ओवेरियन कैंसर (Ovarian Cancer)
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ओवेरियन कैंसर (अंडाशय का कैंसर): लक्षण, कारण, जाँच और इलाज

परिचय

महिलाओं के शरीर में अंडाशय (ओवरी) बादाम के आकार की दो छोटी ग्रंथियाँ होती हैं, जो गर्भाशय के दोनों ओर स्थित रहती हैं। इनका मुख्य काम अंडे (ओवा) बनाना और एस्ट्रोजन व प्रोजेस्टेरोन जैसे महत्वपूर्ण हार्मोन बनाना है। जब इन अंडाशयों की कोशिकाएँ अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं और गाँठ या ट्यूमर का रूप ले लेती हैं, तो उसे ओवेरियन कैंसर कहा जाता है।

ओवेरियन कैंसर को अक्सर “साइलेंट किलर” कहा जाता है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण बहुत हल्के होते हैं और आम पेट की समस्याओं जैसे लगते हैं। इसी कारण अधिकांश मामलों का पता तब चलता है जब रोग काफ़ी आगे बढ़ चुका होता है। इसलिए इसके बारे में जागरूकता बेहद ज़रूरी है।

ओवेरियन कैंसर के प्रकार

अंडाशय में कई तरह की कोशिकाएँ होती हैं, और जिस कोशिका से कैंसर शुरू होता है, उसी के आधार पर इसके प्रकार तय होते हैं:

1. एपिथेलियल ओवेरियन कैंसर: यह सबसे आम प्रकार है और लगभग 85 से 90 प्रतिशत मामले इसी श्रेणी के होते हैं। यह अंडाशय की बाहरी परत की कोशिकाओं से शुरू होता है। आजकल माना जाता है कि इसका एक बड़ा हिस्सा फैलोपियन ट्यूब की कोशिकाओं से भी उत्पन्न हो सकता है।

2. जर्म सेल ट्यूमर: ये अंडे बनाने वाली कोशिकाओं से शुरू होते हैं। ये दुर्लभ हैं और अधिकतर युवा महिलाओं व किशोरियों में पाए जाते हैं। इनका इलाज प्रायः अच्छे परिणाम देता है।

3. स्ट्रोमल ट्यूमर: ये हार्मोन बनाने वाली कोशिकाओं से शुरू होते हैं। ये भी कम पाए जाते हैं और अक्सर शुरुआती अवस्था में ही पकड़ में आ जाते हैं।

कारण और जोखिम कारक

ओवेरियन कैंसर का कोई एक निश्चित कारण नहीं है, लेकिन कुछ कारक इसका जोखिम बढ़ा सकते हैं:

  • उम्र: अधिकांश मामले रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज़) के बाद, यानी 50 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं में देखे जाते हैं।
  • पारिवारिक इतिहास: यदि माँ, बहन या नज़दीकी रिश्तेदार को ओवेरियन, स्तन या आंत का कैंसर हुआ हो, तो जोखिम बढ़ जाता है।
  • आनुवंशिक बदलाव: BRCA1 और BRCA2 जीन में बदलाव (म्यूटेशन) इसका प्रमुख कारण माना जाता है। लिंच सिंड्रोम से जुड़े जीन भी जोखिम बढ़ाते हैं।
  • गर्भधारण का इतिहास: जिन महिलाओं ने कभी गर्भधारण नहीं किया या जिन्हें पहली बार देर से गर्भधारण हुआ, उनमें जोखिम कुछ अधिक पाया गया है।
  • एंडोमेट्रियोसिस: इस स्थिति में कुछ प्रकार के ओवेरियन कैंसर का जोखिम थोड़ा बढ़ सकता है।
  • मोटापा: अधिक वज़न कई कैंसरों के जोखिम से जुड़ा है।
  • हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी: लंबे समय तक इसका उपयोग कुछ अध्ययनों में जोखिम से जुड़ा पाया गया है।
  • धूम्रपान: कुछ प्रकारों में इसका संबंध देखा गया है।

ध्यान रखें कि जोखिम कारक होने का मतलब यह नहीं कि कैंसर होगा ही, और कई महिलाओं में कोई स्पष्ट जोखिम कारक न होने पर भी यह रोग हो जाता है।

लक्षण: किन संकेतों को नज़रअंदाज़ न करें

इस रोग के लक्षण अस्पष्ट होते हैं, इसलिए लोग उन्हें गैस, अपच या माहवारी की समस्या समझ लेते हैं। प्रमुख लक्षण ये हैं:

  • पेट या पेड़ू (पेल्विक) क्षेत्र में लगातार दर्द या भारीपन
  • पेट का फूलना या सूजन, जो कई हफ्तों तक बनी रहे
  • थोड़ा खाते ही पेट भर जाने का एहसास या भूख कम लगना
  • बार-बार पेशाब आना या पेशाब की तात्कालिकता
  • कब्ज़ या मल त्याग की आदतों में बदलाव
  • बिना कारण वज़न घटना या बढ़ना
  • लगातार थकान
  • कमर के निचले हिस्से में दर्द
  • संभोग के दौरान दर्द
  • माहवारी में अनियमितता या मेनोपॉज़ के बाद योनि से रक्तस्राव

महत्वपूर्ण बात: यदि ऐसे लक्षण नए हों, लगभग रोज़ महसूस हों और दो से तीन हफ्ते से अधिक समय तक बने रहें, तो स्त्री रोग विशेषज्ञ से जाँच ज़रूर करवाएँ।

रोग की अवस्थाएँ (स्टेज)

ओवेरियन कैंसर को चार चरणों में बाँटा जाता है:

  • स्टेज 1: कैंसर केवल एक या दोनों अंडाशयों तक सीमित रहता है।
  • स्टेज 2: कैंसर पेल्विक क्षेत्र के अन्य अंगों, जैसे गर्भाशय या फैलोपियन ट्यूब तक फैल जाता है।
  • स्टेज 3: कैंसर पेट की झिल्ली या पेट के लिम्फ नोड्स तक पहुँच जाता है।
  • स्टेज 4: कैंसर फेफड़ों, यकृत (लिवर) जैसे दूर के अंगों तक फैल चुका होता है।

शुरुआती अवस्था में पता चलने पर इलाज के नतीजे काफ़ी बेहतर होते हैं, इसलिए समय पर निदान सबसे अहम है।

जाँच और निदान

यदि डॉक्टर को संदेह हो, तो वे निम्न जाँचें सुझा सकते हैं:

1. पेल्विक परीक्षण: डॉक्टर हाथ से अंडाशय में गाँठ या असामान्यता महसूस करने की कोशिश करते हैं।

2. अल्ट्रासाउंड: ट्रांसवेजाइनल अल्ट्रासाउंड से अंडाशय की बनावट और गाँठ का आकार देखा जाता है।

3. CA-125 ब्लड टेस्ट: यह एक ट्यूमर मार्कर है। इसका बढ़ा हुआ स्तर कैंसर की ओर संकेत कर सकता है, लेकिन यह अकेले निर्णायक नहीं है, क्योंकि एंडोमेट्रियोसिस, माहवारी या फाइब्रॉइड जैसी स्थितियों में भी यह बढ़ सकता है।

4. सीटी स्कैन, एमआरआई या पेट-सीटी: इनसे कैंसर के फैलाव का पता चलता है।

5. बायोप्सी: निश्चित निदान के लिए ऊतक (टिशू) का नमूना लेकर माइक्रोस्कोप से जाँचा जाता है। कई बार यह सर्जरी के दौरान ही होता है।

6. जेनेटिक टेस्टिंग: BRCA जैसे जीन में बदलाव की जाँच की जाती है, जो इलाज की दिशा तय करने और परिवार की अन्य महिलाओं के जोखिम का आकलन करने में मदद करती है।

इलाज के विकल्प

इलाज कैंसर के प्रकार, स्टेज, मरीज़ की उम्र और सामान्य स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। आमतौर पर इलाज में कई तरीकों का मेल होता है।

सर्जरी: यह उपचार का मुख्य आधार है। इसमें प्रभावित अंडाशय, फैलोपियन ट्यूब, गर्भाशय और आसपास के प्रभावित ऊतक निकाले जाते हैं। उन्नत अवस्था में सर्जन ट्यूमर को अधिकतम संभव सीमा तक हटाने का प्रयास करते हैं, जिसे “डीबल्किंग” कहते हैं। बहुत शुरुआती अवस्था में, यदि युवा महिला संतान की इच्छा रखती हो, तो कुछ मामलों में प्रजनन क्षमता बचाने वाली सर्जरी पर विचार किया जा सकता है। यह निर्णय कैंसर विशेषज्ञ (गायनेकोलॉजिकल ऑन्कोलॉजिस्ट) ही कर सकते हैं।

कीमोथेरेपी: इसमें दवाओं से कैंसर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है। यह सर्जरी के बाद बची हुई कोशिकाओं को खत्म करने के लिए दी जाती है, और कभी-कभी सर्जरी से पहले ट्यूमर को छोटा करने के लिए भी।

टार्गेटेड थेरेपी: ये आधुनिक दवाएँ कैंसर कोशिकाओं की विशेष कमज़ोरियों पर वार करती हैं। PARP इनहिबिटर जैसी दवाएँ BRCA म्यूटेशन वाली मरीज़ों में विशेष रूप से उपयोगी साबित हुई हैं।

हार्मोन थेरेपी: कुछ विशेष प्रकारों में हार्मोन को प्रभावित करने वाली दवाओं का उपयोग किया जाता है।

इम्यूनोथेरेपी और रेडिएशन: चुनिंदा मामलों में इनका उपयोग हो सकता है, हालाँकि ओवेरियन कैंसर में ये अपेक्षाकृत कम आम हैं।

बचाव और जोखिम घटाने के उपाय

इस कैंसर से पूरी तरह बचाव की कोई गारंटी नहीं है, लेकिन ये कदम जोखिम कम करने में सहायक हो सकते हैं:

  • स्वस्थ जीवनशैली: संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और वज़न नियंत्रण में रखें।
  • धूम्रपान से दूरी: तंबाकू का किसी भी रूप में सेवन न करें।
  • गर्भनिरोधक गोलियाँ: लंबे समय तक इनका उपयोग जोखिम घटाने से जुड़ा पाया गया है, पर इन्हें डॉक्टर की सलाह से ही लें, क्योंकि इनके अपने जोखिम भी हैं।
  • स्तनपान: यह भी कुछ हद तक सुरक्षात्मक माना जाता है।
  • उच्च जोखिम वाली महिलाएँ: जिनके परिवार में कैंसर का मज़बूत इतिहास है या जिनमें BRCA म्यूटेशन पाया गया है, उन्हें आनुवंशिक परामर्श लेना चाहिए। कुछ मामलों में डॉक्टर बचाव के तौर पर अंडाशय और फैलोपियन ट्यूब निकलवाने की सलाह दे सकते हैं।
  • नियमित स्वास्थ्य जाँच: वर्तमान में आम महिलाओं के लिए ओवेरियन कैंसर की कोई प्रभावी नियमित स्क्रीनिंग जाँच उपलब्ध नहीं है, इसलिए लक्षणों के प्रति सतर्क रहना ही सबसे बड़ा बचाव है।

मरीज़ की देखभाल और भावनात्मक सहारा

कैंसर का निदान किसी भी महिला और उसके परिवार के लिए मानसिक रूप से कठिन होता है। इलाज के दौरान थकान, बालों का झड़ना, मतली और कमज़ोरी आम हैं। ऐसे समय में:

  • पौष्टिक और सुपाच्य भोजन लें, और आहार के बारे में कैंसर विशेषज्ञ या डाइटीशियन से सलाह लें।
  • पर्याप्त आराम करें और डॉक्टर की अनुमति से हल्की गतिविधि जारी रखें।
  • परिवार और मित्रों से भावनात्मक सहयोग लें।
  • ज़रूरत महसूस हो तो काउंसलर या सपोर्ट ग्रुप से जुड़ें।
  • इलाज के दौरान होने वाली किसी भी परेशानी को डॉक्टर को तुरंत बताएँ।

जागरूकता क्यों ज़रूरी है

भारत में महिलाएँ अक्सर पेट दर्द या सूजन जैसी तकलीफ़ों को घर के कामकाज, उम्र या गैस की समस्या मानकर टालती रहती हैं। यही देरी रोग को गंभीर बना देती है। परिवार के सदस्यों को भी चाहिए कि वे महिलाओं के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें और उन्हें समय पर डॉक्टर के पास जाने के लिए प्रोत्साहित करें।

निष्कर्ष

ओवेरियन कैंसर एक गंभीर बीमारी है, लेकिन यदि इसे शुरुआती अवस्था में पहचान लिया जाए, तो सफल इलाज की संभावना काफ़ी बढ़ जाती है। आधुनिक सर्जरी, कीमोथेरेपी और टार्गेटेड थेरेपी ने मरीज़ों के जीवन की गुणवत्ता और अवधि दोनों में सुधार किया है। अपने शरीर में होने वाले असामान्य बदलावों को गंभीरता से लें, लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो डॉक्टर से मिलने में देरी न करें, और परिवार में कैंसर का इतिहास हो तो आनुवंशिक परामर्श अवश्य लें। जागरूकता, समय पर जाँच और सही इलाज ही इस बीमारी से लड़ने के सबसे मज़बूत हथियार हैं।

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