डीकंप्रेशन सिकनेस (The Bends): समुद्र की गहराइयों से लौटने की कीमत
प्रस्तावना
समुद्र की गहराइयों में उतरना इंसान के लिए हमेशा से रोमांच और रहस्य का विषय रहा है। रंग-बिरंगी मछलियाँ, मूँगे की चट्टानें और डूबे हुए जहाज़ गोताखोरों को अपनी ओर खींचते हैं। लेकिन इस खूबसूरत दुनिया की एक अदृश्य कीमत भी है। गहराई से ऊपर लौटते समय शरीर के भीतर ऐसी प्रक्रिया शुरू हो सकती है जो जोड़ों में असहनीय दर्द, लकवे और यहाँ तक कि मौत का कारण बन सकती है। इसी स्थिति को डीकंप्रेशन सिकनेस कहते हैं। गोताखोर इसे “द बेंड्स” भी कहते हैं, क्योंकि पीड़ित दर्द के कारण अपने शरीर को मोड़ लेते हैं।
डीकंप्रेशन सिकनेस क्या है?
जब कोई व्यक्ति पानी में गहराई तक जाता है, तो उस पर पानी का दबाव बढ़ता जाता है। समुद्र की सतह पर हम लगभग 1 वायुमंडलीय दबाव में रहते हैं। हर 10 मीटर की गहराई पर दबाव करीब 1 वायुमंडल बढ़ जाता है। यानी 30 मीटर की गहराई पर शरीर चार गुना दबाव झेलता है।
इस बढ़े हुए दबाव में साँस के साथ ली गई गैसें, खासकर नाइट्रोजन, खून और शरीर के ऊतकों (tissues) में सामान्य से ज़्यादा मात्रा में घुल जाती हैं। जब गोताखोर तेज़ी से ऊपर आता है, तो दबाव अचानक घटता है और घुली हुई नाइट्रोजन छोटे-छोटे बुलबुलों के रूप में बाहर निकलने लगती है। ये बुलबुले खून की नसों, जोड़ों, मांसपेशियों, रीढ़ की हड्डी और दिमाग में फँसकर रुकावट और क्षति पैदा करते हैं। यही डीकंप्रेशन सिकनेस है।
इसे समझने का सबसे आसान उदाहरण सोडे की बोतल है। बंद बोतल में गैस द्रव में घुली रहती है और कुछ दिखाई नहीं देता। ढक्कन तेज़ी से खोलते ही दबाव घटता है और ढेर सारे बुलबुले उफनकर बाहर आ जाते हैं। गोताखोर का शरीर भी कुछ ऐसा ही व्यवहार करता है।
वैज्ञानिक सिद्धांत
इसके पीछे हेनरी का नियम काम करता है। इसके अनुसार किसी द्रव में घुली गैस की मात्रा उस गैस के दबाव के समानुपाती होती है। दबाव जितना ज़्यादा होगा, उतनी अधिक नाइट्रोजन शरीर में घुलेगी। ऑक्सीजन शरीर इस्तेमाल कर लेता है, लेकिन नाइट्रोजन का कोई उपयोग नहीं होता, इसलिए वह ऊतकों में जमा होती रहती है। जितनी देर और जितनी गहराई पर गोताखोर रुकता है, उतनी ही ज़्यादा नाइट्रोजन जमा होती है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस बीमारी की पहचान 19वीं सदी में हुई। उस समय नदियों पर पुल बनाने के लिए मज़दूर “केसन” नामक हवा-बंद कक्षों में नदी की तली में काम करते थे। काम के बाद ऊपर आने पर कई मज़दूरों को भयंकर दर्द और लकवा होने लगा। इसे केसन रोग (Caisson Disease) कहा गया। न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन ब्रिज के निर्माण में भी कई मज़दूर इससे प्रभावित हुए।
फ्रांसीसी वैज्ञानिक पॉल बर्ट ने 1870 के आसपास दिखाया कि इसका कारण खून में बनने वाले नाइट्रोजन के बुलबुले हैं। बाद में ब्रिटिश शरीर-क्रिया वैज्ञानिक जॉन स्कॉट हल्डेन ने 1900 के आसपास पहली डीकंप्रेशन तालिकाएँ तैयार कीं। उन्होंने बताया कि गोताखोर को चरणों में, धीरे-धीरे ऊपर आना चाहिए। आज की सुरक्षित गोताखोरी इन्हीं सिद्धांतों पर टिकी है।
डीकंप्रेशन सिकनेस के प्रकार
चिकित्सकीय रूप से इसे मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जाता है।
टाइप 1 (हल्का रूप): इसमें मुख्यतः जोड़ों, मांसपेशियों और त्वचा पर असर पड़ता है। कंधे, कोहनी और घुटनों में गहरा दर्द, त्वचा पर खुजली या चकत्ते और असामान्य थकान इसके लक्षण हैं।
टाइप 2 (गंभीर रूप): इसमें तंत्रिका तंत्र, फेफड़े और हृदय प्रभावित होते हैं। यह जानलेवा हो सकता है और तुरंत इलाज माँगता है।
इसके अलावा आर्टेरियल गैस एम्बोलिज़्म नाम की एक संबंधित स्थिति भी होती है, जिसमें फेफड़ों से निकले हवा के बुलबुले धमनियों के ज़रिए दिमाग तक पहुँचकर स्ट्रोक जैसे लक्षण पैदा करते हैं।
लक्षण
लक्षण आमतौर पर पानी से बाहर आने के 15 मिनट से 12 घंटे के भीतर दिखने लगते हैं। कभी-कभी ये 24 से 48 घंटे बाद भी उभर सकते हैं। मुख्य लक्षण ये हैं:
- जोड़ों में तेज़, गहरा और लगातार दर्द
- अत्यधिक थकान और कमज़ोरी
- सिरदर्द, चक्कर आना और संतुलन बिगड़ना
- हाथ-पैरों में झुनझुनी, सुन्नपन या चींटियाँ रेंगने जैसा एहसास
- त्वचा में खुजली, दाने या संगमरमर जैसे धब्बे
- साँस फूलना, सीने में दर्द और सूखी खाँसी
- धुंधला दिखना, बोलने या समझने में दिक्कत
- मांसपेशियों में कमज़ोरी, लकवा, पेशाब रोक पाने में परेशानी
- गंभीर स्थिति में बेहोशी और दौरे
कई लोग शुरुआती दर्द को थकान या मांसपेशियों की ऐंठन समझकर टाल देते हैं। यही सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है।
जोखिम बढ़ाने वाले कारण
कुछ परिस्थितियाँ इस खतरे को बढ़ा देती हैं:
- बहुत तेज़ी से ऊपर आना
- अधिक गहराई और लंबा गोता
- एक ही दिन में कई गोते लगाना, खासकर गहरे गोते
- गोता लगाने के तुरंत बाद हवाई यात्रा करना या पहाड़ी ऊँचाई पर जाना, क्योंकि इससे बाहरी दबाव और घट जाता है
- शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन)
- अत्यधिक थकान, ठंडा पानी और गोते के तुरंत बाद कठोर व्यायाम
- मोटापा, बढ़ती उम्र और शराब का सेवन
दिलचस्प बात यह है कि अगर गोताखोर सारे नियम मानता हो, तब भी जोखिम पूरी तरह शून्य नहीं होता। हर शरीर अलग प्रतिक्रिया करता है।
कौन-कौन प्रभावित हो सकता है?
यह बीमारी सिर्फ मनोरंजन के लिए स्कूबा डाइविंग करने वालों तक सीमित नहीं है। इससे प्रभावित हो सकने वाले अन्य लोग हैं:
- पेशेवर गोताखोर, तेल-गैस उद्योग के सैचुरेशन डाइवर और नौसेना के गोताखोर
- मोती और समुद्री भोजन निकालने वाले मछुआरे
- सुरंग व पुल निर्माण में दबावयुक्त कक्षों में काम करने वाले मज़दूर
- बिना दबाव वाले विमानों में बहुत ऊँचाई पर उड़ने वाले पायलट और अंतरिक्ष यात्री (स्पेसवॉक की तैयारी में खास सावधानी बरती जाती है)
निदान
डीकंप्रेशन सिकनेस का निदान मुख्यतः लक्षणों और गोताखोरी के इतिहास पर आधारित होता है। डॉक्टर पूछते हैं कि गोता कितनी गहराई और कितनी देर का था, ऊपर आने की गति कैसी थी और लक्षण कब शुरू हुए। इसके लिए कोई एक निश्चित जाँच नहीं है। कभी-कभी सीटी स्कैन या एमआरआई से दिमाग व रीढ़ की स्थिति देखी जाती है। लेकिन अगर संदेह मज़बूत हो, तो जाँच के इंतज़ार में इलाज में देरी नहीं की जाती।
इलाज
प्राथमिक उपचार: संदेह होते ही पीड़ित को लिटाकर आराम की स्थिति में रखें। उसे 100% शुद्ध ऑक्सीजन दें, जो ऑक्सीजन मास्क से दी जाती है। इससे नाइट्रोजन शरीर से बाहर निकलने में मदद मिलती है। उसे पानी पिलाएँ (अगर वह होश में हो) और तुरंत आपातकालीन सेवा को बुलाएँ। दोबारा पानी में न उतरने दें।
निश्चित उपचार: हाइपरबैरिक ऑक्सीजन थेरेपी (रीकंप्रेशन चैंबर): इसमें मरीज़ को एक विशेष दबाव-कक्ष में रखा जाता है, जहाँ दबाव फिर से बढ़ाया जाता है। इससे बुलबुले दोबारा घुल जाते हैं। फिर दबाव को बहुत धीरे-धीरे घटाया जाता है ताकि नाइट्रोजन सुरक्षित रूप से बाहर निकल सके। साथ ही उच्च दबाव में शुद्ध ऑक्सीजन दी जाती है। इलाज जितनी जल्दी शुरू होता है, पूरी तरह ठीक होने की संभावना उतनी बढ़ती है। गंभीर मामलों में कई सत्र लग सकते हैं।
एक ज़रूरी बात: पीड़ित को ठीक होने की उम्मीद में “थोड़ा रुककर देखने” की सलाह न दें। देरी से स्थायी तंत्रिका क्षति हो सकती है।
रोकथाम: सुरक्षित गोताखोरी के नियम
डीकंप्रेशन सिकनेस का सबसे अच्छा “इलाज” उससे बचाव है:
- धीरे ऊपर आएँ: आमतौर पर चढ़ाव की गति 9 मीटर प्रति मिनट से अधिक न रखें, और ज़्यादा सतर्क नियम इससे भी धीमे हैं।
- सेफ्टी स्टॉप: लगभग 5 मीटर की गहराई पर कम से कम 3 मिनट रुकें।
- डाइव टेबल और डाइव कंप्यूटर का उपयोग: ये गहराई और समय के अनुसार सुरक्षित सीमा बताते हैं। उनकी सीमा (no-decompression limit) कभी पार न करें।
- गोते के बीच पर्याप्त विश्राम: सतह पर रुकने का समय पूरा करें।
- उड़ान से पहले इंतज़ार: आम तौर पर एक गोते के बाद लगभग 12 घंटे और बार-बार या गहरे गोतों के बाद 18 घंटे या उससे अधिक रुकने की सलाह दी जाती है।
- पानी पिएँ और शराब से दूर रहें।
- प्रमाणित प्रशिक्षण लें: PADI, SSI जैसी मान्यता प्राप्त संस्थाओं से प्रशिक्षण लेकर ही गोता लगाएँ।
- स्वास्थ्य जाँच: हृदय या फेफड़ों की समस्या हो तो गोताखोरी से पहले डॉक्टर की सलाह अनिवार्य है।
- कभी अकेले न जाएँ: बडी सिस्टम अपनाएँ।
भ्रांतियाँ और तथ्य
भ्रांति: यह सिर्फ बहुत गहरे गोतों में होती है।
तथ्य: सीमित गहराई पर भी, खासकर नियम तोड़ने या तेज़ी से चढ़ने पर, यह हो सकती है।
भ्रांति: लक्षण थोड़ी देर में अपने आप ठीक हो जाते हैं।
तथ्य: लक्षण दब सकते हैं, पर क्षति जारी रह सकती है। चिकित्सकीय जाँच ज़रूरी है।
भ्रांति: डाइव कंप्यूटर पहन लेने से खतरा खत्म हो जाता है।
तथ्य: कंप्यूटर जोखिम घटाता है, खत्म नहीं करता।
निष्कर्ष
डीकंप्रेशन सिकनेस प्रकृति के भौतिक नियमों से जुड़ी एक गंभीर चेतावनी है। समुद्र की गहराई हमें जितना आकर्षित करती है, उतना ही सम्मान और अनुशासन भी माँगती है। इसके पीछे का विज्ञान सरल है: दबाव बदलता है तो शरीर में घुली गैस की स्थिति भी बदलती है। और इसका समाधान भी उतना ही सरल है: धीरे चढ़ें, नियम मानें और समय रहते मदद लें। सही प्रशिक्षण, उचित उपकरण और सतर्कता के साथ गोताखोरी एक सुरक्षित और अविस्मरणीय अनुभव बन सकती है। लेकिन लापरवाही की कीमत कभी-कभी जीवन भर की विकलांगता या जान से चुकानी पड़ती है। इसलिए याद रखें: गोता जितना गहरा, ऊपर आने की जल्दी उतनी ही खतरनाक।
