प्राइमरी स्क्लेरोसिंग कोलेंजाइटिस (Primary Sclerosing Cholangitis - PSC)
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प्राइमरी स्क्लेरोसिंग कोलेंजाइटिस (PSC): कारण, लक्षण, जाँच और उपचार

परिचय

प्राइमरी स्क्लेरोसिंग कोलेंजाइटिस (Primary Sclerosing Cholangitis, संक्षेप में PSC) एक दीर्घकालिक और धीरे-धीरे बढ़ने वाली यकृत (लिवर) की बीमारी है। इसमें पित्त नलिकाओं (bile ducts) में सूजन होती है और समय के साथ उनमें घाव (स्क्लेरोसिस या फाइब्रोसिस) बनने लगते हैं। इससे नलिकाएँ संकरी और सख्त हो जाती हैं।

पित्त नलिकाएँ लिवर और पित्ताशय से पित्त (bile) को छोटी आँत तक पहुँचाती हैं। पित्त वसा के पाचन में मदद करता है और शरीर से कुछ अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकालता है। जब ये नलिकाएँ संकरी होती हैं, तो पित्त का बहाव रुकने लगता है और वह लिवर में जमा होकर उसे नुकसान पहुँचाता है। लंबे समय में यह लिवर सिरोसिस, लिवर फेलियर और कुछ प्रकार के कैंसर का कारण बन सकता है।

“प्राइमरी” शब्द का अर्थ है कि यह बीमारी किसी ज्ञात बाहरी कारण (जैसे पित्त की पथरी, सर्जरी या संक्रमण) से नहीं होती। इसके विपरीत “सेकेंडरी स्क्लेरोसिंग कोलेंजाइटिस” किसी अन्य ज्ञात कारण से होता है।

यह कितनी आम है?

PSC एक दुर्लभ बीमारी है। उत्तरी यूरोप और उत्तरी अमेरिका में यह अपेक्षाकृत अधिक देखी जाती है, जबकि एशिया में इसके मामले कम दर्ज होते हैं, हालाँकि जाँच की बेहतर सुविधाओं के साथ अब भारत में भी इसकी पहचान बढ़ रही है। यह आमतौर पर 30 से 40 वर्ष की आयु में पता चलती है और पुरुषों में महिलाओं की तुलना में लगभग दोगुनी पाई जाती है।

PSC के कारण

PSC का सटीक कारण अभी पूरी तरह ज्ञात नहीं है। शोध के अनुसार यह कई कारकों के मेल से होती है:

1. प्रतिरक्षा तंत्र की गड़बड़ी (ऑटोइम्यून कारक): माना जाता है कि शरीर की रोग-प्रतिरोधक प्रणाली गलती से अपनी ही पित्त नलिकाओं पर हमला करने लगती है, जिससे सूजन और घाव बनते हैं। हालाँकि सामान्य ऑटोइम्यून बीमारियों के विपरीत, इसमें इम्यूनोसप्रेसिव दवाएँ ज़्यादा असरदार नहीं होतीं।

2. आनुवंशिक कारक: कुछ जीन, विशेषकर प्रतिरक्षा से जुड़े HLA जीन, इस बीमारी का खतरा बढ़ाते हैं। परिवार में PSC का इतिहास होने पर जोखिम थोड़ा बढ़ जाता है।

3. आँतों से संबंध: PSC के लगभग 70 से 80 प्रतिशत रोगियों में सूजन आँत की बीमारी (Inflammatory Bowel Disease), खासकर अल्सरेटिव कोलाइटिस, पाई जाती है। इससे वैज्ञानिक मानते हैं कि आँत के बैक्टीरिया या उनसे बने पदार्थ पित्त नलिकाओं की सूजन में भूमिका निभा सकते हैं।

4. पर्यावरणीय कारक: संक्रमण या अन्य पर्यावरणीय कारण आनुवंशिक रूप से संवेदनशील व्यक्तियों में बीमारी को शुरू कर सकते हैं, लेकिन इस पर शोध जारी है।

लक्षण

शुरुआती अवस्था में कई मरीजों में कोई लक्षण नहीं होते। अक्सर नियमित रक्त जाँच में लिवर एंजाइम (विशेषकर ALP) बढ़े हुए मिलने पर बीमारी का पता चलता है। लक्षण होने पर वे आमतौर पर इस प्रकार हैं:

  • अत्यधिक थकान: यह सबसे आम और कष्टदायक लक्षणों में से एक है।
  • खुजली (प्रुराइटिस): खासकर हाथ-पैरों और रात में, जो पित्त लवणों के जमाव से होती है।
  • पीलिया: त्वचा और आँखों का पीला पड़ना, गहरे रंग का पेशाब और हल्के रंग का मल।
  • पेट के ऊपरी दाएँ हिस्से में दर्द या बेचैनी।
  • बुखार और कँपकँपी: यह पित्त नलिकाओं में संक्रमण (कोलेंजाइटिस) का संकेत हो सकता है।
  • अनचाहा वजन घटना और भूख कम लगना।
  • रात में पसीना आना।

बीमारी बढ़ने पर पेट में पानी भरना (जलोदर), पैरों में सूजन, उल्टी में खून आना और भ्रम की स्थिति जैसे लक्षण लिवर सिरोसिस के संकेत हो सकते हैं।

संभावित जटिलताएँ

PSC के लंबे समय में कई जटिलताएँ हो सकती हैं:

  1. पित्त नलिकाओं में संकरापन (स्ट्रिक्चर): इससे पित्त का बहाव रुकता है और बार-बार संक्रमण होता है।
  2. लिवर सिरोसिस और लिवर फेलियर: लगातार नुकसान से लिवर अपना काम करना बंद कर सकता है।
  3. कोलेंजियोकार्सिनोमा (पित्त नलिका का कैंसर): PSC के रोगियों में इसका खतरा सामान्य लोगों से काफी अधिक होता है।
  4. कोलन कैंसर: अल्सरेटिव कोलाइटिस के साथ PSC होने पर बड़ी आँत के कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है।
  5. पित्ताशय का कैंसर।
  6. हड्डियों की कमजोरी (ऑस्टियोपोरोसिस) और वसा में घुलनशील विटामिनों (A, D, E, K) की कमी, क्योंकि पित्त की कमी से इनका अवशोषण घटता है।
  7. पोर्टल हाइपरटेंशन: लिवर की नसों में दबाव बढ़ना, जिससे भोजन नली की नसों से रक्तस्राव हो सकता है।

निदान (जाँच)

PSC की पहचान के लिए डॉक्टर कई जाँचों का सहारा लेते हैं:

रक्त परीक्षण: इनमें ALP (एल्केलाइन फॉस्फेटेज़) और GGT का बढ़ना प्रमुख संकेत है। बिलीरुबिन, SGOT/SGPT और एल्ब्यूमिन की जाँच भी की जाती है। कुछ रोगियों में p-ANCA जैसे ऑटोएंटीबॉडी पाए जा सकते हैं, पर ये निश्चित पहचान नहीं हैं।

MRCP (मैग्नेटिक रेजोनेंस कोलेंजियोपैंक्रियाटोग्राफी): यह सबसे पसंदीदा जाँच है। इसमें बिना चीरे या दर्द के पित्त नलिकाओं की विस्तृत तस्वीर मिलती है, जिसमें नलिकाएँ “मोतियों की माला” (beaded) जैसी दिखती हैं, यानी कहीं संकरी और कहीं फूली हुई।

ERCP: इसमें एंडोस्कोप की मदद से नलिकाओं में रंग डालकर एक्स-रे लिया जाता है। अब यह मुख्यतः इलाज (संकरेपन को खोलने) या बायोप्सी के लिए इस्तेमाल होती है, क्योंकि इसमें संक्रमण या अग्नाशयशोथ का जोखिम रहता है।

लिवर बायोप्सी: अब हर मरीज में आवश्यक नहीं, लेकिन “स्मॉल-डक्ट PSC” या अन्य बीमारी की आशंका होने पर की जाती है।

फाइब्रोस्कैन (इलास्टोग्राफी): इससे लिवर की कठोरता मापकर फाइब्रोसिस की अवस्था का अनुमान लगाया जाता है।

कोलोनोस्कोपी: PSC की पुष्टि होने पर आँत की बीमारी की जाँच के लिए यह कराई जाती है, भले ही आँतों के लक्षण न हों।

उपचार

वर्तमान में PSC का कोई ऐसा इलाज नहीं है जो बीमारी को पूरी तरह रोक या ठीक कर दे। एकमात्र निश्चित इलाज लिवर ट्रांसप्लांट है। फिर भी लक्षणों और जटिलताओं का प्रबंधन बहुत ज़रूरी है।

दवाएँ

  • उर्सोडिऑक्सीकोलिक एसिड (UDCA): इसे कभी-कभी लिवर एंजाइम सुधारने के लिए दिया जाता है, लेकिन यह बीमारी की प्रगति को निश्चित रूप से धीमा करता है, इसके प्रमाण सीमित हैं। उच्च खुराक नुकसानदायक हो सकती है, इसलिए इसका निर्णय विशेषज्ञ ही करें।
  • खुजली के लिए: कोलेस्टायरामीन, रिफैम्पिसिन या नाल्ट्रेक्सोन जैसी दवाएँ डॉक्टर की सलाह से दी जाती हैं।
  • संक्रमण के लिए: कोलेंजाइटिस होने पर तुरंत एंटीबायोटिक दिए जाते हैं।
  • विटामिन और कैल्शियम: कमी होने पर विटामिन A, D, E, K और कैल्शियम की पूर्ति की जाती है।

एंडोस्कोपिक उपचार

यदि किसी प्रमुख नलिका में गंभीर संकरापन हो, तो ERCP द्वारा गुब्बारे से फैलाव (dilatation) या स्टेंट डालकर पित्त का बहाव सुधारा जा सकता है।

लिवर ट्रांसप्लांट

जब बीमारी लिवर फेलियर तक पहुँच जाए, बार-बार गंभीर संक्रमण हों, खुजली असहनीय हो या कैंसर की शुरुआती अवस्था मिले, तब लिवर ट्रांसप्लांट ही सबसे प्रभावी उपाय है। ट्रांसप्लांट के बाद परिणाम अच्छे रहते हैं, पर कुछ मामलों में PSC दोबारा प्रत्यारोपित लिवर में लौट सकती है।

निगरानी और फॉलो-अप

PSC के रोगियों को नियमित निगरानी की ज़रूरत होती है:

  • हर 6 से 12 महीने में लिवर फंक्शन टेस्ट और विशेषज्ञ से परामर्श।
  • सालाना अल्ट्रासाउंड या MRI से पित्ताशय और पित्त नलिका के कैंसर पर नज़र।
  • आँत की बीमारी वाले रोगियों में नियमित अंतराल पर कोलोनोस्कोपी।
  • हड्डियों की जाँच (DEXA स्कैन) और विटामिन स्तर की जाँच।

जीवनशैली और आहार संबंधी सुझाव

  • शराब से पूरी तरह परहेज़ करें, क्योंकि यह लिवर को और नुकसान पहुँचाती है।
  • संतुलित और पौष्टिक आहार लें: फल, सब्ज़ियाँ, साबुत अनाज और पर्याप्त प्रोटीन शामिल करें। बहुत अधिक तला-भुना भोजन कम करें।
  • धूम्रपान न करें।
  • नियमित हल्का व्यायाम करें, जो हड्डियों और थकान दोनों के लिए लाभदायक है।
  • बिना डॉक्टरी सलाह के कोई दवा, जड़ी-बूटी या सप्लीमेंट न लें, क्योंकि कई चीज़ें लिवर पर बोझ डाल सकती हैं।
  • टीकाकरण: हेपेटाइटिस A और B का टीका लगवाएँ, साथ ही फ्लू और अन्य आवश्यक टीके भी।
  • भावनात्मक सहारा: दीर्घकालिक बीमारी तनाव और चिंता ला सकती है। परिवार, सहायता समूहों और ज़रूरत पड़ने पर काउंसलर की मदद लें।

कब तुरंत डॉक्टर से मिलें?

निम्न स्थितियों में बिना देर किए चिकित्सकीय सहायता लें:

  • तेज़ बुखार के साथ कँपकँपी और पेट दर्द
  • अचानक गहरा पीलिया
  • उल्टी में खून या काला मल
  • पेट या पैरों में तेज़ी से सूजन
  • भ्रम, अत्यधिक नींद या बेहोशी

रोग का पूर्वानुमान

PSC की गति हर व्यक्ति में अलग होती है। कुछ लोग कई वर्षों तक लगभग सामान्य जीवन जीते हैं, जबकि कुछ में बीमारी तेज़ी से बढ़ती है। निदान के बाद बिना ट्रांसप्लांट के औसत जीवनकाल लगभग 10 से 20 वर्ष माना जाता है, पर यह उम्र, बीमारी की अवस्था और जटिलताओं पर निर्भर करता है। समय पर निदान, नियमित निगरानी और जटिलताओं के शीघ्र उपचार से जीवन की गुणवत्ता और अवधि दोनों बेहतर की जा सकती हैं।

निष्कर्ष

प्राइमरी स्क्लेरोसिंग कोलेंजाइटिस एक जटिल, दुर्लभ और दीर्घकालिक बीमारी है जो चुपचाप लिवर और पित्त नलिकाओं को नुकसान पहुँचाती है। चूँकि शुरुआत में लक्षण स्पष्ट नहीं होते, इसलिए लिवर एंजाइम में असामान्यता, लगातार थकान या खुजली को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए, खासकर अल्सरेटिव कोलाइटिस के रोगियों को। हालाँकि अभी इसका कोई निश्चित दवाई-आधारित इलाज नहीं है, लेकिन नियमित जाँच, कैंसर की निगरानी, जटिलताओं का समय पर प्रबंधन और आवश्यकता पड़ने पर लिवर ट्रांसप्लांट के ज़रिए रोगी एक बेहतर जीवन जी सकते हैं। यदि आपको या आपके किसी परिचित को उपरोक्त लक्षण हैं, तो किसी गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट या हेपेटोलॉजिस्ट से परामर्श अवश्य लें।

अस्वीकरण: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है और चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी निदान या उपचार के लिए योग्य चिकित्सक से परामर्श करें।

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