ग्लूकोमा (Glaucoma / काला मोतियाबिंद)
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ग्लूकोमा (काला मोतियाबिंद): आंखों की रोशनी का खामोश चोर

प्रस्तावना

हमारी आंखें दुनिया को देखने की खिड़की हैं, लेकिन कुछ बीमारियां इस खिड़की को धीरे-धीरे और बिना किसी आहट के बंद कर देती हैं। ग्लूकोमा ऐसी ही एक बीमारी है। इसे आम भाषा में “काला मोतियाबिंद” या “आंख का दबाव बढ़ना” कहा जाता है। इसे “रोशनी का खामोश चोर” भी कहते हैं, क्योंकि इसमें शुरुआत में न दर्द होता है, न आंख लाल होती है, और न ही दृष्टि में कोई बड़ा बदलाव महसूस होता है। जब तक मरीज को समस्या समझ आती है, तब तक आंख की नस को काफी नुकसान पहुंच चुका होता है।

दुनिया भर में 7 करोड़ से अधिक लोग ग्लूकोमा से प्रभावित माने जाते हैं। यह अपरिवर्तनीय (irreversible) अंधेपन का सबसे बड़ा कारण है। यानी इससे जो रोशनी एक बार चली जाती है, वह दोबारा वापस नहीं आती। इसलिए इसकी जानकारी, समय पर जांच और नियमित इलाज बेहद ज़रूरी है।

ग्लूकोमा क्या है?

आंख के पीछे एक नस होती है जिसे ऑप्टिक नर्व (दृष्टि तंत्रिका) कहते हैं। यह नस आंख की पुतली के पीछे बने पर्दे (रेटिना) से मिली तस्वीर को दिमाग तक पहुंचाती है। ग्लूकोमा ऐसी बीमारियों का समूह है जिनमें इसी ऑप्टिक नर्व को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचता है। इसके नतीजे में देखने का दायरा (visual field) सिकुड़ने लगता है और अंत में पूरी रोशनी जा सकती है।

अधिकतर मामलों में इस नुकसान की मुख्य वजह आंख के अंदर का बढ़ा हुआ दबाव है, जिसे इंट्राओकुलर प्रेशर (IOP) कहते हैं। हालांकि कुछ मरीजों में दबाव सामान्य रहते हुए भी नस को नुकसान होता है।

आंख में दबाव कैसे बनता है?

आंख के अंदर एक साफ तरल पदार्थ बनता रहता है, जिसे एक्वस ह्यूमर (जलीय द्रव) कहते हैं। यह आंख के अगले हिस्से को पोषण देता है और उसका आकार बनाए रखता है। यह तरल लगातार बनता है और आंख के एक विशेष जल-निकासी तंत्र से बाहर निकलता रहता है। जब तक बनने और निकलने का संतुलन ठीक रहता है, दबाव सामान्य रहता है। आमतौर पर आंख का सामान्य दबाव लगभग 10 से 21 mmHg माना जाता है।

अगर यह जल-निकासी का रास्ता तंग या बंद हो जाए, तो तरल आंख में जमा होने लगता है और दबाव बढ़ जाता है। यही बढ़ा हुआ दबाव धीरे-धीरे ऑप्टिक नर्व के रेशों को नुकसान पहुंचाता है।

ग्लूकोमा के प्रमुख प्रकार

1. ओपन-एंगल ग्लूकोमा (खुले कोण का ग्लूकोमा): यह सबसे आम प्रकार है। इसमें जल-निकासी का रास्ता खुला दिखता है, पर उसकी कार्यक्षमता धीरे-धीरे घटती जाती है। यह वर्षों तक बिना लक्षण के बढ़ता रहता है। पहले साइड (किनारे) की दृष्टि जाती है, इसलिए मरीज को देर तक पता नहीं चलता।

2. एंगल-क्लोज़र ग्लूकोमा (बंद कोण का ग्लूकोमा): इसमें आंख के अगले हिस्से का कोण संकरा या बंद हो जाता है और तरल का निकास अचानक रुक जाता है। यह धीरे-धीरे भी हो सकता है और अचानक तीव्र रूप में भी। तीव्र रूप एक आपात स्थिति है।

3. नॉर्मल-टेंशन ग्लूकोमा: इसमें आंख का दबाव सामान्य सीमा में रहता है, फिर भी ऑप्टिक नर्व क्षतिग्रस्त होती है।

4. द्वितीयक ग्लूकोमा (Secondary): यह किसी अन्य कारण से होता है, जैसे आंख की चोट, आंख में सूजन (यूवाइटिस), लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं का उपयोग, डायबिटीज़ से जुड़ी आंख की समस्या या मोतियाबिंद की जटिलता।

5. जन्मजात ग्लूकोमा (Congenital): यह कुछ शिशुओं में जन्म के समय या शुरुआती महीनों में दिखता है। बच्चे की आंख का बड़ा दिखना, लगातार पानी आना, रोशनी से घबराना और कॉर्निया का धुंधला दिखना इसके संकेत हो सकते हैं।

किन लोगों को ज़्यादा खतरा है?

कुछ स्थितियों में ग्लूकोमा का जोखिम बढ़ जाता है:

  • 40 वर्ष से अधिक उम्र, और उम्र बढ़ने के साथ खतरा और बढ़ता है
  • परिवार में किसी को ग्लूकोमा होना (माता-पिता या भाई-बहन में)
  • डायबिटीज़ और उच्च रक्तचाप
  • अधिक निकट-दृष्टि दोष (ज़्यादा माइनस नंबर का चश्मा)
  • बहुत दूर-दृष्टि दोष वाले लोगों में बंद कोण का खतरा
  • आंख में पहले कभी चोट लगना
  • लंबे समय तक स्टेरॉयड (आई ड्रॉप, गोलियां या इन्हेलर) का उपयोग
  • कॉर्निया का पतला होना

लक्षण: कब सावधान हो जाएं?

धीरे-धीरे बढ़ने वाला ग्लूकोमा: शुरुआत में अक्सर कोई लक्षण नहीं होता। आगे चलकर साइड की नज़र कम होना, चलते समय चीज़ों से टकराना, सीढ़ियां उतरने या गाड़ी चलाने में दिक्कत और बार-बार चश्मे का नंबर बदलना जैसे संकेत दिख सकते हैं। बीमारी बहुत बढ़ जाए तो सुरंग (टनल) जैसी दृष्टि रह जाती है।

तीव्र (Acute) बंद कोण ग्लूकोमा: यह अचानक होता है और इसमें ये लक्षण हो सकते हैं:

  • आंख में तेज़ दर्द और सिरदर्द
  • आंख का लाल होना
  • नज़र का अचानक धुंधला होना
  • बल्ब या दीये के चारों ओर इंद्रधनुषी घेरे दिखना
  • जी मिचलाना और उल्टी
  • आंख का कड़ा महसूस होना

अगर ऐसे लक्षण हों, तो इंतज़ार न करें और तुरंत नेत्र चिकित्सक के पास या अस्पताल की आपातकालीन सेवा में जाएं। कुछ घंटों की देरी भी स्थायी नुकसान कर सकती है।

जांच कैसे होती है?

चूंकि ग्लूकोमा चुपचाप बढ़ता है, इसलिए नियमित आंखों की जांच ही इसे पकड़ने का सबसे अच्छा तरीका है। नेत्र विशेषज्ञ आमतौर पर ये जांचें करते हैं:

  • टोनोमेट्री: आंख का दबाव मापना
  • ऑप्थैल्मोस्कोपी / फंडस जांच: ऑप्टिक नर्व की स्थिति देखना
  • पेरीमेट्री (विज़ुअल फील्ड टेस्ट): दृष्टि के दायरे की जांच
  • गोनियोस्कोपी: जल-निकासी कोण को देखना
  • OCT स्कैन: ऑप्टिक नर्व और रेटिना की परत की मोटाई मापना
  • पैकीमेट्री: कॉर्निया की मोटाई मापना

ध्यान रहे कि सिर्फ दबाव नापने से बात पूरी नहीं होती। कभी-कभी दबाव सामान्य होने पर भी ग्लूकोमा हो सकता है, इसलिए नस और दृष्टि क्षेत्र की जांच भी उतनी ही ज़रूरी है।

इलाज के विकल्प

ग्लूकोमा का पूरा इलाज यानी खोई हुई रोशनी वापस लाना फिलहाल संभव नहीं है। लेकिन समय पर इलाज से बीमारी को आगे बढ़ने से रोका जा सकता है और बची हुई नज़र को सुरक्षित रखा जा सकता है। इलाज का लक्ष्य आंख का दबाव उस स्तर तक लाना है जिससे नस को और नुकसान न हो।

1. आई ड्रॉप्स: अधिकतर मरीजों में इलाज की शुरुआत दवाओं से होती है। ये ड्रॉप्स या तो तरल बनना कम करती हैं या उसके निकास को बढ़ाती हैं। इन्हें डॉक्टर के बताए समय पर रोज़ डालना ज़रूरी है। लक्षण न होने के कारण कई लोग दवा छोड़ देते हैं, जो सबसे बड़ी भूल है।

2. लेज़र उपचार: कुछ मरीजों में लेज़र से जल-निकासी तंत्र को सुधारा जाता है (जैसे ओपन-एंगल में SLT)। बंद कोण में लेज़र इरिडोटॉमी से तरल के निकलने का नया रास्ता बनाया जाता है। यह प्रक्रिया आमतौर पर बिना भर्ती हुए हो जाती है।

3. सर्जरी: जब दवा और लेज़र से दबाव काबू में न आए, तो सर्जरी की जाती है, जैसे ट्रेबेक्युलेक्टॉमी, ड्रेनेज इम्प्लांट या आधुनिक कम-चीर वाली (MIGS) तकनीकें। किसके लिए कौन-सी प्रक्रिया उचित है, यह डॉक्टर तय करते हैं।

इलाज शुरू होने के बाद भी नियमित फॉलो-अप ज़रूरी है, क्योंकि समय-समय पर दबाव और दृष्टि क्षेत्र की जांच से तय होता है कि बीमारी स्थिर है या नहीं।

बचाव और जीवनशैली संबंधी सुझाव

ग्लूकोमा को पूरी तरह रोकने का कोई पक्का उपाय नहीं है, पर जोखिम घटाने और नुकसान से बचने में ये बातें मदद करती हैं:

  • नियमित जांच कराएं: 40 वर्ष के बाद हर एक से दो साल में पूरी आंखों की जांच कराएं। जिनके परिवार में ग्लूकोमा रहा हो, वे और जल्दी जांच शुरू करें।
  • दवा नियमित लें: डॉक्टर की सलाह के बिना ड्रॉप्स बंद न करें।
  • स्टेरॉयड सावधानी से: आंखों में डालने वाली या अन्य स्टेरॉयड दवाएं खुद से न लें।
  • डायबिटीज़ और रक्तचाप नियंत्रित रखें।
  • आंखों को चोट से बचाएं: खेलते या औज़ारों के साथ काम करते समय सुरक्षात्मक चश्मा पहनें।
  • नियमित व्यायाम करें: हल्का-फुल्का व्यायाम जैसे तेज़ चलना सहायक माना जाता है। हालांकि लंबे समय तक सिर नीचे करके किए जाने वाले आसनों के बारे में डॉक्टर से पूछ लें।
  • संतुलित आहार लें: हरी पत्तेदार सब्ज़ियां, फल और पर्याप्त पानी शरीर के लिए अच्छे हैं, पर कोई आहार ग्लूकोमा का इलाज नहीं है।
  • धूम्रपान से बचें।

आम भ्रांतियां

भ्रांति 1: ग्लूकोमा सिर्फ बुज़ुर्गों को होता है।
सच: यह किसी भी उम्र में हो सकता है, यहां तक कि नवजात शिशुओं में भी, हालांकि उम्र के साथ खतरा बढ़ता है।

भ्रांति 2: दर्द नहीं है तो आंख ठीक है।
सच: सबसे आम प्रकार में दर्द होता ही नहीं।

भ्रांति 3: चश्मा लगाने से ग्लूकोमा ठीक हो जाता है।
सच: चश्मा नंबर सुधारता है, ग्लूकोमा का इलाज नहीं करता।

भ्रांति 4: ऑपरेशन के बाद खोई रोशनी लौट आती है।
सच: इलाज का मकसद बची हुई नज़र को बचाना है, खोई नज़र वापस नहीं आती।

भ्रांति 5: काला मोतियाबिंद और सफेद मोतियाबिंद एक ही हैं।
सच: मोतियाबिंद (Cataract) में आंख का लेंस धुंधला हो जाता है और ऑपरेशन से नज़र लौट सकती है। ग्लूकोमा में ऑप्टिक नर्व को नुकसान होता है। नाम में समानता के बावजूद दोनों अलग बीमारियां हैं।

निष्कर्ष

ग्लूकोमा एक गंभीर लेकिन नियंत्रित की जा सकने वाली बीमारी है। इसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह बिना लक्षण के चुपचाप बढ़ती है और खोई हुई रोशनी लौटाई नहीं जा सकती। इसलिए जागरूकता, समय पर जांच और नियमित इलाज ही सबसे मज़बूत बचाव हैं। अगर आपकी उम्र 40 से ऊपर है, परिवार में किसी को ग्लूकोमा रहा है, या आप डायबिटीज़ जैसी जोखिम वाली स्थिति में हैं, तो आज ही अपनी आंखों की पूरी जांच कराने की योजना बनाएं।

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