इओसिनोफिलिक गैस्ट्रोएंटेराइटिस (Eosinophilic Gastroenteritis): कारण, लक्षण, जाँच और उपचार
प्रस्तावना
हमारा पाचन तंत्र रोज़ अनगिनत बाहरी तत्वों के संपर्क में आता है, जैसे भोजन, पानी, बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीव। सामान्यतः हमारी रोग-प्रतिरोधक प्रणाली इनके बीच अंतर कर लेती है और अनावश्यक प्रतिक्रिया नहीं देती। लेकिन कुछ लोगों में यह प्रणाली गड़बड़ा जाती है और पाचन तंत्र की दीवारों में एक विशेष प्रकार की श्वेत रक्त कोशिकाएँ, जिन्हें इओसिनोफिल कहते हैं, ज़रूरत से ज़्यादा जमा होने लगती हैं। इस स्थिति को इओसिनोफिलिक गैस्ट्रोएंटेराइटिस (EGE) कहा जाता है।
यह एक दुर्लभ और दीर्घकालिक (क्रॉनिक) रोग है, जिसमें पेट और छोटी आँत में सूजन रहती है। चूँकि इसके लक्षण अन्य आम पाचन रोगों जैसे अपच, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम या अल्सर से मिलते-जुलते हैं, इसलिए इसकी पहचान में अक्सर देरी हो जाती है। इस लेख में हम इस रोग के हर पहलू को सरल भाषा में समझेंगे।
इओसिनोफिल क्या हैं?
इओसिनोफिल श्वेत रक्त कोशिकाओं (WBC) का एक प्रकार हैं, जो अस्थि मज्जा (बोन मैरो) में बनती हैं। इनका मुख्य कार्य परजीवी संक्रमणों से लड़ना और एलर्जी की प्रतिक्रियाओं में भाग लेना है। स्वस्थ व्यक्ति के पाचन तंत्र में इनकी संख्या सीमित रहती है। लेकिन EGE में ये कोशिकाएँ पेट या आँत की दीवार में बड़ी संख्या में एकत्र हो जाती हैं और वहाँ ऐसे रसायन छोड़ती हैं जो ऊतकों में सूजन, घाव और क्षति पैदा करते हैं।
इओसिनोफिलिक गैस्ट्रोएंटेराइटिस क्या है?
यह इओसिनोफिलिक जठरांत्र विकारों (Eosinophilic Gastrointestinal Disorders, EGIDs) के समूह का एक सदस्य है। इस समूह में शामिल हैं:
- इओसिनोफिलिक इसोफेजाइटिस: भोजन नली में
- इओसिनोफिलिक गैस्ट्राइटिस/गैस्ट्रोएंटेराइटिस: पेट और छोटी आँत में
- इओसिनोफिलिक कोलाइटिस: बड़ी आँत में
जब पेट (गैस्ट्रो) और छोटी आँत (एंटेरो) दोनों प्रभावित होते हैं, तो उसे गैस्ट्रोएंटेराइटिस कहा जाता है। यह रोग किसी भी उम्र में हो सकता है, लेकिन अधिकतर 20 से 50 वर्ष की आयु के बीच देखा जाता है। बच्चों में भी इसके मामले मिलते हैं। कई अध्ययनों में पुरुषों में थोड़ी अधिक संभावना बताई गई है।
कारण
इस रोग का सटीक कारण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। माना जाता है कि यह अति-संवेदनशील प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (हाइपरसेंसिटिविटी) का परिणाम है। संभावित कारक इस प्रकार हैं:
1. खाद्य एलर्जी: दूध, अंडा, गेहूँ, सोया, मूँगफली, मेवे और समुद्री भोजन जैसे खाद्य पदार्थ कई मामलों में इसे ट्रिगर करते हैं।
2. एलर्जी का पारिवारिक या व्यक्तिगत इतिहास: जिन लोगों को अस्थमा, एक्ज़िमा, हे-फीवर या एलर्जिक राइनाइटिस होता है, उनमें इस रोग की संभावना अधिक होती है। लगभग आधे मरीज़ों में एलर्जी का इतिहास मिलता है।
3. आनुवंशिक कारण: परिवार में इसी तरह के रोग होने पर जोखिम बढ़ सकता है।
4. प्रतिरक्षा तंत्र की गड़बड़ी: कुछ प्रतिरक्षा प्रोटीन (साइटोकाइन), जैसे IL-5 और इओटैक्सिन, इओसिनोफिल को आँतों की ओर आकर्षित करते हैं।
5. अन्य कारक: कुछ दवाएँ या पर्यावरणीय एलर्जी भी भूमिका निभा सकती हैं।
लक्षण
EGE के लक्षण इस बात पर निर्भर करते हैं कि आँत की दीवार की कौन-सी परत प्रभावित है। इसके तीन प्रमुख प्रकार माने जाते हैं:
1. म्यूकोसल (श्लेष्मा परत) प्रकार
यह सबसे आम प्रकार है। इसमें दिखाई दे सकते हैं:
- पेट में दर्द और ऐंठन
- मतली और उल्टी
- दस्त
- भूख में कमी
- वज़न घटना
- आयरन की कमी से एनीमिया
- मल में खून (कभी-कभी)
- प्रोटीन का रिसाव, जिससे शरीर में कमी हो सकती है
बच्चों में इससे विकास की गति धीमी पड़ सकती है और किशोरों में यौवन में देरी हो सकती है।
2. मांसपेशीय (मस्कुलर) प्रकार
इसमें आँत की मांसपेशीय परत मोटी हो जाती है, जिससे पाचन नली संकरी हो सकती है। लक्षण हैं:
- बार-बार उल्टी
- पेट फूलना
- तेज़ दर्द
- आँत में रुकावट (ऑब्स्ट्रक्शन) के लक्षण
3. सीरोसल (बाहरी परत) प्रकार
यह सबसे दुर्लभ प्रकार है। इसमें पेट की गुहा में तरल जमा हो जाता है, जिसे इओसिनोफिलिक एसाइटिस कहते हैं। इसके लक्षण हैं:
- पेट का फूलना और भारीपन
- वज़न बढ़ना (तरल के कारण)
- साँस लेने में कठिनाई (अधिक तरल होने पर)
एक ही मरीज़ में एक से अधिक प्रकार के लक्षण भी मिल सकते हैं।
निदान (जाँच)
इस रोग की पहचान चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि इसका कोई एक निश्चित टेस्ट नहीं है। डॉक्टर आमतौर पर चार बातों को मिलाकर निदान करते हैं:
1. लक्षण: पाचन संबंधी लगातार शिकायतें।
2. बायोप्सी में इओसिनोफिल की अधिकता: यह सबसे महत्वपूर्ण जाँच है। एंडोस्कोपी या कोलोनोस्कोपी के दौरान पेट और आँत के विभिन्न हिस्सों से ऊतक के नमूने लिए जाते हैं। चूँकि सूजन पूरे हिस्से में एक समान नहीं होती, इसलिए कई जगहों से बायोप्सी ली जाती है। सूक्ष्मदर्शी में प्रति हाई-पावर फील्ड इओसिनोफिल की गिनती देखी जाती है।
3. अन्य कारणों को बाहर करना: परजीवी संक्रमण, क्रोहन रोग, अल्सरेटिव कोलाइटिस, सीलिएक रोग, हाइपरइओसिनोफिलिक सिंड्रोम, कुछ दवाओं की प्रतिक्रिया और कैंसर जैसी स्थितियों को अलग करना आवश्यक है।
4. सहायक जाँचें:
- रक्त परीक्षण: इओसिनोफिल की संख्या बढ़ी हुई मिल सकती है (हालाँकि सभी मरीज़ों में नहीं), साथ ही एनीमिया और एल्ब्यूमिन की कमी देखी जा सकती है।
- मल परीक्षण: परजीवी या अंडों की जाँच के लिए।
- एलर्जी टेस्ट: स्किन प्रिक टेस्ट या IgE जाँच, जो खाद्य एलर्जी के संकेत दे सकती है।
- इमेजिंग: सीटी स्कैन या एमआरआई, ताकि आँत की दीवार की मोटाई, रुकावट या पेट में तरल का पता चल सके।
- एसाइटिक फ्लूइड की जाँच: यदि पेट में पानी जमा हो।
उपचार
उपचार का लक्ष्य लक्षणों को नियंत्रित करना, सूजन घटाना, पोषण सुधारना और जटिलताओं से बचाव करना है। उपचार हर मरीज़ में अलग हो सकता है और डॉक्टर की देखरेख में ही होना चाहिए।
1. आहार चिकित्सा
कई मरीज़ों में आहार में बदलाव से अच्छा लाभ मिलता है:
- एलिमिनेशन डाइट: संदिग्ध खाद्य पदार्थों (दूध, गेहूँ, अंडा, सोया, मूँगफली, मेवे, मछली/समुद्री भोजन) को चरणबद्ध ढंग से हटाया जाता है।
- एलिमेंटल डाइट: गंभीर मामलों में, विशेषकर बच्चों में, अमीनो-एसिड आधारित विशेष फ़ॉर्मूला दिया जाता है।
- पुनः शामिल करना: लक्षण सुधरने पर भोजन एक-एक करके वापस जोड़े जाते हैं ताकि असली ट्रिगर पहचाना जा सके।
यह प्रक्रिया लंबी और धैर्य माँगने वाली है, इसलिए पोषण विशेषज्ञ (डाइटीशियन) की सलाह ज़रूरी है ताकि कुपोषण न हो।
2. दवाएँ
- कॉर्टिकोस्टेरॉइड (जैसे प्रेडनिसोन): यह सबसे प्रभावी दवा मानी जाती है और अधिकतर मरीज़ों में लक्षण जल्दी कम करती है। लंबे समय तक उपयोग के दुष्प्रभावों के कारण खुराक धीरे-धीरे घटाई जाती है। कुछ मामलों में स्थानीय असर वाले स्टेरॉइड (जैसे बुडेसोनाइड) उपयोगी होते हैं।
- स्टेरॉइड बचाने वाली दवाएँ: जिन मरीज़ों को बार-बार रोग लौटता है, उनमें एज़ाथायोप्रिन जैसी इम्यूनोमॉड्यूलेटर दवाएँ दी जा सकती हैं।
- एंटी-एलर्जिक दवाएँ: मॉन्टेलुकास्ट, कीटोटिफ़ेन और एंटीहिस्टामिन कुछ मरीज़ों में सहायक हो सकते हैं, हालाँकि इनके प्रमाण सीमित हैं।
- जैविक उपचार (बायोलॉजिक्स): नई दवाएँ जैसे डुपिलुमैब, मेपोलिज़ुमैब आदि अध्ययन या चुनिंदा मामलों में प्रयोग की जा रही हैं। इनकी उपलब्धता और उपयुक्तता के बारे में विशेषज्ञ से परामर्श लें।
- सहायक उपचार: आयरन या विटामिन की कमी हो तो उसकी पूर्ति, और अम्ल घटाने वाली दवाएँ आवश्यकतानुसार।
3. सर्जरी
यदि आँत में गंभीर रुकावट या संकुचन हो जाए और दवाओं से आराम न मिले, तभी शल्य चिकित्सा की ज़रूरत पड़ती है। यह बहुत कम मरीज़ों में आवश्यक होती है।
जटिलताएँ
उचित इलाज न मिलने पर ये समस्याएँ हो सकती हैं:
- कुपोषण और लगातार वज़न घटना
- आयरन की कमी से एनीमिया
- बच्चों में विकास और वृद्धि में रुकावट
- आँत में रुकावट या संकरापन
- पेट में पानी भरना (एसाइटिस)
- दुर्लभ मामलों में आँत में छेद (परफ़ोरेशन)
रोग का पूर्वानुमान (प्रॉग्नोसिस)
EGE आम तौर पर जानलेवा नहीं है, लेकिन यह दीर्घकालिक रोग है जिसमें लक्षण कभी कम और कभी अधिक हो सकते हैं। कुछ मरीज़ों में एक बार इलाज के बाद लंबे समय तक आराम रहता है, जबकि कुछ में रोग बार-बार लौटता है या लगातार बना रहता है। नियमित फ़ॉलो-अप और सही उपचार से अधिकांश लोग सामान्य जीवन जी सकते हैं।
रोज़मर्रा के जीवन में सावधानियाँ
- खाने की डायरी रखें: क्या खाया और कौन-से लक्षण हुए, इसे लिखने से ट्रिगर पहचानने में मदद मिलती है।
- डॉक्टर की सलाह के बिना आहार न छोड़ें: बिना मार्गदर्शन के कई खाद्य पदार्थ हटाने से पोषण की कमी हो सकती है।
- स्टेरॉइड अचानक बंद न करें।
- पैकेट वाले भोजन के लेबल पढ़ें, ताकि छिपे हुए एलर्जन से बचा जा सके।
- बच्चों की वृद्धि पर नज़र रखें और नियमित जाँच कराते रहें।
- तनाव कम करें और संतुलित जीवनशैली अपनाएँ।
डॉक्टर से कब मिलें?
यदि आपको इन में से कोई स्थिति हो, तो जल्द चिकित्सकीय सलाह लें:
- हफ़्तों तक चलने वाला पेट दर्द, उल्टी या दस्त
- बिना कारण वज़न घटना
- मल में खून या काला मल
- पेट का लगातार फूलना
- बार-बार भोजन अटकना या तेज़ दर्द के साथ उल्टी (आँत में रुकावट के संकेत)
- बच्चों में विकास का धीमा पड़ना
सही विशेषज्ञ गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट होते हैं, और ज़रूरत पड़ने पर एलर्जी विशेषज्ञ व डाइटीशियन की भी मदद ली जाती है।
निष्कर्ष
इओसिनोफिलिक गैस्ट्रोएंटेराइटिस एक दुर्लभ लेकिन प्रबंधन योग्य पाचन रोग है। इसके लक्षण सामान्य पेट की समस्याओं जैसे दिखते हैं, इसलिए जब सामान्य इलाज से आराम न मिले और खासकर एलर्जी का इतिहास हो, तो इस रोग की संभावना पर विचार करना चाहिए। एंडोस्कोपी और बायोप्सी से सही निदान संभव है, और आहार नियंत्रण, स्टेरॉइड तथा अन्य दवाओं से अधिकांश मरीज़ों को राहत मिलती है। समय पर निदान, नियमित निगरानी और डॉक्टर के साथ सहयोग से मरीज़ स्वस्थ और सक्रिय जीवन जी सकते हैं।
अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है और किसी योग्य चिकित्सक की सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी लक्षण या उपचार के बारे में अपने डॉक्टर से परामर्श अवश्य करें।
