कावासाकी रोग (Kawasaki Disease): बच्चों में रक्त वाहिकाओं की सूजन
परिचय
कावासाकी रोग बचपन की एक गंभीर बीमारी है, जिसमें शरीर की छोटी और मध्यम आकार की रक्त वाहिकाओं (blood vessels) में सूजन आ जाती है। चिकित्सा भाषा में इसे “वैस्कुलाइटिस” की श्रेणी में रखा जाता है। इस रोग की खोज वर्ष 1967 में जापान के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. तोमिसाकु कावासाकी ने की थी, और उन्हीं के नाम पर इसे कावासाकी रोग कहा जाता है। शुरुआत में इसे “म्यूकोक्यूटेनियस लिम्फ नोड सिंड्रोम” भी कहा गया, क्योंकि इसमें त्वचा, मुँह-नाक की श्लेष्मा झिल्ली और लिम्फ नोड्स प्रभावित होते हैं।
यह रोग मुख्य रूप से पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चों को होता है, और अधिकांश मामले छह महीने से चार साल की उम्र के बीच देखे जाते हैं। विकसित देशों में यह बच्चों में अर्जित (acquired) हृदय रोग का सबसे आम कारण बन चुका है। समय पर इलाज मिलने पर ज़्यादातर बच्चे पूरी तरह ठीक हो जाते हैं, लेकिन देरी होने पर हृदय की धमनियों को स्थायी नुकसान हो सकता है। इसलिए माता-पिता और परिजनों को इसके लक्षणों की जानकारी होना बहुत ज़रूरी है।
कावासाकी रोग क्या है?
हमारे शरीर में रक्त वाहिकाएँ पूरे शरीर में खून पहुँचाने का काम करती हैं। कावासाकी रोग में प्रतिरक्षा तंत्र (immune system) किसी कारण से अति सक्रिय हो जाता है और अपनी ही रक्त वाहिकाओं की दीवारों पर हमला करने लगता है। इससे वाहिकाओं में सूजन आ जाती है। सबसे बड़ा खतरा हृदय को खून पहुँचाने वाली कोरोनरी धमनियों (coronary arteries) को होता है, जिनमें सूजन के कारण उभार (aneurysm) बन सकता है। ऐसे उभार में खून के थक्के जम सकते हैं, जिससे आगे चलकर हार्ट अटैक का जोखिम रहता है।
कारण
कावासाकी रोग का सटीक कारण आज तक पूरी तरह ज्ञात नहीं है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसके पीछे कई कारकों का मिला-जुला प्रभाव हो सकता है:
- संक्रमण की प्रतिक्रिया: माना जाता है कि किसी वायरस या बैक्टीरिया के संक्रमण के बाद कुछ बच्चों का प्रतिरक्षा तंत्र ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया करता है।
- आनुवंशिक प्रवृत्ति: यह रोग पूर्वी एशियाई मूल के बच्चों, विशेषकर जापान, कोरिया और ताइवान में अधिक पाया जाता है। जिन बच्चों के भाई-बहन या माता-पिता को यह रोग हुआ हो, उनमें इसका खतरा अपेक्षाकृत अधिक होता है।
- पर्यावरणीय कारक: कुछ अध्ययनों में इसके मामलों का मौसम से संबंध देखा गया है। सर्दियों के अंत और बसंत के आरंभ में मामले अपेक्षाकृत ज़्यादा आते हैं।
यह समझना ज़रूरी है कि कावासाकी रोग संक्रामक नहीं है, यानी यह एक बच्चे से दूसरे बच्चे में नहीं फैलता। इसमें माता-पिता की किसी लापरवाही का भी कोई हाथ नहीं होता।
जोखिम कारक
- उम्र: पाँच साल से छोटे बच्चे, खासकर एक से दो वर्ष के।
- लिंग: लड़कों में लड़कियों की तुलना में यह रोग थोड़ा अधिक देखा जाता है।
- जातीय पृष्ठभूमि: एशियाई और प्रशांत द्वीप मूल के बच्चों में अधिक आम।
- पारिवारिक इतिहास: परिवार में पहले किसी को होना।
लक्षण
कावासाकी रोग के लक्षण आमतौर पर चरणों में प्रकट होते हैं। इसका सबसे प्रमुख लक्षण तेज़ बुखार है, जो पाँच दिन या उससे अधिक समय तक बना रहता है और सामान्य बुखार की दवाओं से ठीक नहीं होता। निदान के लिए बुखार के साथ निम्न में से अधिकतर लक्षण देखे जाते हैं:
- आँखों में लालिमा: दोनों आँखें लाल हो जाती हैं, लेकिन उनमें पीप या गाढ़ा स्राव नहीं होता।
- होंठ और मुँह में बदलाव: होंठ लाल, सूखे और फटे हुए हो जाते हैं। जीभ स्ट्रॉबेरी की तरह लाल और दानेदार दिखती है, जिसे “स्ट्रॉबेरी टंग” कहते हैं। गला भी लाल हो सकता है।
- त्वचा पर चकत्ते: शरीर के धड़, हाथ-पैरों या जाँघों के आसपास लाल दाने या चकत्ते उभर आते हैं।
- हाथ-पैरों में बदलाव: हथेलियों और तलवों में लालिमा और सूजन आ जाती है। बीमारी के दूसरे या तीसरे सप्ताह में उँगलियों और अंगूठों की त्वचा परतों में उतरने लगती है।
- गर्दन की गाँठें: गर्दन में एक तरफ़ लिम्फ नोड्स सूज जाते हैं, आमतौर पर इनका आकार डेढ़ सेंटीमीटर से अधिक होता है।
इनके अलावा बच्चा चिड़चिड़ा हो सकता है, उसे पेट दर्द, उल्टी, दस्त, जोड़ों में दर्द और अत्यधिक थकान भी हो सकती है। कुछ बच्चों में बीसीजी टीके के निशान वाली जगह पर लालिमा दिखना भी एक संकेत माना जाता है।
अपूर्ण कावासाकी रोग
कई बार बच्चे में सभी लक्षण एक साथ नहीं दिखते। इसे “अपूर्ण” या “इनकम्प्लीट” कावासाकी रोग कहते हैं। यह खासकर शिशुओं में आम है और इसकी पहचान में अक्सर देरी हो जाती है। इसलिए यदि बच्चे को पाँच दिन से अधिक बुखार हो और ऊपर बताए गए कुछ लक्षण भी हों, तो तुरंत जाँच करानी चाहिए।
रोग के चरण
तीव्र चरण (पहले 1-2 सप्ताह): तेज़ बुखार, आँखों की लालिमा, चकत्ते, मुँह और गर्दन के लक्षण इसी दौरान दिखते हैं। हृदय पर असर पड़ने का खतरा इसी समय सबसे ज़्यादा होता है।
उप-तीव्र चरण (2 से 4 सप्ताह): बुखार उतर जाता है, पर उँगलियों की त्वचा उतरती है, प्लेटलेट्स की संख्या बढ़ जाती है और कोरोनरी धमनियों में उभार बनने का जोखिम बना रहता है।
स्वास्थ्य-लाभ चरण (6 से 8 सप्ताह के बाद): लक्षण धीरे-धीरे समाप्त हो जाते हैं और रक्त जाँचें सामान्य होने लगती हैं।
निदान कैसे होता है?
कावासाकी रोग की पुष्टि के लिए कोई एक विशिष्ट जाँच नहीं है। डॉक्टर बच्चे के लक्षणों, शारीरिक परीक्षण और कुछ जाँचों के आधार पर निदान करते हैं। इसमें शामिल हैं:
- रक्त जाँच: श्वेत रक्त कोशिकाओं की बढ़ी संख्या, एनीमिया, ESR और CRP जैसे सूजन के मार्कर का बढ़ना, तथा दूसरे सप्ताह के बाद प्लेटलेट्स का बढ़ना।
- मूत्र जाँच: पेशाब में सफ़ेद रक्त कोशिकाओं की उपस्थिति।
- ईसीजी (ECG): हृदय की विद्युत गतिविधि की जाँच के लिए।
- इकोकार्डियोग्राफी: हृदय की अल्ट्रासाउंड जाँच, जिससे कोरोनरी धमनियों की स्थिति देखी जाती है। यह सबसे महत्वपूर्ण जाँच है और इसे रोग की शुरुआत में तथा बाद में दोबारा किया जाता है।
डॉक्टर को खसरा, स्कार्लेट ज्वर, एडेनोवायरस संक्रमण और बच्चों में कोविड-19 से जुड़े MIS-C जैसी बीमारियों से इसे अलग करना पड़ता है, क्योंकि इनके लक्षण मिलते-जुलते हैं।
उपचार
कावासाकी रोग में जल्दी इलाज सबसे अहम है। आदर्श रूप से बुखार शुरू होने के पहले दस दिनों के भीतर इलाज शुरू हो जाना चाहिए। उपचार अस्पताल में भर्ती करके किया जाता है।
1. इंट्रावीनस इम्युनोग्लोबुलिन (IVIG): यह इस रोग का मुख्य उपचार है। इसमें स्वस्थ दाताओं से प्राप्त एंटीबॉडी नस के ज़रिए दी जाती हैं। यह सूजन को कम करता है और कोरोनरी धमनियों में समस्या का खतरा काफ़ी घटा देता है। अधिकांश बच्चों में इलाज के 24 से 36 घंटे के भीतर बुखार उतर जाता है।
2. एस्पिरिन: सूजन कम करने और खून के थक्के बनने से रोकने के लिए एस्पिरिन दी जाती है। यह बच्चों को सामान्यतः नहीं दी जाती, लेकिन कावासाकी रोग में चिकित्सक की निगरानी में इसका उपयोग किया जाता है। बच्चे को किसी भी स्थिति में डॉक्टर की सलाह के बिना एस्पिरिन नहीं देनी चाहिए।
3. स्टेरॉयड: जिन बच्चों में IVIG के बाद भी बुखार बना रहे या जिनमें हृदय संबंधी जोखिम अधिक हो, उनमें कॉर्टिकोस्टेरॉयड दिए जा सकते हैं।
4. अन्य दवाएँ: यदि इलाज का असर न हो तो इन्फ्लिक्सिमैब जैसी दवाएँ या अन्य प्रतिरक्षा-नियंत्रक दवाएँ दी जा सकती हैं। जिन बच्चों की धमनियों में बड़े उभार बन गए हों, उन्हें खून पतला करने वाली दवाएँ दी जाती हैं।
संभावित जटिलताएँ
उचित इलाज न मिलने पर लगभग 20 से 25 प्रतिशत बच्चों में कोरोनरी धमनी में समस्या हो सकती है, जबकि समय पर IVIG मिलने से यह दर लगभग 4 से 5 प्रतिशत तक रह जाती है। संभावित जटिलताओं में शामिल हैं:
- कोरोनरी धमनी में उभार (एन्यूरिज़्म)
- धमनियों में खून के थक्के और हृदयाघात
- मायोकार्डाइटिस (हृदय की मांसपेशियों में सूजन)
- हृदय के वाल्व में खराबी
- बहुत कम मामलों में जानलेवा स्थिति
घर पर देखभाल और फॉलो-अप
अस्पताल से छुट्टी के बाद भी बच्चे की देखभाल और नियमित जाँच ज़रूरी है:
- डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाएँ, विशेषकर एस्पिरिन, निर्धारित समय तक और सही मात्रा में दें।
- इकोकार्डियोग्राफी की जाँच आमतौर पर रोग के 1-2 सप्ताह और 6-8 सप्ताह बाद करवाई जाती है। यदि धमनियाँ सामान्य हों तो आगे की जाँच कम बार होती है।
- एस्पिरिन लेने वाले बच्चों को फ्लू और चिकनपॉक्स से बचाना चाहिए, क्योंकि इस स्थिति में रेये सिंड्रोम (Reye’s syndrome) का खतरा रहता है। डॉक्टर से फ्लू का टीका लगवाने की सलाह लें।
- IVIG लेने के बाद कुछ जीवित वायरस वाले टीकों (जैसे MMR और चिकनपॉक्स) को लगाने में लगभग 11 महीने की देरी करनी पड़ सकती है। इस बारे में अपने बाल रोग विशेषज्ञ से पूछें।
- बच्चे को पौष्टिक आहार दें, पर्याप्त आराम कराएँ और संक्रमण से बचाएँ।
- जिन बच्चों की धमनियों पर असर पड़ा हो, उनके लिए खेलकूद संबंधी सीमाओं के बारे में हृदय रोग विशेषज्ञ से सलाह लें।
क्या कावासाकी रोग से बचाव संभव है?
चूँकि इसका सटीक कारण ज्ञात नहीं है, इसलिए इसे रोकने का कोई निश्चित तरीका नहीं है। लेकिन शीघ्र पहचान और समय पर इलाज से इसके गंभीर परिणामों से बचा जा सकता है। यही इस रोग में सबसे प्रभावी “बचाव” है।
डॉक्टर से कब मिलें?
यदि आपके बच्चे को निम्न स्थितियाँ हों तो बिना देरी किए बाल रोग विशेषज्ञ से संपर्क करें:
- पाँच दिन या उससे अधिक समय से तेज़ बुखार
- बुखार के साथ आँखें लाल होना, होंठ फटना या जीभ लाल होना
- शरीर पर चकत्ते या हाथ-पैरों में सूजन
- गर्दन में गाँठ और अत्यधिक चिड़चिड़ापन
सीने में दर्द, साँस लेने में तकलीफ़, अत्यधिक सुस्ती या होश में कमी जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा लें।
दीर्घकालिक पूर्वानुमान
अधिकांश बच्चे, जिन्हें समय पर इलाज मिल जाता है, पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं और सामान्य जीवन जीते हैं। जिनकी कोरोनरी धमनियाँ प्रभावित नहीं हुईं, उनमें आमतौर पर दीर्घकालिक समस्याएँ नहीं देखी जातीं। जिन बच्चों में उभार बन जाते हैं, उन्हें लंबे समय तक हृदय रोग विशेषज्ञ की निगरानी में रहना पड़ता है। कई मामलों में छोटे उभार समय के साथ अपने आप सामान्य हो जाते हैं, जबकि बड़े उभारों के लिए आजीवन देखभाल की आवश्यकता हो सकती है।
निष्कर्ष
कावासाकी रोग बच्चों में होने वाली एक गंभीर, किंतु इलाज योग्य बीमारी है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके लक्षण कई अन्य सामान्य बचपन की बीमारियों जैसे दिखते हैं, जिससे निदान में देरी हो सकती है। लंबे समय तक चलने वाला बुखार, लाल आँखें, फटे होंठ, चकत्ते और सूजे हुए हाथ-पैर जैसे संकेतों को कभी भी हल्के में नहीं लेना चाहिए। समय रहते अस्पताल पहुँचना, सही जाँच करवाना और IVIG व एस्पिरिन से इलाज शुरू करना बच्चे के हृदय को सुरक्षित रखने की कुंजी है। जागरूकता और सतर्कता से हम अपने बच्चों को इस रोग के दीर्घकालिक दुष्प्रभावों से बचा सकते हैं।
नोट: यह लेख केवल जानकारी के उद्देश्य से है। बच्चे में किसी भी लक्षण के लिए योग्य बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।
