजाइना एक दुर्लभ पर आपातकालीन स्थिति है, जिसमें कुछ ही घंटों में हालत बिगड़ सकती है। इसकी जड़ अक्सर एक साधारण-से दाँत के संक्रमण में होती है, जिसे समय पर इलाज न मिलने पर यह जानलेवा रूप ले लेता है। जागरूकता, मुंह की स्वच्छता और लक्षणों की शीघ्र पहचान से इस खतरे से बचा जा सकता है। याद रखें, जबड़े के नीचे बढ़ती सूजन के साथ साँस या निगलने में तकलीफ़ होना एक चिकित्सकीय आपातकाल है, इसमें तुरंत अस्पताल पहुँचना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है।

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