यूरेटरल स्ट्रिक्चर (Ureteral Stricture - पेशाब की नली का सिकुड़ना)
| |

यूरेटरल स्ट्रिक्चर (Ureteral Stricture) — पेशाब की नली का सिकुड़ना

परिचय

हमारे शरीर में दोनों किडनी से बने पेशाब (मूत्र) को मूत्राशय (Bladder) तक पहुँचाने का काम दो पतली नलियाँ करती हैं, जिन्हें यूरेटर (Ureter) कहा जाता है। जब किसी कारणवश इन नलियों में कहीं भी असामान्य रूप से सिकुड़न (Narrowing) आ जाती है, तो इस स्थिति को यूरेटरल स्ट्रिक्चर कहते हैं। यह सिकुड़न पेशाब के सामान्य प्रवाह में रुकावट डालती है, जिसके कारण मूत्र किडनी की ओर वापस जमा होने लगता है। समय पर इलाज न मिलने पर यह स्थिति किडनी को स्थायी नुकसान पहुँचा सकती है, इसलिए इसे गंभीरता से समझना और समय पर उपचार कराना बेहद आवश्यक है।

यूरेटर क्या है और यह कैसे काम करता है?

यूरेटर लगभग 25 से 30 सेंटीमीटर लंबी एक पतली, मांसपेशीय नली होती है जो किडनी के “रीनल पेल्विस” से शुरू होकर मूत्राशय में जाकर खुलती है। इसकी दीवारें लयबद्ध रूप से सिकुड़ती और फैलती हैं (इस क्रिया को पेरिस्टाल्सिस कहते हैं), जिससे पेशाब की बूंदें धीरे-धीरे किडनी से मूत्राशय की ओर धकेली जाती हैं। जब इस नली के किसी हिस्से में सूजन, घाव या दबाव के कारण जगह संकरी हो जाती है, तो पेशाब का यह स्वाभाविक प्रवाह बाधित हो जाता है।

यूरेटरल स्ट्रिक्चर के कारण

यूरेटरल स्ट्रिक्चर मुख्यतः दो प्रकार के कारणों से होता है — जन्मजात (Congenital) और अर्जित (Acquired)।

1. जन्मजात कारण

कुछ बच्चों में जन्म से ही यूरेटर की संरचना में असामान्यता होती है, जैसे कि यूरेटर और किडनी के जुड़ाव वाले स्थान (Ureteropelvic Junction) पर संकुचन। यह जन्मजात दोष अक्सर बचपन में ही पहचान में आ जाता है।

2. अर्जित कारण (जीवन में बाद में विकसित होने वाले)

  • किडनी स्टोन (पथरी): पथरी बार-बार यूरेटर से गुजरने के कारण उसकी भीतरी दीवार को नुकसान पहुँचा सकती है।
  • सर्जरी के बाद जटिलता: पेट, किडनी, गर्भाशय या प्रोस्टेट से संबंधित सर्जरी के दौरान यूरेटर को अनजाने में चोट लग सकती है, जिससे बाद में घाव भरने के दौरान सिकुड़न बन जाती है।
  • रेडिएशन थेरेपी: कैंसर के इलाज के लिए दी जाने वाली रेडिएशन थेरेपी यूरेटर के ऊतकों को प्रभावित कर सकती है।
  • संक्रमण (Infection): बार-बार होने वाला मूत्र मार्ग संक्रमण या तपेदिक (टीबी) जैसी बीमारियाँ यूरेटर में घाव बना सकती हैं।
  • ट्यूमर या कैंसर: यूरेटर के आसपास या उसमें ही बनने वाली गांठ नली को दबाकर संकरा कर सकती है।
  • एंडोमेट्रियोसिस: महिलाओं में यह स्थिति कभी-कभी यूरेटर के आसपास के ऊतकों को प्रभावित कर सकती है।
  • रेट्रोपेरिटोनियल फाइब्रोसिस: पेट के पिछले हिस्से में असामान्य रेशेदार ऊतक बनने से भी यूरेटर दब सकता है।
  • यूरेटेरोस्कोपी जैसी प्रक्रियाओं के बाद: पथरी निकालने के लिए की गई एंडोस्कोपिक प्रक्रियाओं के बाद भी कभी-कभी सिकुड़न विकसित हो जाती है।

लक्षण

यूरेटरल स्ट्रिक्चर के लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि रुकावट कितनी गंभीर है और यह कितनी तेज़ी से विकसित हुई है। कई बार शुरुआती अवस्था में कोई लक्षण नज़र ही नहीं आते और यह समस्या किसी अन्य जाँच के दौरान संयोग से पकड़ में आती है। सामान्य लक्षणों में शामिल हैं:

  • पेट के एक तरफ या पीठ के निचले हिस्से (कमर) में दर्द, जो कभी-कभी बहुत तेज़ और ऐंठन जैसा हो सकता है
  • बार-बार होने वाला मूत्र मार्ग संक्रमण (UTI)
  • बुखार और ठंड लगना (यदि संक्रमण मौजूद हो)
  • पेशाब में खून आना (Hematuria)
  • मतली और उल्टी
  • पेशाब का प्रवाह कम होना या पेशाब करने में कठिनाई
  • लंबे समय तक अनुपचारित रहने पर किडनी की सूजन (Hydronephrosis) और धीरे-धीरे किडनी की कार्यक्षमता में कमी

निदान (Diagnosis)

डॉक्टर सबसे पहले मरीज़ का पूरा मेडिकल इतिहास लेते हैं और शारीरिक जाँच करते हैं। इसके बाद सटीक निदान के लिए कई जाँचें की जा सकती हैं:

  • अल्ट्रासाउंड: किडनी में सूजन (Hydronephrosis) का पता लगाने के लिए यह सबसे पहली और आसान जाँच है।
  • CT यूरोग्राम: यह सबसे विस्तृत जानकारी देने वाली जाँच है, जिससे सिकुड़न की सटीक जगह, लंबाई और कारण का पता चलता है।
  • इंट्रावीनस पाइलोग्राम (IVP): एक विशेष डाई इंजेक्ट करके एक्स-रे के माध्यम से मूत्र मार्ग की तस्वीर ली जाती है।
  • रेट्रोग्रेड पाइलोग्राम: सिस्टोस्कोपी के दौरान यूरेटर में सीधे डाई डालकर सिकुड़न की जगह देखी जाती है।
  • MAG-3 रीनल स्कैन (न्यूक्लियर स्कैन): इससे यह पता चलता है कि रुकावट के कारण किडनी की कार्यक्षमता पर कितना असर पड़ा है।
  • यूरेटेरोस्कोपी: एक पतली दूरबीन जैसी नली डालकर डॉक्टर सीधे यूरेटर के अंदर सिकुड़न को देख सकते हैं।
  • खून की जाँच: क्रिएटिनिन और अन्य किडनी फंक्शन टेस्ट से यह पता चलता है कि किडनी कितनी ठीक तरह काम कर रही है।

उपचार के विकल्प

उपचार का चुनाव सिकुड़न की लंबाई, जगह, गंभीरता और इसके कारण पर निर्भर करता है। मुख्य उपचार विकल्प इस प्रकार हैं:

1. एंडोस्कोपिक उपचार (न्यूनतम चीरफाड़ वाली प्रक्रियाएँ)

छोटी और कम गंभीर सिकुड़न के लिए यह पहला विकल्प होता है।

  • बैलून डायलेशन: एक छोटा गुब्बारा (बैलून) यूरेटर के अंदर सिकुड़े हुए स्थान पर फुलाकर नली को चौड़ा किया जाता है।
  • यूरेटरल स्टेंटिंग: एक पतली, लचीली नली (स्टेंट) यूरेटर के अंदर कुछ समय के लिए डाली जाती है ताकि पेशाब सामान्य रूप से बह सके और नली को खुला रखने में मदद मिले।
  • एंडोयूरेटेरोटॉमी: एंडोस्कोप की मदद से सिकुड़े हुए हिस्से पर एक छोटा-सा नियंत्रित कट लगाया जाता है, जिससे नली चौड़ी हो जाती है।

2. सर्जिकल उपचार (ओपन या लेप्रोस्कोपिक/रोबोटिक सर्जरी)

जब सिकुड़न लंबी हो, बार-बार वापस आ रही हो, या एंडोस्कोपिक उपचार असफल हो जाए, तो सर्जरी की आवश्यकता पड़ती है:

  • यूरेटेरल रीइम्प्लांटेशन: यूरेटर के प्रभावित हिस्से को मूत्राशय से दोबारा जोड़ा जाता है, खासकर जब सिकुड़न निचले हिस्से में हो।
  • यूरेटेरोयूरेटेरोस्टॉमी: सिकुड़े हुए हिस्से को निकालकर यूरेटर के दोनों स्वस्थ सिरों को आपस में जोड़ दिया जाता है।
  • बुआरी फ्लैप प्रोसीजर: जब लंबा हिस्सा प्रभावित हो, तो मूत्राशय के ऊतक का उपयोग करके नली की कमी को पूरा किया जाता है।
  • इलियल यूरेटर रिप्लेसमेंट: बहुत लंबी या जटिल सिकुड़न में आँत के एक हिस्से का उपयोग करके यूरेटर का पुनर्निर्माण किया जाता है।
  • किडनी की ऑटोट्रांसप्लांटेशन: दुर्लभ और जटिल मामलों में किडनी को शरीर के दूसरे स्थान पर प्रत्यारोपित किया जाता है।

3. अस्थायी उपाय

यदि तुरंत सर्जरी संभव न हो या मरीज़ की स्थिति स्थिर करने की आवश्यकता हो, तो डॉक्टर अस्थायी रूप से नेफ्रोस्टॉमी ट्यूब (सीधे किडनी से त्वचा के बाहर निकाली गई नली) डाल सकते हैं, ताकि पेशाब का सुरक्षित निकास बना रहे और किडनी को नुकसान से बचाया जा सके।

उपचार के बाद देखभाल

सर्जरी या प्रक्रिया के बाद डॉक्टर नियमित रूप से अल्ट्रासाउंड, CT स्कैन या रीनल फंक्शन टेस्ट के माध्यम से यह जाँचते हैं कि सिकुड़न दोबारा तो नहीं बन रही और किडनी की कार्यक्षमता सामान्य बनी हुई है या नहीं। कुछ महीनों तक स्टेंट लगा रहना आम बात है, जिसे बाद में एक छोटी प्रक्रिया द्वारा निकाल दिया जाता है। मरीज़ों को पर्याप्त पानी पीने, संक्रमण के लक्षणों पर ध्यान देने और डॉक्टर द्वारा बताई गई फॉलो-अप जाँचों को समय पर कराने की सलाह दी जाती है।

संभावित जटिलताएँ (यदि इलाज न कराया जाए)

अगर यूरेटरल स्ट्रिक्चर का समय पर इलाज नहीं किया जाता, तो निम्नलिखित गंभीर समस्याएँ हो सकती हैं:

  • हाइड्रोनेफ्रोसिस: किडनी में पेशाब जमा होने से उसमें सूजन आ जाना
  • किडनी संक्रमण (पाइलोनेफ्राइटिस): जो कभी-कभी जानलेवा भी हो सकता है
  • किडनी की कार्यक्षमता में स्थायी कमी या किडनी फेल होना
  • बार-बार पथरी बनना
  • सेप्सिस: गंभीर मामलों में संक्रमण पूरे शरीर में फैल सकता है

निष्कर्ष

यूरेटरल स्ट्रिक्चर एक ऐसी स्थिति है जिसे नज़रअंदाज़ करना खतरनाक हो सकता है, लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसके निदान और उपचार के कई प्रभावी विकल्प मौजूद हैं। यदि किसी व्यक्ति को कमर या पेट में बार-बार दर्द, बार-बार मूत्र संक्रमण या पेशाब में खून जैसे लक्षण दिखाई दें, तो बिना देरी किए किसी यूरोलॉजिस्ट (मूत्र रोग विशेषज्ञ) से जाँच अवश्य करानी चाहिए। समय पर सही निदान और उचित उपचार से किडनी को होने वाले स्थायी नुकसान से बचाया जा सकता है और मरीज़ पूरी तरह से स्वस्थ जीवन जी सकता है।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *