हीमोफिलिया (Hemophilia A, B, C)
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हीमोफिलिया ए और बी: खून का थक्का न जमने की बीमारी

हमारे शरीर में कहीं चोट लगती है तो कुछ ही मिनटों में खून बहना रुक जाता है। यह इसलिए संभव होता है क्योंकि खून में मौजूद विशेष प्रोटीन मिलकर थक्का (क्लॉट) बना देते हैं। लेकिन कुछ लोगों में यह प्रक्रिया जन्म से ही अधूरी होती है। मामूली सी चोट या कभी-कभी बिना किसी चोट के भी उनका खून घंटों या दिनों तक बहता रहता है। इस आनुवंशिक बीमारी को हीमोफिलिया कहते हैं। इसके दो सबसे आम रूप हीमोफिलिया ए और हीमोफिलिया बी हैं। इस लेख में हम इस बीमारी के कारण, लक्षण, जाँच, इलाज और रोज़मर्रा की देखभाल के बारे में विस्तार से जानेंगे।

हीमोफिलिया क्या है?

हीमोफिलिया एक दुर्लभ आनुवंशिक रक्तस्राव विकार है, जिसमें खून में थक्का बनाने वाले किसी एक ज़रूरी प्रोटीन की कमी या अनुपस्थिति होती है। इन प्रोटीनों को “क्लॉटिंग फैक्टर” या थक्का-कारक कहा जाता है। इनकी संख्या कई होती है और ये एक श्रृंखला की तरह एक के बाद एक सक्रिय होकर थक्का बनाते हैं। यदि श्रृंखला की एक भी कड़ी कमज़ोर हो, तो थक्का ठीक से नहीं बनता और रक्तस्राव लंबे समय तक चलता रहता है।

यह समझना ज़रूरी है कि हीमोफिलिया के मरीज़ का खून “तेज़ी से” नहीं बहता। असल समस्या यह है कि खून देर तक बहता है, क्योंकि थक्का मज़बूती से नहीं बन पाता। सबसे बड़ा खतरा बाहरी कटने-छिलने से कम और शरीर के अंदरूनी रक्तस्राव से अधिक होता है।

हीमोफिलिया ए और बी में अंतर

हीमोफिलिया ए (क्लासिक हीमोफिलिया): इसमें फैक्टर VIII (आठ) की कमी होती है। यह सबसे आम प्रकार है और लगभग 80 प्रतिशत मरीज़ इसी से पीड़ित होते हैं। अनुमान है कि लगभग हर 5,000 नवजात लड़कों में से एक को यह बीमारी होती है।

हीमोफिलिया बी (क्रिसमस रोग): इसमें फैक्टर IX (नौ) की कमी होती है। यह कम आम है और लगभग 15 से 20 प्रतिशत मामलों में पाया जाता है। इसे “क्रिसमस रोग” इसलिए कहा जाता है कि इसे पहली बार पहचानने वाले मरीज़ का नाम स्टीफन क्रिसमस था। यह लगभग हर 25,000 से 30,000 नवजात लड़कों में से एक को होती है।

दोनों प्रकारों के लक्षण लगभग एक जैसे होते हैं, इसलिए केवल लक्षण देखकर यह नहीं बताया जा सकता कि मरीज़ को कौन-सा प्रकार है। इसके लिए प्रयोगशाला जाँच ज़रूरी है, और सही प्रकार जानना इसलिए अहम है कि दोनों का इलाज अलग दवाओं से होता है। एक और दुर्लभ रूप हीमोफिलिया सी (फैक्टर XI की कमी) भी होता है, जो आमतौर पर हल्का होता है।

यह बीमारी कैसे होती है?

फैक्टर VIII और फैक्टर IX बनाने वाले जीन X गुणसूत्र (क्रोमोसोम) पर स्थित होते हैं। इसीलिए हीमोफिलिया को “X-लिंक्ड रिसेसिव” बीमारी कहा जाता है। महिलाओं में दो X गुणसूत्र होते हैं, जबकि पुरुषों में एक X और एक Y। इसका मतलब यह है कि:

  • यदि पुरुष के एकमात्र X गुणसूत्र में दोषपूर्ण जीन हो, तो उसे बीमारी हो जाती है, क्योंकि उसके पास भरपाई के लिए दूसरा X गुणसूत्र नहीं होता।
  • महिला के एक X गुणसूत्र में दोष हो और दूसरा सामान्य हो, तो वह आमतौर पर “वाहक” (कैरियर) होती है। उसमें बीमारी के गंभीर लक्षण प्रायः नहीं दिखते, पर वह जीन अपने बच्चों तक पहुँचा सकती है। कुछ वाहक महिलाओं में थक्का-कारक का स्तर कम होने से भारी मासिक धर्म या प्रसव के बाद अधिक रक्तस्राव जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।
  • वाहक माँ के प्रत्येक पुत्र को बीमारी होने की संभावना 50 प्रतिशत और प्रत्येक पुत्री के वाहक बनने की संभावना भी 50 प्रतिशत होती है।
  • बीमार पिता अपने बेटों को यह बीमारी नहीं देता, लेकिन उसकी सभी बेटियाँ वाहक होती हैं।

लगभग एक-तिहाई मामलों में परिवार में पहले कोई मरीज़ नहीं होता। ऐसे मामलों में जीन में नया बदलाव (म्यूटेशन) अचानक पैदा हुआ होता है।

बीमारी की गंभीरता

हीमोफिलिया की गंभीरता खून में थक्का-कारक के स्तर पर निर्भर करती है। सामान्य स्तर को 100 प्रतिशत मानें तो:

  • हल्का हीमोफिलिया: 5 से 40 प्रतिशत। रक्तस्राव आमतौर पर बड़ी चोट, सर्जरी या दाँत निकलवाने के बाद होता है। कई बार बीमारी बड़ी उम्र तक पता ही नहीं चलती।
  • मध्यम हीमोफिलिया: 1 से 5 प्रतिशत। मामूली चोट पर भी लंबे समय तक रक्तस्राव हो सकता है।
  • गंभीर हीमोफिलिया: 1 प्रतिशत से कम। इसमें बिना किसी स्पष्ट चोट के भी जोड़ों और मांसपेशियों में अपने-आप खून रिसने लगता है।

प्रमुख लक्षण

  • छोटी चोट, कटने या दाँत निकलवाने के बाद देर तक खून बहना
  • शरीर पर बड़े-बड़े नीले-बैंगनी निशान (ब्रूज़) और गाँठें
  • बार-बार नाक से खून आना, जो आसानी से न रुके
  • जोड़ों में खून भरना (हेमार्थ्रोसिस), खासकर घुटने, टखने और कोहनी में। इसमें जोड़ में दर्द, सूजन, गर्मी और अकड़न होती है। बच्चे अक्सर पहले चुभन या झुनझुनी जैसा अनुभव बताते हैं।
  • मांसपेशियों में गहरा रक्तस्राव
  • पेशाब या मल में खून
  • शिशुओं में टीकाकरण या खतना के बाद असामान्य रक्तस्राव, या सिर पर चोट के बाद बड़ा गूमड़
  • सिर में चोट या बिना कारण तेज़ सिरदर्द, बार-बार उल्टी, अत्यधिक नींद या दौरे आना आपात स्थिति है, क्योंकि यह मस्तिष्क में रक्तस्राव का संकेत हो सकता है। तुरंत अस्पताल जाना चाहिए।

गंभीर हीमोफिलिया के बच्चों में लक्षण अक्सर तब शुरू होते हैं जब वे घुटनों के बल चलना या चलना सीखते हैं और बार-बार गिरते हैं।

जाँच और निदान

हीमोफिलिया की पुष्टि के लिए ये जाँचें की जाती हैं:

  1. कम्प्लीट ब्लड काउंट और कोएगुलेशन टेस्ट: इनमें aPTT (एक्टिवेटेड पार्शियल थ्रॉम्बोप्लास्टिन टाइम) लंबा आता है, जबकि पीटी (PT) सामान्य रहता है।
  2. फैक्टर एसे (Factor Assay): इससे फैक्टर VIII या IX की मात्रा मापी जाती है। इसी से बीमारी का प्रकार और गंभीरता तय होती है।
  3. जेनेटिक जाँच: जीन के बदलाव की पहचान की जाती है। इससे परिवार की महिलाओं में वाहक की पहचान और गर्भावस्था में शिशु की जाँच संभव होती है।
  4. इनहिबिटर टेस्ट: यह देखने के लिए कि शरीर ने दिए गए फैक्टर के खिलाफ एंटीबॉडी तो नहीं बना ली।

जिन परिवारों में हीमोफिलिया का इतिहास हो, उन्हें गर्भधारण से पहले आनुवंशिक परामर्श (जेनेटिक काउंसलिंग) अवश्य लेना चाहिए।

संभावित जटिलताएँ

इलाज में देरी या अपर्याप्त इलाज से कई गंभीर समस्याएँ हो सकती हैं:

  • जोड़ों की स्थायी क्षति: बार-बार खून भरने से जोड़ की उपास्थि नष्ट हो जाती है और विकलांगता आ सकती है।
  • मस्तिष्क में रक्तस्राव: यह सबसे जानलेवा जटिलता है।
  • इनहिबिटर का बनना: कुछ मरीज़ों का प्रतिरक्षा तंत्र दिए गए फैक्टर को बाहरी पदार्थ समझकर उसके विरुद्ध एंटीबॉडी बना लेता है, जिससे सामान्य इलाज बेअसर हो जाता है। यह हीमोफिलिया ए में अधिक देखा जाता है।
  • अंदरूनी अंगों या गले में रक्तस्राव जिससे साँस लेने में कठिनाई हो सकती है।

इलाज: क्या हीमोफिलिया ठीक हो सकता है?

पारंपरिक रूप से हीमोफिलिया का कोई स्थायी इलाज नहीं था, लेकिन सही उपचार से मरीज़ लगभग सामान्य जीवन जी सकते हैं। मुख्य उपचार इस प्रकार हैं:

1. फैक्टर रिप्लेसमेंट थेरेपी: यह इलाज की बुनियाद है। इसमें कमी वाले फैक्टर (VIII या IX) को नस के ज़रिए दिया जाता है। इसे दो तरीकों से इस्तेमाल किया जाता है। पहला, रक्तस्राव होने पर तुरंत देना (ऑन-डिमांड)। दूसरा, गंभीर मरीज़ों में नियमित अंतराल पर देना (प्रोफिलैक्सिस), ताकि रक्तस्राव हो ही न। शोध बताते हैं कि प्रोफिलैक्सिस से जोड़ों का नुकसान काफी हद तक रोका जा सकता है, इसलिए खासकर बच्चों में इसे बेहतर माना जाता है। आज लंबे समय तक असर करने वाले फैक्टर भी उपलब्ध हैं, जिनसे इंजेक्शन की संख्या कम हो जाती है।

2. नॉन-फैक्टर दवाएँ: हीमोफिलिया ए के मरीज़ों के लिए एमिसिज़ुमैब जैसी दवाएँ त्वचा के नीचे लगाई जाती हैं और इनहिबिटर वाले मरीज़ों में भी कारगर होती हैं। इनके अलावा कुछ नई दवाएँ भी विकसित हुई हैं जो हीमोफिलिया ए और बी दोनों में उपयोगी हो सकती हैं।

3. डेस्मोप्रेसिन (DDAVP): हल्के हीमोफिलिया ए में यह दवा शरीर में जमा फैक्टर VIII को रिलीज़ करवाकर रक्तस्राव रोकने में मदद करती है। यह हीमोफिलिया बी में काम नहीं करती।

4. जीन थेरेपी: हाल के वर्षों में हीमोफिलिया ए और बी दोनों के लिए जीन थेरेपी को कुछ देशों में मंज़ूरी मिली है। इसमें सही जीन की प्रति शरीर में पहुँचाई जाती है ताकि शरीर खुद फैक्टर बनाए। यह उपचार बहुत महँगा है और अभी हर जगह उपलब्ध नहीं है, पर भविष्य के लिए बड़ी उम्मीद जगाता है।

5. सहायक उपचार: रक्तस्राव रोकने के लिए प्रभावित हिस्से को आराम देना, बर्फ लगाना, हल्का दबाव और ऊँचा रखना उपयोगी है। जोड़ों की सुरक्षा के लिए फिज़ियोथेरेपी बहुत ज़रूरी है। दंत चिकित्सा या सर्जरी से पहले हीमैटोलॉजिस्ट की सलाह लेकर फैक्टर देना आवश्यक है।

रोज़मर्रा की देखभाल और सावधानियाँ

  • एस्पिरिन और इबुप्रोफेन जैसी दर्द निवारक दवाएँ (एनएसएआईडी) डॉक्टर की सलाह के बिना न लें, क्योंकि ये रक्तस्राव बढ़ा सकती हैं। दर्द के लिए आमतौर पर पैरासिटामोल सुरक्षित मानी जाती है, पर चिकित्सक से पूछकर ही लें।
  • मांसपेशी में इंजेक्शन (इंट्रामस्क्युलर) से बचें। टीके लगवाते समय डॉक्टर को बीमारी के बारे में बताएँ और संभव हो तो त्वचा के नीचे लगाने वाला विकल्प चुनें।
  • तैरना, साइकिल चलाना और चलना जैसी हल्की गतिविधियाँ मांसपेशियों को मज़बूत रखती हैं और जोड़ों की रक्षा करती हैं। फुटबॉल, कुश्ती जैसे संपर्क वाले खेलों से परहेज़ करें।
  • दाँतों और मसूड़ों की नियमित सफाई रखें, ताकि बड़ी दंत प्रक्रियाओं की नौबत कम आए।
  • स्वस्थ वज़न बनाए रखें, क्योंकि मोटापा जोड़ों पर अतिरिक्त दबाव डालता है।
  • हमेशा मेडिकल पहचान पत्र या कार्ड साथ रखें, जिसमें बीमारी का प्रकार, फैक्टर का नाम और डॉक्टर का नंबर लिखा हो।
  • बच्चे के स्कूल और शिक्षकों को बीमारी और आपात स्थिति में क्या करना है, इसकी जानकारी दें।
  • परिवार के सदस्यों को घर पर फैक्टर लगाना सिखाया जा सकता है। इससे इलाज में देर नहीं होती।

भारत में स्थिति और जागरूकता

भारत में हीमोफिलिया के मरीज़ों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक देशों में गिनी जाती है, लेकिन बड़ी संख्या में मरीज़ अब भी अनिदानित रहते हैं या उन्हें पर्याप्त इलाज नहीं मिल पाता। कई राज्यों में सरकारी अस्पतालों और हीमोफिलिया सोसाइटी के चैप्टरों के माध्यम से फैक्टर उपलब्ध कराए जाते हैं, और राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में भी हीमोफिलिया को शामिल किया गया है। फिर भी ग्रामीण इलाकों में जाँच और इलाज की पहुँच एक बड़ी चुनौती है। हर साल 17 अप्रैल को “विश्व हीमोफिलिया दिवस” मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाना और हर मरीज़ तक इलाज पहुँचाना है।

जल्दी पहचान सबसे अहम है। अगर किसी बच्चे को बार-बार असामान्य नील पड़ें, जोड़ों में बिना कारण सूजन हो, या मामूली चोट पर बहुत देर तक खून बहे, तो उसे झाड़-फूँक या घरेलू नुस्खों में समय गँवाए बिना तुरंत किसी बाल रोग विशेषज्ञ या हीमैटोलॉजिस्ट को दिखाना चाहिए।

निष्कर्ष

हीमोफिलिया ए और बी भले ही जीवनभर साथ रहने वाली आनुवंशिक बीमारियाँ हों, पर आधुनिक चिकित्सा ने इन्हें नियंत्रित करने योग्य बना दिया है। समय पर निदान, नियमित फैक्टर उपचार, जोड़ों की देखभाल और परिवार के सहयोग से मरीज़ पढ़ाई, नौकरी और खेलकूद में सक्रिय जीवन जी सकते हैं। ज़रूरत है सही जानकारी, जागरूकता और विशेषज्ञ चिकित्सा केंद्र तक पहुँच की। यदि आपके परिवार में इस बीमारी का इतिहास है, तो आनुवंशिक परामर्श लें और जाँच करवाएँ।

नोट: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी निदान या उपचार के लिए योग्य हीमैटोलॉजिस्ट या चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें।

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