रेडिएशन सिकनेस (विकिरण बीमारी): कारण, लक्षण, चरण, उपचार और बचाव
प्रस्तावना
हमारे चारों ओर विकिरण (रेडिएशन) हमेशा मौजूद रहता है। सूरज की किरणों, मिट्टी, चट्टानों, यहाँ तक कि हमारे भोजन में भी प्राकृतिक रूप से थोड़ी मात्रा में विकिरण पाया जाता है। यह मात्रा इतनी कम होती है कि शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुँचाती। लेकिन जब कोई व्यक्ति थोड़े ही समय में बहुत अधिक मात्रा में आयनीकरण विकिरण (Ionizing Radiation) के संपर्क में आ जाता है, तब शरीर की कोशिकाएँ गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। इसी स्थिति को रेडिएशन सिकनेस या विकिरण बीमारी कहा जाता है। चिकित्सा विज्ञान में इसे एक्यूट रेडिएशन सिंड्रोम (Acute Radiation Syndrome – ARS) भी कहते हैं।
यह बीमारी संक्रामक नहीं है। यानी पीड़ित व्यक्ति से यह दूसरों में नहीं फैलती। हालाँकि, यदि व्यक्ति के शरीर या कपड़ों पर रेडियोधर्मी धूल या कण चिपके हों, तो उनसे आसपास के लोग प्रभावित हो सकते हैं, इसलिए उन्हें हटाना आवश्यक होता है।
विकिरण क्या है और कितने प्रकार का होता है?
विकिरण ऊर्जा का वह रूप है जो तरंगों या कणों के रूप में यात्रा करता है। इसे मुख्यतः दो वर्गों में बाँटा जाता है:
1. गैर-आयनीकरण विकिरण: इसमें रेडियो तरंगें, माइक्रोवेव, मोबाइल सिग्नल और दृश्य प्रकाश आते हैं। इनमें इतनी ऊर्जा नहीं होती कि वे परमाणुओं से इलेक्ट्रॉन अलग कर सकें, इसलिए इनसे रेडिएशन सिकनेस नहीं होती।
2. आयनीकरण विकिरण: इसमें एक्स-रे, गामा किरणें, अल्फा कण, बीटा कण और न्यूट्रॉन शामिल हैं। इनमें इतनी ऊर्जा होती है कि ये कोशिकाओं के भीतर परमाणुओं को आयनित कर देते हैं और डीएनए (DNA) को तोड़ सकते हैं। रेडिएशन सिकनेस इसी प्रकार के विकिरण से होती है।
रेडिएशन सिकनेस कैसे होती है?
जब उच्च ऊर्जा वाला विकिरण शरीर से गुजरता है, तो वह कोशिकाओं के डीएनए को नुकसान पहुँचाता है। जिन कोशिकाएँ तेजी से विभाजित होती हैं, वे सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। इनमें शामिल हैं:
- अस्थि मज्जा (बोन मैरो) की कोशिकाएँ, जो रक्त बनाती हैं
- आँतों की भीतरी परत की कोशिकाएँ
- त्वचा और बालों की जड़ों की कोशिकाएँ
इसी कारण विकिरण बीमारी में रक्त की कमी, संक्रमण, उल्टी-दस्त, बाल झड़ना और त्वचा जलने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
प्रमुख कारण
रेडिएशन सिकनेस सामान्य जीवन में बहुत दुर्लभ है। यह तभी होती है जब व्यक्ति बहुत कम समय में बहुत अधिक विकिरण झेलता है। इसके मुख्य कारण हैं:
- परमाणु दुर्घटनाएँ: जैसे 1986 की चेर्नोबिल और 2011 की फुकुशिमा जैसी घटनाएँ, जिनमें रिएक्टरों से भारी मात्रा में रेडियोधर्मी पदार्थ निकले।
- परमाणु हथियारों का प्रयोग: हिरोशिमा और नागासाकी (1945) में जीवित बचे हजारों लोग इस बीमारी से पीड़ित हुए।
- “डर्टी बम” जैसे आतंकी हमले: इनमें पारंपरिक विस्फोटक के साथ रेडियोधर्मी पदार्थ फैलाया जाता है।
- औद्योगिक या चिकित्सकीय दुर्घटनाएँ: रेडियोधर्मी स्रोतों का लापरवाही से संभालना, खोए हुए या चोरी हुए स्रोत, या रेडियोथेरेपी मशीन में गड़बड़ी।
- अनुसंधान प्रयोगशालाओं में हादसे: अत्यधिक शक्तिशाली स्रोतों के साथ असावधानी।
ध्यान रखें कि सामान्य एक्स-रे, सीटी स्कैन या मोबाइल फोन से रेडिएशन सिकनेस नहीं होती, क्योंकि इनकी खुराक बहुत कम होती है।
विकिरण की खुराक और उसका प्रभाव
विकिरण की मात्रा को ग्रे (Gray, Gy) या सीवर्ट (Sievert, Sv) में मापा जाता है। मोटे तौर पर:
- 1 ग्रे से कम: आमतौर पर गंभीर लक्षण नहीं, या हल्के लक्षण
- 1 से 2 ग्रे: हल्की बीमारी, अधिकांश लोग ठीक हो जाते हैं
- 2 से 6 ग्रे: गंभीर बीमारी, उपचार के बिना जान का खतरा
- 6 ग्रे से अधिक: अत्यंत गंभीर, जीवित रहने की संभावना बहुत कम
- 10 ग्रे से अधिक: अक्सर घातक
इसके अतिरिक्त, खुराक के साथ-साथ यह भी मायने रखता है कि विकिरण पूरे शरीर पर पड़ा या किसी एक हिस्से पर, कितने समय में पड़ा, और व्यक्ति की उम्र व स्वास्थ्य कैसा था।
रेडिएशन सिकनेस के चरण
यह बीमारी आमतौर पर चार चरणों में आगे बढ़ती है:
1. प्रोड्रोमल चरण (प्रारंभिक चरण)
विकिरण के कुछ मिनटों से कुछ घंटों के भीतर लक्षण शुरू होते हैं। इनमें मतली, उल्टी, भूख न लगना, दस्त, थकान और सिरदर्द शामिल हैं। खुराक जितनी अधिक होगी, लक्षण उतनी जल्दी और तीव्रता से दिखेंगे। यह चरण कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक रह सकता है।
2. गुप्त चरण (Latent Phase)
इस चरण में लक्षण अचानक कम हो जाते हैं और व्यक्ति स्वस्थ महसूस करने लगता है। यह सबसे भ्रामक चरण है, क्योंकि शरीर के भीतर कोशिकाओं की क्षति जारी रहती है। यह कुछ घंटों से लेकर कई हफ्तों तक चल सकता है। अधिक खुराक होने पर यह चरण छोटा होता है।
3. प्रकट बीमारी का चरण (Manifest Illness)
अब गंभीर लक्षण सामने आते हैं, जो प्रभावित अंग-तंत्र पर निर्भर करते हैं। इस चरण में संक्रमण, रक्तस्राव, बुखार, गंभीर दस्त, निर्जलीकरण और अंगों की विफलता हो सकती है।
4. रिकवरी या मृत्यु
यदि खुराक सीमित हो और समय पर उपचार मिले, तो व्यक्ति कई हफ्तों से महीनों में ठीक होने लगता है। अत्यधिक खुराक की स्थिति में अंग विफल हो सकते हैं और मृत्यु हो सकती है।
रेडिएशन सिकनेस के प्रकार (सिंड्रोम)
1. हेमेटोपोएटिक सिंड्रोम (रक्त निर्माण तंत्र): लगभग 0.7 से 10 ग्रे की खुराक पर होता है। अस्थि मज्जा क्षतिग्रस्त होने से श्वेत रक्त कोशिकाएँ, लाल रक्त कोशिकाएँ और प्लेटलेट्स घट जाती हैं। इससे संक्रमण का खतरा, एनीमिया और रक्तस्राव होता है।
2. जठरांत्र (गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल) सिंड्रोम: लगभग 6 से 10 ग्रे या अधिक पर होता है। आँतों की परत नष्ट होने से तेज दस्त, पेट दर्द, उल्टी, निर्जलीकरण और खूनी मल की समस्या होती है।
3. तंत्रिका-हृदय-वाहिका (न्यूरोवैस्कुलर) सिंड्रोम: बहुत अधिक खुराक (लगभग 20 ग्रे या अधिक) पर होता है। इसमें भ्रम, बेहोशी, दौरे, रक्तचाप का गिरना और कुछ घंटों से दिनों में मृत्यु हो सकती है।
4. त्वचीय (क्यूटेनियस) सिंड्रोम: त्वचा पर लालिमा, सूजन, छाले, जलन और घाव होते हैं। बाल झड़ने लगते हैं। गंभीर मामलों में त्वचा की गहरी क्षति होती है।
प्रमुख लक्षण
- मतली और बार-बार उल्टी
- दस्त, कभी-कभी खूनी
- सिरदर्द और चक्कर
- बुखार
- अत्यधिक कमजोरी और थकान
- त्वचा का लाल पड़ना, जलन, छाले
- बाल झड़ना
- मुँह में छाले और मसूड़ों से रक्तस्राव
- आसानी से नील पड़ना
- बार-बार संक्रमण
- भ्रम या बेहोशी (गंभीर मामलों में)
यदि किसी को विकिरण के संपर्क में आने की आशंका हो और उसे उल्टी या त्वचा में जलन होने लगे, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
निदान कैसे किया जाता है?
डॉक्टर निम्न आधार पर निदान करते हैं:
- इतिहास: व्यक्ति कहाँ था, कितने समय तक विकिरण स्रोत के पास रहा
- लक्षणों का समय: उल्टी कितनी जल्दी शुरू हुई, यह खुराक का संकेत देता है
- रक्त जाँच: विशेषकर लिम्फोसाइट की गिनती, जो पहले 24 से 48 घंटों में तेजी से गिरती है। नियमित अंतराल पर पूर्ण रक्त गणना (CBC) की जाती है।
- क्रोमोसोम जाँच (बायोडोसिमेट्री): रक्त कोशिकाओं में गुणसूत्र की क्षति देखकर खुराक का अनुमान लगाया जाता है।
- डोसीमीटर और काउंटर: शरीर या कपड़ों पर रेडियोधर्मी पदार्थ की उपस्थिति मापने के लिए
उपचार
रेडिएशन सिकनेस का कोई एक सीधा इलाज नहीं है जो क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को तुरंत ठीक कर दे। उपचार का उद्देश्य लक्षणों को नियंत्रित करना, संक्रमण रोकना और शरीर को ठीक होने का समय देना है।
1. डीकंटैमिनेशन (संदूषण हटाना): सबसे पहले पीड़ित के कपड़े उतारकर सीलबंद थैले में रखे जाते हैं। इससे लगभग 90 प्रतिशत बाहरी रेडियोधर्मी संदूषण हट जाता है। फिर त्वचा को साबुन और पानी से धोया जाता है।
2. सहायक चिकित्सा: इसमें शामिल हैं:
- उल्टी रोकने की दवाएँ
- नसों से तरल पदार्थ (IV fluids) देकर निर्जलीकरण रोकना
- दर्द निवारक
- त्वचा के घावों की देखभाल
3. संक्रमण नियंत्रण: श्वेत कोशिकाएँ कम होने पर मरीज को अलग, स्वच्छ वातावरण में रखा जाता है और एंटीबायोटिक, एंटीफंगल या एंटीवायरल दवाएँ दी जाती हैं।
4. रक्त संबंधी उपचार: रक्त चढ़ाना, प्लेटलेट्स देना, और विशेष दवाएँ जो अस्थि मज्जा को रक्त कोशिकाएँ बनाने के लिए प्रेरित करती हैं (जैसे वृद्धि कारक)। अत्यंत गंभीर मामलों में अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण पर विचार किया जाता है, हालाँकि इसके परिणाम सीमित रहे हैं।
5. आंतरिक संदूषण का उपचार: यदि रेडियोधर्मी पदार्थ साँस या भोजन से शरीर के भीतर चला गया हो, तो विशेष दवाएँ दी जाती हैं:
- पोटैशियम आयोडाइड (KI): रेडियोधर्मी आयोडीन से थायरॉइड ग्रंथि की रक्षा करती है। इसे केवल चिकित्सा निर्देश पर और समय रहते लेना चाहिए।
- प्रशियन ब्लू: रेडियोधर्मी सीज़ियम और थैलियम को शरीर से बाहर निकालने में सहायक
- DTPA: प्लूटोनियम, अमेरिकियम जैसे पदार्थों को हटाने में उपयोगी
दीर्घकालिक प्रभाव
जो लोग तीव्र बीमारी से उबर जाते हैं, उन्हें भी भविष्य में जोखिम रहता है:
- कैंसर का बढ़ा खतरा: विशेषकर ल्यूकेमिया, थायरॉइड, स्तन और फेफड़ों का कैंसर
- मोतियाबिंद
- बांझपन या प्रजनन क्षमता में कमी
- आनुवंशिक प्रभाव की आशंका
- गर्भस्थ शिशु पर प्रभाव: गर्भावस्था में विकिरण से भ्रूण में विकृति या मानसिक विकास में बाधा हो सकती है
- मानसिक तनाव: चिंता, अवसाद और भय जैसी समस्याएँ
इसलिए ठीक होने के बाद भी नियमित चिकित्सकीय निगरानी जरूरी है।
बचाव के उपाय
विकिरण से बचाव के तीन मूल सिद्धांत हैं: समय, दूरी और आवरण।
- समय कम करें: विकिरण स्रोत के पास जितना कम समय बिताएँगे, खुराक उतनी कम होगी।
- दूरी बढ़ाएँ: स्रोत से जितनी दूर रहेंगे, जोखिम उतना घटेगा।
- आवरण का उपयोग: सीसा (लेड) की एप्रन, मोटी कंक्रीट की दीवारें और अन्य परिरक्षण सामग्री विकिरण को रोकती है।
आपातकालीन स्थिति में क्या करें (परमाणु या रेडियोधर्मी घटना):
- तुरंत किसी मजबूत इमारत के भीतर चले जाएँ, खासकर बेसमेंट या भीतरी कमरे में
- खिड़की-दरवाजे बंद रखें और पंखे, एसी बंद कर दें
- बाहर के कपड़े उतारकर बंद थैले में रखें और स्नान करें
- सरकारी घोषणाओं, रेडियो और आधिकारिक सूचनाओं का पालन करें
- बिना सलाह के कोई दवा, विशेषकर आयोडीन की गोलियाँ, न लें
- पानी और भोजन केवल सुरक्षित और ढके हुए स्रोतों से ही लें
कार्यस्थल पर सुरक्षा: अस्पतालों के रेडियोलॉजी विभाग, परमाणु संयंत्रों और उद्योगों में काम करने वालों को डोसीमीटर पहनना, सुरक्षा नियमों का पालन करना और नियमित स्वास्थ्य जाँच कराना चाहिए। भारत में परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) इस क्षेत्र के सुरक्षा मानकों की निगरानी करता है।
भ्रांतियाँ और तथ्य
- भ्रांति: रेडिएशन सिकनेस छूने से फैलती है।
तथ्य: यह संक्रामक नहीं है, केवल रेडियोधर्मी धूल या कण दूसरों को प्रभावित कर सकते हैं। - भ्रांति: मोबाइल टॉवर या फोन से रेडिएशन सिकनेस हो जाती है।
तथ्य: ये गैर-आयनीकरण विकिरण उत्सर्जित करते हैं, जिनसे यह बीमारी नहीं होती। - भ्रांति: एक एक्स-रे कराना खतरनाक है।
तथ्य: आवश्यकता पड़ने पर कराया गया एक्स-रे सुरक्षित है, उसकी खुराक बहुत कम होती है।
निष्कर्ष
रेडिएशन सिकनेस एक गंभीर लेकिन अत्यंत दुर्लभ बीमारी है, जो केवल अत्यधिक विकिरण के अल्प समय में संपर्क से होती है। इसके लक्षण शुरू में मतली और उल्टी जैसे सामान्य लग सकते हैं, पर समय के साथ यह जानलेवा रूप ले सकती है। शीघ्र पहचान, तुरंत संदूषण हटाना और विशेषज्ञ चिकित्सा देखभाल जीवन बचाने में निर्णायक होते हैं।
आम लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अनावश्यक भय न पालें, पर आपात स्थिति में सही कदम उठाना जानें। जागरूकता, सुरक्षा नियमों का पालन और सरकारी निर्देशों पर भरोसा ही सबसे बड़ा बचाव है। यदि किसी को विकिरण के संपर्क की आशंका हो, तो बिना देरी के नजदीकी अस्पताल या आपदा प्रबंधन सेवाओं से संपर्क करना चाहिए।
