हेपैटोसेलुलर कार्सिनोमा (लिवर कैंसर): कारण, लक्षण, जाँच और इलाज
परिचय
हेपैटोसेलुलर कार्सिनोमा (Hepatocellular Carcinoma, संक्षेप में HCC) लिवर का सबसे आम प्राथमिक कैंसर है। प्राथमिक का अर्थ है कि कैंसर की शुरुआत सीधे लिवर की कोशिकाओं यानी हेपैटोसाइट्स से होती है, किसी दूसरे अंग से फैलकर नहीं आती। दुनिया भर में लिवर कैंसर के लगभग 75 से 85 प्रतिशत मामले HCC के होते हैं। कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में इसकी गिनती होती है, क्योंकि अधिकतर मरीजों में यह बीमारी देर से पकड़ में आती है।
लिवर हमारे शरीर का सबसे बड़ा आंतरिक अंग है, जो भोजन के पाचन, विषैले पदार्थों की सफाई, प्रोटीन निर्माण, रक्त के थक्के जमाने वाले तत्वों के निर्माण और ऊर्जा के भंडारण जैसे सैकड़ों कार्य करता है। इसलिए इसमें कैंसर होना पूरे शरीर को प्रभावित करता है।
HCC कैसे विकसित होता है?
HCC अधिकतर उन लोगों में होता है जिनके लिवर में पहले से लंबे समय की क्षति या सूजन रही हो। लिवर में बार-बार चोट और सूजन होने पर वहाँ घाव जैसे ऊतक (फाइब्रोसिस) बनने लगते हैं। यह स्थिति आगे चलकर सिरोसिस में बदल जाती है, जिसमें लिवर सख्त और गाँठदार हो जाता है। सिरोसिस वाले लिवर में कोशिकाएँ बार-बार नष्ट होती और दोबारा बनती हैं। इस प्रक्रिया में कोशिकाओं के डीएनए में गड़बड़ियाँ (म्यूटेशन) जमा हो जाती हैं, जिनसे कैंसर का जन्म हो सकता है। हालाँकि कुछ मामलों में, खासकर हेपेटाइटिस बी के संक्रमण में, सिरोसिस के बिना भी HCC हो सकता है।
प्रमुख कारण और जोखिम कारक
1. क्रॉनिक हेपेटाइटिस बी (HBV) संक्रमण: एशिया और अफ्रीका में HCC का यह सबसे बड़ा कारण है। यह वायरस सीधे लिवर कोशिकाओं के डीएनए को प्रभावित कर सकता है। भारत में भी हेपेटाइटिस बी का बोझ काफी है।
2. क्रॉनिक हेपेटाइटिस सी (HCV) संक्रमण: लंबे समय तक रहने वाला हेपेटाइटिस सी सिरोसिस और फिर कैंसर का जोखिम बढ़ाता है।
3. अत्यधिक शराब का सेवन: वर्षों तक अधिक शराब पीने से अल्कोहलिक लिवर रोग, सिरोसिस और अंततः HCC हो सकता है।
4. नॉन-अल्कोहलिक फैटी लिवर रोग (NAFLD/MASLD): मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज़ और मेटाबोलिक सिंड्रोम से जुड़ा फैटी लिवर अब तेजी से बढ़ता कारण है। भारत में शहरी जीवनशैली के कारण इसके मामले बढ़ रहे हैं।
5. अफ्लाटॉक्सिन: यह फफूंद (Aspergillus) से बनने वाला विषैला पदार्थ है, जो नमी में रखे अनाज, मूँगफली और मक्का में पाया जा सकता है। इसका लंबे समय तक सेवन लिवर कैंसर का जोखिम बढ़ाता है, खासकर हेपेटाइटिस बी के मरीजों में।
6. अन्य कारण: हीमोक्रोमैटोसिस (शरीर में आयरन का अधिक जमाव), विल्सन रोग, ऑटोइम्यून लिवर रोग, तंबाकू का सेवन और पारिवारिक इतिहास भी जोखिम बढ़ा सकते हैं। पुरुषों में यह बीमारी महिलाओं की तुलना में अधिक देखी जाती है, और उम्र बढ़ने के साथ जोखिम बढ़ता है।
लक्षण
HCC की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती अवस्था में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते। जब लक्षण आते हैं, तब तक बीमारी प्रायः आगे बढ़ चुकी होती है। सामान्य लक्षण इस प्रकार हैं:
- पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में दर्द या भारीपन
- बिना कारण वजन घटना और भूख कम लगना
- लगातार थकान और कमजोरी
- थोड़ा खाने पर ही पेट भरा महसूस होना, जी मिचलाना या उल्टी
- पीलिया (त्वचा और आँखों का पीला पड़ना)
- पेट में पानी भरना (जलोदर) और पेट का फूलना
- पैरों में सूजन
- पेट के दाहिने ऊपरी भाग में गाँठ महसूस होना
- आसानी से खून बहना या नील पड़ना
- पहले से सिरोसिस के मरीज की हालत अचानक बिगड़ना
इनमें से कई लक्षण सिरोसिस के भी होते हैं, इसलिए सिर्फ लक्षणों के आधार पर निदान संभव नहीं है। किसी भी संदिग्ध लक्षण पर डॉक्टर से मिलना जरूरी है।
किन लोगों को नियमित स्क्रीनिंग करानी चाहिए?
चूँकि शुरुआती चरण में लक्षण नहीं होते, इसलिए उच्च जोखिम वाले लोगों की नियमित निगरानी (सर्विलांस) बहुत महत्वपूर्ण है। आम तौर पर निम्न लोगों को हर छह महीने में जाँच कराने की सलाह दी जाती है:
- सिरोसिस के सभी मरीज
- क्रॉनिक हेपेटाइटिस बी के कुछ मरीज, खासकर जिनके परिवार में लिवर कैंसर का इतिहास हो
- क्रॉनिक हेपेटाइटिस सी के मरीज, जिन्हें एडवांस फाइब्रोसिस हो
स्क्रीनिंग में आम तौर पर पेट का अल्ट्रासाउंड और रक्त में अल्फा-फीटोप्रोटीन (AFP) की जाँच की जाती है। नियमित निगरानी से कैंसर छोटे आकार में पकड़ में आ सकता है, जब इलाज की सफलता की संभावना कहीं अधिक होती है।
निदान (जाँच की प्रक्रिया)
1. रक्त परीक्षण: लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT), प्रोथ्रॉम्बिन टाइम (PT/INR), और AFP स्तर। AFP हर मरीज में नहीं बढ़ता, इसलिए इसका सामान्य होना कैंसर को पूरी तरह नकारता नहीं।
2. इमेजिंग: अल्ट्रासाउंड पहली जाँच होती है। संदेह होने पर मल्टीफेज़ CT स्कैन या कंट्रास्ट MRI की जाती है। HCC की खासियत यह है कि सिरोसिस के मरीज में इसकी इमेजिंग विशेष पैटर्न दिखाती है (धमनी चरण में तेज़ उभार और बाद में कंट्रास्ट का बाहर निकल जाना), जिसके आधार पर कई बार बायोप्सी के बिना भी निदान हो सकता है।
3. बायोप्सी: जब इमेजिंग से स्थिति स्पष्ट न हो, तब ऊतक का नमूना लेकर जाँच की जाती है।
4. स्टेजिंग: बीमारी की अवस्था तय करने के लिए ट्यूमर का आकार, संख्या, नसों में फैलाव, लिवर की कार्यक्षमता (चाइल्ड-पग स्कोर) और मरीज की सामान्य स्थिति देखी जाती है। विश्व में BCLC (Barcelona Clinic Liver Cancer) स्टेजिंग प्रणाली का व्यापक उपयोग होता है।
इलाज के विकल्प
HCC का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि ट्यूमर कितना बड़ा है, कितने हैं, लिवर कितना काम कर रहा है और मरीज की सेहत कैसी है। इलाज का निर्णय अक्सर हेपेटोलॉजिस्ट, सर्जन, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट और ऑन्कोलॉजिस्ट की टीम मिलकर लेती है।
1. सर्जरी (रिसेक्शन): यदि ट्यूमर छोटा और अकेला हो और लिवर की कार्यक्षमता अच्छी हो, तो प्रभावित हिस्से को निकाल दिया जाता है। यह उपचारात्मक विकल्प है।
2. लिवर ट्रांसप्लांट: शुरुआती अवस्था के कैंसर और गंभीर सिरोसिस वाले मरीजों के लिए यह सबसे प्रभावी इलाज हो सकता है, क्योंकि इसमें कैंसर और बीमार लिवर, दोनों हट जाते हैं। इसके लिए तय मानदंड (जैसे मिलान मानदंड) होते हैं। भारत में जीवित डोनर से भी ट्रांसप्लांट संभव है।
3. एब्लेशन: छोटे ट्यूमर में रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन (RFA) या माइक्रोवेव एब्लेशन से ट्यूमर को गर्मी द्वारा नष्ट किया जाता है। यह त्वचा के जरिए सुई डालकर किया जाता है और बड़ी सर्जरी से बचाता है।
4. ट्रांसआर्टेरियल थेरेपी: इंटरमीडिएट अवस्था में TACE (ट्रांसआर्टेरियल कीमोएम्बोलाइज़ेशन) या TARE (रेडियोएम्बोलाइज़ेशन) किया जाता है। इनमें ट्यूमर को खून पहुँचाने वाली धमनी में दवा या रेडियोधर्मी कण पहुँचाकर उसकी रक्त आपूर्ति रोकी जाती है।
5. रेडियोथेरेपी: स्टीरियोटैक्टिक बॉडी रेडियोथेरेपी (SBRT) जैसी आधुनिक तकनीकें चुनिंदा मरीजों में उपयोगी हैं।
6. सिस्टेमिक (दवा आधारित) इलाज: एडवांस अवस्था में टार्गेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी का उपयोग होता है। हाल के वर्षों में इम्यून चेकपॉइंट इनहिबिटर्स के संयोजनों से पारंपरिक दवाओं की तुलना में बेहतर परिणाम देखे गए हैं। कौन-सी दवा उपयुक्त है, यह विशेषज्ञ तय करते हैं।
7. सहायक देखभाल: दर्द प्रबंधन, पोषण, जलोदर का नियंत्रण और मानसिक सहयोग इलाज का अहम हिस्सा हैं।
रोग का पूर्वानुमान
HCC का पूर्वानुमान काफी हद तक निदान के समय की अवस्था और लिवर की कार्यक्षमता पर निर्भर करता है। शुरुआती अवस्था में पकड़े जाने और उपचारात्मक इलाज मिलने पर कई मरीज लंबे समय तक स्वस्थ रह सकते हैं। एडवांस अवस्था में इलाज का उद्देश्य बीमारी को नियंत्रित करना और जीवन की गुणवत्ता व अवधि बढ़ाना होता है। चूँकि HCC के दोबारा लौटने की संभावना रहती है, इलाज के बाद भी नियमित फॉलो-अप जरूरी है।
रोकथाम के उपाय
HCC के अधिकांश कारण नियंत्रित किए जा सकते हैं:
- हेपेटाइटिस बी का टीका: यह सबसे प्रभावी रोकथाम में से एक है। बच्चों और जोखिम वाले वयस्कों को टीका जरूर लगवाना चाहिए।
- हेपेटाइटिस बी और सी का इलाज: हेपेटाइटिस सी का आज प्रभावी दवाओं से इलाज संभव है। हेपेटाइटिस बी में एंटीवायरल दवाएँ वायरस को दबाकर जोखिम घटाती हैं।
- शराब से परहेज़ या सीमित सेवन: लिवर रोग होने पर पूर्ण परहेज़ बेहतर है।
- वजन और डायबिटीज़ पर नियंत्रण: संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और स्वस्थ वजन फैटी लिवर से बचाव करते हैं।
- सुरक्षित अनाज भंडारण: अनाज और मूँगफली को सूखी जगह रखें और फफूंद लगे खाद्य पदार्थ न खाएँ।
- सुरक्षित इंजेक्शन और रक्त: नई सिरिंज का उपयोग करें, दूसरों के रेज़र या ब्रश साझा न करें, और असुरक्षित यौन संबंधों से बचें।
- तंबाकू से दूरी।
- नियमित जाँच: जोखिम वाले लोग डॉक्टर की सलाह से हर छह महीने में स्क्रीनिंग कराएँ।
निष्कर्ष
हेपैटोसेलुलर कार्सिनोमा एक गंभीर बीमारी है, लेकिन यह एक ऐसा कैंसर भी है जिसके कारण काफी हद तक पहचाने जा चुके हैं और जिसकी रोकथाम और शुरुआती पहचान संभव है। हेपेटाइटिस बी का टीकाकरण, हेपेटाइटिस के समय पर इलाज, शराब और मोटापे पर नियंत्रण तथा सिरोसिस के मरीजों की नियमित स्क्रीनिंग इस बीमारी के बोझ को काफी कम कर सकते हैं। यदि आपको या आपके किसी परिजन को लंबे समय से लिवर की बीमारी है, या ऊपर बताए गए लक्षण दिखाई दें, तो देर न करें और किसी गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट या हेपेटोलॉजिस्ट से सलाह लें। समय पर जागरूकता और जाँच ही इस बीमारी से बचाव और बेहतर इलाज की कुंजी है।
