पीरियोडोंटाइटिस: मसूड़ों और दांत की हड्डी का गंभीर संक्रमण
परिचय
मुस्कुराहट की सुंदरता केवल सफेद दांतों से नहीं, बल्कि स्वस्थ मसूड़ों से भी तय होती है। बहुत से लोग मसूड़ों से खून आने, सांस में बदबू या दांतों में हल्की ढीलेपन जैसी समस्याओं को मामूली समझकर टालते रहते हैं। यही लापरवाही आगे चलकर पीरियोडोंटाइटिस जैसी गंभीर बीमारी का रूप ले लेती है।
पीरियोडोंटाइटिस मसूड़ों का ऐसा संक्रमण है जो दांतों को थामने वाले ऊतकों और जबड़े की हड्डी को नुकसान पहुँचाता है। इलाज न मिलने पर दांत ढीले होकर गिर सकते हैं। यह वयस्कों में दांत खोने के सबसे प्रमुख कारणों में से एक है। अच्छी बात यह है कि समय पर पहचान और सही देखभाल से इसे काफी हद तक रोका और नियंत्रित किया जा सकता है।
पीरियोडोंटाइटिस क्या है?
हमारे दांत मसूड़ों, पीरियोडोंटल लिगामेंट और जबड़े की हड्डी के सहारे मजबूती से टिके रहते हैं। जब दांतों पर जमा बैक्टीरिया की परत (प्लाक) लंबे समय तक साफ नहीं होती, तो मसूड़ों में सूजन शुरू हो जाती है। इस शुरुआती अवस्था को जिंजिवाइटिस कहते हैं।
यदि जिंजिवाइटिस का इलाज न हो, तो संक्रमण मसूड़ों के नीचे फैलने लगता है। मसूड़े दांतों से अलग होकर गहरी जेबें (पॉकेट) बना लेते हैं, जिनमें और अधिक बैक्टीरिया जमा होते हैं। शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली इन बैक्टीरिया से लड़ने की कोशिश करती है, और इसी प्रक्रिया में उत्पन्न विषैले पदार्थ तथा सूजन हड्डी और सहारा देने वाले ऊतकों को धीरे-धीरे नष्ट करने लगते हैं। यही स्थिति पीरियोडोंटाइटिस कहलाती है।
पीरियोडोंटाइटिस के कारण
इस रोग का मुख्य कारण दांतों की खराब सफाई है, लेकिन कई अन्य कारक भी भूमिका निभाते हैं:
- प्लाक और टार्टर का जमाव: प्लाक बैक्टीरिया की चिपचिपी परत है। समय पर साफ न होने पर यह कठोर होकर टार्टर (कैलकुलस) बन जाती है, जिसे घर पर ब्रश करके नहीं हटाया जा सकता।
- तंबाकू का सेवन: सिगरेट, बीड़ी, गुटखा और खैनी मसूड़ों में रक्त प्रवाह घटाते हैं और संक्रमण से लड़ने की क्षमता कमजोर करते हैं।
- मधुमेह: अनियंत्रित शुगर वाले लोगों में संक्रमण का खतरा अधिक होता है और घाव देर से भरते हैं।
- हार्मोनल बदलाव: गर्भावस्था, रजोनिवृत्ति और किशोरावस्था में मसूड़े अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
- आनुवंशिकता: परिवार में मसूड़ों की बीमारी का इतिहास होने पर जोखिम बढ़ जाता है।
- कमजोर प्रतिरक्षा: एचआईवी, कैंसर के इलाज या कुछ दवाओं के कारण शरीर की रक्षा क्षमता घटने पर भी खतरा बढ़ता है।
- पोषण की कमी: विटामिन C और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की कमी मसूड़ों को कमजोर बनाती है।
- कुछ दवाएँ: जिन दवाओं से मुँह सूखता है, उनसे लार कम बनती है और बैक्टीरिया पनपने लगते हैं।
- टेढ़े-मेढ़े दांत और खराब फिलिंग: इनके आसपास सफाई कठिन होती है।
रोग के चरण
पीरियोडोंटाइटिस अचानक नहीं होता, यह चरणों में बढ़ता है:
- जिंजिवाइटिस: केवल मसूड़ों में सूजन और खून आना। यह पूरी तरह ठीक हो सकता है।
- प्रारंभिक पीरियोडोंटाइटिस: हड्डी में हल्की क्षति शुरू हो जाती है और मसूड़ों में पॉकेट बनने लगते हैं।
- मध्यम पीरियोडोंटाइटिस: हड्डी का नुकसान बढ़ता है, मसूड़े पीछे हटते हैं और दांत हिलने लगते हैं।
- गंभीर पीरियोडोंटाइटिस: हड्डी का बड़ा हिस्सा नष्ट हो जाता है, दांत बहुत ढीले हो जाते हैं और गिरने की नौबत आ जाती है।
लक्षण: इन्हें न करें नज़रअंदाज़
- ब्रश करते या खाते समय मसूड़ों से बार-बार खून आना
- मसूड़ों का लाल, सूजा हुआ या छूने पर नरम और दर्दनाक होना
- लगातार मुँह से दुर्गंध आना या मुँह में बुरा स्वाद रहना
- मसूड़ों का पीछे हटना, जिससे दांत लंबे दिखने लगें
- दांतों के बीच नई जगह (गैप) बनना
- दांतों का हिलना या काटने पर बैठाव बदलना
- मसूड़ों से मवाद निकलना
- ठंडा-गर्म लगना, यानी दांतों में संवेदनशीलता
- चबाते समय दर्द महसूस होना
ध्यान रहे कि शुरुआती अवस्था में पीरियोडोंटाइटिस अक्सर दर्द रहित होता है। इसी कारण मरीज देर से डॉक्टर के पास पहुँचते हैं।
पूरे शरीर पर असर
मसूड़ों की यह बीमारी केवल मुँह तक सीमित नहीं रहती। शोध बताते हैं कि मसूड़ों में लगातार बनी सूजन और बैक्टीरिया का संबंध कई स्वास्थ्य समस्याओं से हो सकता है:
- हृदय रोग: मुँह के बैक्टीरिया और सूजन से जुड़े तत्व रक्त के माध्यम से धमनियों को प्रभावित कर सकते हैं।
- मधुमेह: मसूड़ों का संक्रमण शुगर नियंत्रण को कठिन बनाता है, और अनियंत्रित शुगर मसूड़ों की बीमारी को बढ़ाती है। दोनों एक-दूसरे को बिगाड़ते हैं।
- श्वसन संबंधी संक्रमण: बैक्टीरिया साँस के साथ फेफड़ों तक पहुँचकर संक्रमण बढ़ा सकते हैं।
- गर्भावस्था में जटिलताएँ: कुछ अध्ययनों में समय से पहले प्रसव और कम वजन के शिशु से इसका संबंध देखा गया है।
इसलिए मसूड़ों का स्वास्थ्य पूरे शरीर के स्वास्थ्य से जुड़ा है।
निदान कैसे होता है?
दंत चिकित्सक या पीरियोडोंटिस्ट (मसूड़ों के विशेषज्ञ) जाँच के दौरान ये कदम उठाते हैं:
- मसूड़ों की जाँच: सूजन, रंग और खून आने की स्थिति देखी जाती है।
- पॉकेट की गहराई मापना: एक छोटी जाँच-छड़ी (प्रोब) से दांत और मसूड़े के बीच की जेब की गहराई मापी जाती है। स्वस्थ मसूड़ों में यह गहराई आमतौर पर कम होती है, जबकि पीरियोडोंटाइटिस में बढ़ जाती है।
- एक्स-रे: इससे जबड़े की हड्डी के नुकसान का पता चलता है।
- दांतों की गतिशीलता और बैठाव की जाँच
- चिकित्सा इतिहास: मधुमेह, दवाओं और आदतों की जानकारी ली जाती है।
उपचार
उपचार का लक्ष्य संक्रमण को रोकना, बची हुई हड्डी को बचाना और मसूड़ों को फिर स्वस्थ बनाना है।
1. गैर-शल्य उपचार
- स्केलिंग: दांतों और मसूड़ों के ऊपर-नीचे जमा प्लाक व टार्टर को विशेष उपकरणों या अल्ट्रासोनिक मशीन से साफ किया जाता है।
- रूट प्लानिंग: दांत की जड़ की सतह को चिकना किया जाता है ताकि मसूड़े उससे दोबारा चिपक सकें।
- दवाएँ: आवश्यकता पड़ने पर एंटीबायोटिक जेल, माउथवॉश या गोलियाँ दी जाती हैं।
2. शल्य उपचार (गंभीर मामलों में)
- फ्लैप सर्जरी: मसूड़े को हटाकर गहराई तक सफाई की जाती है और फिर उसे वापस सिल दिया जाता है।
- बोन ग्राफ्टिंग: नष्ट हुई हड्डी की भरपाई के लिए हड्डी का कृत्रिम या प्राकृतिक पदार्थ लगाया जाता है।
- गम ग्राफ्टिंग: पीछे हटे मसूड़ों को ढकने के लिए ऊतक लगाया जाता है।
- गाइडेड टिश्यू रीजनरेशन: हड्डी और ऊतकों के पुनः विकास को प्रोत्साहित किया जाता है।
3. रखरखाव चरण
उपचार के बाद भी हर तीन से छह महीने में नियमित जाँच और सफाई जरूरी है, क्योंकि यह रोग दोबारा लौट सकता है। गंभीर अवस्था में जो दांत नहीं बचाए जा सकते, उन्हें निकालकर इम्प्लांट या ब्रिज से बदला जाता है।
रोकथाम: बचाव ही सबसे अच्छा इलाज
मसूड़ों को स्वस्थ रखना कठिन नहीं है, बस कुछ आदतें अपनानी होंगी:
- दिन में दो बार, दो मिनट तक ब्रश करें: नरम बालों वाले ब्रश और फ्लोराइड युक्त टूथपेस्ट का प्रयोग करें। ब्रश को मसूड़ों की रेखा पर हल्के कोण से चलाएँ।
- रोज़ फ्लॉस करें: दांतों के बीच की गंदगी ब्रश से नहीं निकलती। फ्लॉस या इंटरडेंटल ब्रश का उपयोग करें।
- जीभ साफ करें: इससे बैक्टीरिया और दुर्गंध कम होती है।
- हर छह महीने में दंत चिकित्सक से जाँच कराएँ: पेशेवर सफाई से वह टार्टर निकलता है जो घर पर नहीं हटता।
- तंबाकू छोड़ें: यह मसूड़ों की बीमारी का सबसे बड़ा रोके जा सकने वाला कारण है।
- संतुलित आहार लें: हरी सब्जियाँ, फल (विशेषकर विटामिन C वाले), दूध-दही और सूखे मेवे खाएँ। मीठे और चिपचिपे पदार्थ सीमित रखें।
- पर्याप्त पानी पिएँ: इससे लार बनती रहती है, जो मुँह की प्राकृतिक सफाई करती है।
- मधुमेह को नियंत्रण में रखें: नियमित जाँच और दवा का पालन करें।
- तनाव कम करें: लंबे समय का तनाव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता घटाता है।
कब तुरंत डॉक्टर से मिलें?
यदि मसूड़ों से खून एक सप्ताह से अधिक समय तक आता रहे, दांत हिलने लगें, मसूड़ों में मवाद या सूजन दिखे, अथवा सांस की बदबू ब्रश करने के बाद भी न जाए, तो देर न करें। जितनी जल्दी इलाज शुरू होगा, उतने अधिक दांत और हड्डी बचाई जा सकेगी। मधुमेह, गर्भावस्था या धूम्रपान की आदत वाले लोगों को विशेष सतर्क रहना चाहिए।
भ्रांतियाँ और सच्चाई
- भ्रांति: मसूड़ों से खून आना सामान्य है। सच्चाई: स्वस्थ मसूड़ों से खून नहीं आता; यह सूजन का संकेत है।
- भ्रांति: जोर से ब्रश करने से दांत ज्यादा साफ होते हैं। सच्चाई: जोर से रगड़ने से मसूड़े घिसते हैं और नुकसान बढ़ता है।
- भ्रांति: दर्द नहीं है तो कोई समस्या नहीं। सच्चाई: पीरियोडोंटाइटिस शुरुआत में अक्सर बिना दर्द के बढ़ता है।
- भ्रांति: उम्र बढ़ने पर दांत गिरना स्वाभाविक है। सच्चाई: सही देखभाल से अधिकांश लोग जीवन भर अपने दांत सुरक्षित रख सकते हैं।
निष्कर्ष
पीरियोडोंटाइटिस एक चुपचाप बढ़ने वाली, लेकिन गंभीर बीमारी है जो दांतों के साथ-साथ पूरे शरीर के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। इसका मूल कारण अक्सर मुँह की अपर्याप्त सफाई होता है, और यही इसकी रोकथाम की कुंजी भी है। नियमित ब्रश, फ्लॉस, संतुलित आहार, तंबाकू से दूरी और समय-समय पर दंत जाँच जैसे सरल उपाय आपको इस रोग से सुरक्षित रख सकते हैं।
