मोतियाबिंद (Cataract)
| |

मोतियाबिंद (Cataract): आंख के लेंस का धुंधला होना, कारण, लक्षण और इलाज

प्रस्तावना

हमारी आंख एक कैमरे की तरह काम करती है। बाहर की रोशनी पहले पारदर्शी परत कॉर्निया से गुजरती है, फिर लेंस से होकर आंख के पीछे की परदे जैसी परत रेटिना पर फोकस होती है। रेटिना इस छवि को संकेतों में बदलकर मस्तिष्क तक पहुंचाती है, तब हमें दृश्य दिखाई देता है। यदि इस रास्ते में कहीं रुकावट आ जाए, तो दृष्टि प्रभावित होती है।

मोतियाबिंद (Cataract) ऐसी ही एक स्थिति है, जिसमें आंख का प्राकृतिक लेंस धीरे-धीरे धुंधला हो जाता है। भारत सहित दुनिया के अधिकांश विकासशील देशों में यह रोशनी जाने (अंधत्व) का सबसे प्रमुख कारण है। राहत की बात यह है कि यह पूरी तरह इलाज योग्य है। समय पर पहचान और सही उपचार से व्यक्ति फिर से साफ देख सकता है।

मोतियाबिंद क्या है?

हमारी आंख का लेंस मुख्यतः पानी और प्रोटीन से बना होता है। प्रोटीन के रेशे इस तरह व्यवस्थित रहते हैं कि लेंस पारदर्शी बना रहता है और रोशनी आसानी से गुजर जाती है। उम्र बढ़ने या अन्य कारणों से जब ये प्रोटीन आपस में चिपककर गुच्छे बनाने लगते हैं, तो लेंस का वह हिस्सा धुंधला हो जाता है। इसी धुंधलेपन को मोतियाबिंद कहते हैं।

इसे ऐसे समझिए कि जैसे साफ खिड़की के शीशे पर धीरे-धीरे धुंध या भाप जम जाए, तो बाहर का दृश्य धुंधला दिखता है। यह स्थिति आमतौर पर एक या दोनों आंखों में धीरे-धीरे बढ़ती है। एक बात ध्यान रखने की है कि मोतियाबिंद आंख की सतह पर कोई “झिल्ली” या “परत” नहीं है, जैसा कि लोग अक्सर समझते हैं। यह आंख के भीतर लेंस की समस्या है।

मोतियाबिंद के प्रकार

1. उम्र से जुड़ा मोतियाबिंद: यह सबसे आम प्रकार है। आमतौर पर 50-60 वर्ष की उम्र के बाद शुरू होता है और धीरे-धीरे बढ़ता है।

2. जन्मजात मोतियाबिंद: कुछ बच्चे जन्म के समय या जन्म के कुछ समय बाद ही इससे प्रभावित होते हैं। इसका कारण गर्भावस्था के दौरान संक्रमण, आनुवंशिकता या चयापचय संबंधी गड़बड़ी हो सकता है। बच्चों में इसका शीघ्र इलाज बहुत जरूरी है, वरना दृष्टि का सामान्य विकास रुक सकता है।

3. द्वितीयक मोतियाबिंद: यह किसी अन्य रोग या कारण से होता है, जैसे मधुमेह, आंख की पुरानी सूजन (यूवाइटिस), या लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं का सेवन।

4. चोट के कारण मोतियाबिंद: आंख पर गंभीर चोट लगने के कुछ समय बाद भी लेंस धुंधला हो सकता है।

लेंस में धुंधलेपन की जगह के आधार पर इसके तीन रूप भी बताए जाते हैं। न्यूक्लियर (लेंस के केंद्र में), कॉर्टिकल (किनारों से शुरू होकर केंद्र की ओर) और पोस्टीरियर सबकैप्सुलर (लेंस के पिछले हिस्से में)। तीसरा प्रकार अपेक्षाकृत जल्दी बढ़ता है और पढ़ने तथा तेज रोशनी में देखने में अधिक परेशानी करता है।

मोतियाबिंद के कारण और जोखिम कारक

  • बढ़ती उम्र: सबसे प्रमुख कारण। उम्र के साथ लेंस के प्रोटीन में बदलाव आना स्वाभाविक है।
  • मधुमेह: रक्त में शर्करा का स्तर अनियंत्रित रहने पर मोतियाबिंद कम उम्र में और जल्दी विकसित हो सकता है।
  • धूम्रपान और शराब: तंबाकू का सेवन और अत्यधिक शराब इसका खतरा बढ़ाते हैं।
  • पराबैंगनी किरणें: सूर्य की तेज धूप में लंबे समय तक बिना सुरक्षा के रहना, विशेषकर बाहर काम करने वालों के लिए जोखिम बढ़ाता है।
  • स्टेरॉयड दवाएं: लंबे समय तक स्टेरॉयड (गोली, आई ड्रॉप या इंजेक्शन) का उपयोग लेंस को नुकसान पहुंचा सकता है। इन्हें केवल डॉक्टर की सलाह से ही लें।
  • आंख की चोट या सर्जरी: पहले हुई चोट या आंख के अन्य ऑपरेशन।
  • पारिवारिक इतिहास: परिवार में मोतियाबिंद होने पर जोखिम कुछ अधिक रहता है।
  • उच्च रक्तचाप और मोटापा: इन्हें भी जोखिम कारक माना जाता है।
  • विकिरण: कुछ प्रकार के विकिरण के संपर्क में आना।

लक्षण: कैसे पहचानें?

मोतियाबिंद आमतौर पर दर्दरहित होता है और बहुत धीरे-धीरे बढ़ता है, इसलिए शुरुआत में व्यक्ति को पता ही नहीं चलता। आम लक्षण ये हैं:

  • धुंधला, धूमिल या धुएं जैसा दिखाई देना
  • रंग फीके या पीले-से नजर आना
  • रात में देखने में कठिनाई, खासकर सामने से आती गाड़ियों की रोशनी में चकाचौंध
  • बल्ब या लैंप के चारों ओर गोल घेरा (हेलो) दिखना
  • तेज धूप या रोशनी में आंखें चुंधियाना
  • पढ़ने, टीवी देखने या वाहन चलाने में कठिनाई
  • चश्मे का नंबर बार-बार बदलना
  • एक ही वस्तु दो-दो दिखाई देना (एक आंख से देखने पर)
  • कुछ लोगों में शुरुआत में पास की नजर अस्थायी रूप से बेहतर हो जाना, जिसे “सेकंड साइट” कहते हैं। यह भी लेंस में बदलाव का संकेत है, इसे अच्छा संकेत न समझें।

ध्यान दें: आंख में तेज दर्द, अचानक दृष्टि चली जाना, आंख का लाल होना या उल्टी जैसे लक्षण मोतियाबिंद के सामान्य लक्षण नहीं हैं। ये अन्य गंभीर स्थितियों के संकेत हो सकते हैं और इनमें तुरंत नेत्र विशेषज्ञ से मिलना चाहिए।

जांच कैसे होती है?

नेत्र रोग विशेषज्ञ (ऑप्थल्मोलॉजिस्ट) विस्तृत जांच के बाद मोतियाबिंद की पुष्टि करते हैं। इसमें आमतौर पर ये जांचें शामिल होती हैं:

  1. दृष्टि की जांच: चार्ट से यह देखना कि आप कितनी दूरी तक साफ पढ़ पाते हैं।
  2. स्लिट लैंप जांच: विशेष सूक्ष्मदर्शी से लेंस और आंख के अगले हिस्से की बारीकी से जांच।
  3. पुतली फैलाकर जांच: ड्रॉप डालकर पुतली को फैलाया जाता है, ताकि लेंस और रेटिना को ठीक से देखा जा सके।
  4. आंख का दबाव: ग्लूकोमा की संभावना को परखने के लिए।
  5. अन्य जांचें: जरूरत पड़ने पर रेटिना की जांच और लेंस की शक्ति (IOL पावर) मापने के लिए बायोमेट्री।

उपचार

शुरुआती अवस्था में

जब धुंधलापन हल्का हो और दैनिक कामों में बाधा न डाले, तो डॉक्टर चश्मे का नंबर बदलने, तेज रोशनी में पढ़ने, चकाचौंध कम करने वाले चश्मे और नियमित जांच की सलाह दे सकते हैं। ध्यान रहे कि कोई आई ड्रॉप, दवा या घरेलू नुस्खा मोतियाबिंद को ठीक या समाप्त नहीं कर सकता। अपने आप ठीक होने की उम्मीद में इलाज टालना ठीक नहीं है।

सर्जरी: एकमात्र प्रभावी इलाज

जब मोतियाबिंद के कारण रोजमर्रा के काम, पढ़ाई, नौकरी या वाहन चलाने में दिक्कत होने लगे, तो ऑपरेशन ही स्थायी समाधान है। पुरानी मान्यता थी कि मोतियाबिंद “पकने” का इंतजार करना चाहिए। आज की तकनीक में यह जरूरी नहीं है। सर्जरी का सही समय तब है जब दृष्टि की कमी आपके जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करने लगे।

सर्जरी की प्रक्रिया: इसमें धुंधले प्राकृतिक लेंस को निकालकर उसकी जगह एक पारदर्शी कृत्रिम लेंस (इंट्राओकुलर लेंस, IOL) लगाया जाता है। यह आमतौर पर 15 से 30 मिनट में पूरी हो जाती है और अधिकांश मामलों में मरीज उसी दिन घर लौट सकता है। सर्जरी स्थानीय संवेदनहरण (आंख को सुन्न करके) में होती है।

मुख्य विधियां:

  • फेकोइमल्सिफिकेशन: इसमें बहुत छोटे चीरे से अल्ट्रासाउंड तरंगों द्वारा लेंस को तोड़कर निकाला जाता है। चीरा छोटा होने से रिकवरी जल्दी होती है।
  • स्मॉल इंसिजन कैटरेक्ट सर्जरी (SICS): इसमें थोड़ा बड़ा चीरा लगता है। यह विशेषकर कड़े मोतियाबिंद में उपयोगी है और भारत में खूब प्रचलित है।

लेंस के विकल्प: कृत्रिम लेंस कई प्रकार के होते हैं, जैसे मोनोफोकल (एक दूरी के लिए), मल्टीफोकल और टोरिक (दृष्टिदोष ठीक करने वाले)। कौन सा लेंस आपके लिए ठीक रहेगा, यह आपकी आंख, जीवनशैली और बजट को देखकर डॉक्टर के साथ तय करना चाहिए।

सर्जरी के बाद देखभाल

सर्जरी के बाद सही देखभाल से परिणाम बेहतर रहते हैं और संक्रमण का खतरा घटता है:

  • डॉक्टर द्वारा दी गई आई ड्रॉप समय पर और बताई अवधि तक डालें।
  • ड्रॉप डालने से पहले हाथ अच्छी तरह धोएं।
  • आंख को मलें या दबाएं नहीं। रात में सोते समय सुरक्षात्मक कवच (शील्ड) लगाएं, यदि बताया गया हो।
  • शुरुआती कुछ दिन आंख में पानी, साबुन, धूल और धुएं से बचाएं।
  • भारी सामान उठाने और झुककर काम करने से कुछ समय परहेज करें।
  • बाहर निकलते समय धूप का चश्मा पहनें।
  • तय तारीखों पर फॉलो-अप जांच के लिए जरूर जाएं।
  • दर्द बढ़ने, लालिमा, दृष्टि अचानक घटने या पीप जैसा स्राव दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।

अधिकांश लोगों को कुछ दिनों में स्पष्ट दिखने लगता है और पूरी तरह स्थिर दृष्टि के लिए कुछ सप्ताह लग सकते हैं। पढ़ने या दूर के लिए चश्मे की जरूरत पड़ सकती है।

संभावित जटिलताएं

मोतियाबिंद की सर्जरी सबसे सुरक्षित और सफल सर्जरी में गिनी जाती है, फिर भी हर ऑपरेशन में कुछ जोखिम होते हैं। इनमें संक्रमण, सूजन, रेटिना का खिसकना, आंख का दबाव बढ़ना, या लेंस का स्थान बदलना शामिल हैं, जो बहुत कम मामलों में होते हैं। कुछ महीनों या वर्षों बाद लेंस के पीछे की पतली झिल्ली धुंधली पड़ सकती है, जिसे “पोस्टीरियर कैप्सूल ओपेसिफिकेशन” या आम भाषा में “सेकंडरी कैटरेक्ट” कहते हैं। इसे लेजर की एक छोटी, दर्दरहित प्रक्रिया से आसानी से साफ कर दिया जाता है।

रोकथाम: क्या कर सकते हैं?

उम्र से जुड़े बदलाव को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन जोखिम घटाने और प्रगति धीमी करने के उपाय जरूर हैं:

  1. नियमित नेत्र जांच: 40 वर्ष के बाद हर एक-दो वर्ष में आंखों की जांच कराएं। मधुमेह के रोगी साल में कम से कम एक बार अवश्य कराएं।
  2. मधुमेह और रक्तचाप नियंत्रित रखें।
  3. धूम्रपान और तंबाकू छोड़ें, शराब सीमित करें।
  4. धूप से बचाव: बाहर निकलते समय यूवी-सुरक्षा वाला चश्मा और टोपी पहनें।
  5. संतुलित आहार: हरी पत्तेदार सब्जियां, फल और विटामिन-समृद्ध भोजन लें। इनसे आंखों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है, हालांकि केवल आहार से मोतियाबिंद रोकने की गारंटी नहीं है।
  6. चोट से सुरक्षा: खेलकूद और काम के दौरान जरूरत हो तो सुरक्षात्मक चश्मा पहनें।
  7. स्टेरॉयड का सोच-समझकर उपयोग: बिना डॉक्टरी सलाह के स्टेरॉयड वाली दवाएं या ड्रॉप न लें।

आम भ्रांतियां

  • “मोतियाबिंद पकने पर ही ऑपरेशन होता है।” यह आज के समय में सही नहीं है। जब दिक्कत होने लगे, तब सर्जरी हो सकती है।
  • “लेजर से मोतियाबिंद निकल जाता है।” मोतियाबिंद का मुख्य इलाज सर्जरी है। लेजर का उपयोग कुछ चरणों में या बाद की झिल्ली साफ करने में होता है।
  • “आंख बाहर निकालकर ऑपरेशन होता है।” यह पूरी तरह गलत है। ऑपरेशन आंख के भीतर बारीक चीरे से होता है।
  • “आई ड्रॉप या देसी नुस्खों से मोतियाबिंद ठीक हो जाता है।” अभी तक ऐसा कोई प्रमाणित उपचार नहीं है। झोलाछाप इलाज में समय गंवाने से स्थिति बिगड़ सकती है।
  • “ऑपरेशन के बाद फिर से मोतियाबिंद हो जाएगा।” निकाला गया लेंस दोबारा नहीं बनता। पीछे की झिल्ली धुंधली हो सकती है, पर उसका इलाज आसान है।

निष्कर्ष

मोतियाबिंद उम्र के साथ आने वाली एक आम समस्या है, लेकिन यह अंधेरे की सजा नहीं है। इसका प्रभावी और सुरक्षित इलाज उपलब्ध है। जरूरत है जागरूकता की, नियमित जांच की और समय पर निर्णय लेने की। घर के बुजुर्गों की नजर कमजोर होने को “उम्र का असर” मानकर नजरअंदाज न करें। धुंधला दिखना, रात में दिक्कत या बार-बार चश्मे का नंबर बदलना जैसे संकेतों पर नेत्र विशेषज्ञ से परामर्श लें। साफ दृष्टि सिर्फ देखने का नहीं, आत्मनिर्भरता, सुरक्षा और सम्मानपूर्ण जीवन का भी आधार है।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *