कोलेंजाइटिस (Cholangitis - पित्त नली का संक्रमण)
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कोलेंजाइटिस (पित्त नली का संक्रमण): कारण, लक्षण, निदान और उपचार

कोलेंजाइटिस क्या है?

कोलेंजाइटिस पित्त नलियों की सूजन या संक्रमण है, और जब इसके साथ रुकावट हो तो यह एक गंभीर आपात स्थिति बन सकती है। हमारे लिवर में रोज़ पित्त (bile) बनता है। यह पतली नलियों के जाल से होकर पित्ताशय और फिर छोटी आँत में पहुँचता है, जहाँ वह वसा के पाचन में मदद करता है।

जब किसी कारण से यह प्रवाह धीमा पड़ता है या रुक जाता है, तो नली में ठहरे पित्त में बैक्टीरिया पनपने लगते हैं। आँत से बैक्टीरिया ऊपर की ओर चढ़कर नली तक पहुँचते हैं, इसीलिए इसे “एसेंडिंग कोलेंजाइटिस” भी कहा जाता है। नली में दबाव बढ़ने पर संक्रमित पित्त रक्त में पहुँच सकता है और सेप्सिस जैसी जानलेवा स्थिति पैदा कर सकता है।

यह शब्द केवल बैक्टीरियल संक्रमण तक सीमित नहीं है। कुछ प्रकार की कोलेंजाइटिस पित्त नलियों की दीर्घकालिक, ऑटोइम्यून या सूजन संबंधी बीमारियाँ हैं, जो वर्षों में धीरे-धीरे लिवर को नुकसान पहुँचाती हैं। इसलिए सही प्रकार की पहचान ही इलाज की दिशा तय करती है।

कोलेंजाइटिस के प्रमुख प्रकार

कोलेंजाइटिस के कई रूप हैं, और उनके कारण व इलाज अलग-अलग होते हैं।

  • तीव्र बैक्टीरियल (एसेंडिंग) कोलेंजाइटिस: अचानक शुरू होने वाला संक्रमण, जो आमतौर पर पित्त नली में रुकावट के कारण होता है। यह सबसे आम और सबसे आपातकालीन रूप है।
  • प्राइमरी स्क्लेरोज़िंग कोलेंजाइटिस (PSC): एक दीर्घकालिक बीमारी, जिसमें पित्त नलियों में सूजन और घाव (स्कार) बनते हैं और नलियाँ धीरे-धीरे संकरी होती जाती हैं। यह अक्सर सूजन आंत्र रोग, खासकर अल्सरेटिव कोलाइटिस, से जुड़ी पाई जाती है।
  • प्राइमरी बिलियरी कोलेंजाइटिस (PBC): एक ऑटोइम्यून रोग, जिसमें शरीर की रक्षा प्रणाली लिवर के भीतर की छोटी पित्त नलियों पर हमला करती है। यह मुख्यतः मध्यम आयु की महिलाओं में देखा जाता है।
  • अन्य रूप: IgG4-संबंधित स्क्लेरोज़िंग कोलेंजाइटिस, गंभीर रूप से बीमार मरीज़ों में होने वाली सेकेंडरी स्क्लेरोज़िंग कोलेंजाइटिस, और बार-बार पथरी व संक्रमण पैदा करने वाली रिकरेंट पायोजेनिक कोलेंजाइटिस।

इस लेख का अधिकांश भाग तीव्र बैक्टीरियल कोलेंजाइटिस पर केंद्रित है, क्योंकि इसमें समय पर इलाज सीधे जीवन बचाता है।

कारण और जोखिम कारक

तीव्र कोलेंजाइटिस के पीछे दो चीज़ें होती हैं: पित्त नली में रुकावट और पित्त में बैक्टीरिया की मौजूदगी। सबसे आम कारण नली की पथरी (कोलेडोकोलिथियासिस) है, जो पित्ताशय से खिसककर मुख्य पित्त नली में फँस जाती है।

अन्य कारणों में शामिल हैं:

  • पित्त नली, अग्न्याशय (पैंक्रियाज़) या पित्ताशय का ट्यूमर या कैंसर
  • नली का सिकुड़ना (स्ट्रिक्चर), जो सर्जरी, चोट या पुरानी सूजन के बाद हो सकता है
  • ERCP जैसी प्रक्रिया के बाद संक्रमण, या नली में लगे स्टेंट का बंद हो जाना
  • पित्त नली में परजीवी कृमि, जो कुछ क्षेत्रों में अधिक पाए जाते हैं
  • अग्न्याशय की पुरानी सूजन या पित्त नली के जन्मजात सिस्ट

पित्त में आमतौर पर ई. कोलाई, क्लेबसिएला और एंटेरोकोकस जैसे आँत के जीवाणु पाए जाते हैं।

जोखिम उन लोगों में अधिक होता है जिन्हें पित्त की पथरी है, जो बुज़ुर्ग हैं, जिनकी पित्त नली की सर्जरी या ERCP हो चुकी है, या जिनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर है। पित्त की पथरी स्वयं महिलाओं में, मोटापे में, बहुत तेज़ी से वज़न घटाने पर और बढ़ती उम्र में अधिक बनती है।

लक्षण: कब सतर्क हो जाएँ

तीव्र कोलेंजाइटिस के क्लासिक लक्षण तीन हैं, जिन्हें “चार्कोट ट्रायड” कहा जाता है:

  1. बुखार और कँपकँपी: अक्सर तेज़ बुखार, जो ठंड लगने के साथ आता है।
  2. पीलिया: आँखों और त्वचा का पीला पड़ना, गहरे रंग का पेशाब और हल्के, मिट्टी जैसे रंग का मल।
  3. पेट दर्द: पेट के ऊपरी दाएँ हिस्से में दर्द, जो पीठ या दाएँ कंधे तक जा सकता है।

सभी मरीज़ों में तीनों लक्षण एक साथ नहीं दिखते। कई में, खासकर बुज़ुर्गों में, केवल बुखार और हल्का दर्द होता है।

जब संक्रमण गंभीर हो जाता है तो दो और लक्षण जुड़ते हैं: भ्रम या अत्यधिक सुस्ती, और रक्तचाप में गिरावट। इन पाँचों को मिलाकर “रेनॉल्ड्स पेंटाड” कहा जाता है, और यह गंभीर सेप्सिस का संकेत है। अन्य लक्षणों में मतली, उल्टी, भूख न लगना और त्वचा में खुजली शामिल हैं।

तुरंत अस्पताल जाएँ, यदि बुखार के साथ पीलिया या पेट दर्द हो, या मरीज़ को भ्रम, तेज़ धड़कन, साँस फूलना या बेहोशी जैसा महसूस हो।

PSC और PBC में लक्षण धीरे-धीरे आते हैं: लगातार थकान, खुजली और समय के साथ पीलिया।

निदान कैसे होता है

निदान लक्षणों, रक्त जाँच और इमेजिंग को मिलाकर किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय “टोक्यो दिशानिर्देश” इसी आधार पर चलते हैं: शरीर में सूजन के संकेत, पित्त रुकावट के संकेत, और इमेजिंग में नली का फैलाव या रुकावट का कारण।

  • रक्त जाँच: श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBC), CRP, बिलीरुबिन, लिवर एंज़ाइम (ALP, GGT, SGOT/SGPT) और रक्त कल्चर, ताकि बैक्टीरिया की पहचान हो सके।
  • अल्ट्रासाउंड: आमतौर पर पहली जाँच, जो नली का फैलाव और पथरी दिखा सकती है।
  • CT स्कैन: रुकावट का कारण और लिवर फोड़ा जैसी जटिलताएँ देखने में उपयोगी।
  • MRCP: बिना चीरे और बिना रेडिएशन के पित्त नलियों की साफ़ तस्वीर देने वाला MRI।
  • ERCP: एंडोस्कोप से की जाने वाली प्रक्रिया, जो जाँच के साथ-साथ इलाज भी कर सकती है।

PSC और PBC में इसके अलावा ऑटोएंटीबॉडी जाँच (जैसे PBC में AMA), MRCP और कभी-कभी लिवर बायोप्सी की ज़रूरत पड़ सकती है।

उपचार

तीव्र कोलेंजाइटिस का इलाज दो मोर्चों पर होता है: संक्रमण पर नियंत्रण और पित्त की निकासी (ड्रेनेज)।

1. भर्ती और सहायक देखभाल: मरीज़ को नस से तरल पदार्थ (IV फ्लूइड), दर्द की दवा और ज़रूरत पड़ने पर ऑक्सीजन दी जाती है। गंभीर मामलों में ICU में निगरानी रखी जाती है।

2. एंटीबायोटिक: रक्त कल्चर लेने के बाद जल्द से जल्द नस के ज़रिये एंटीबायोटिक शुरू किए जाते हैं, जो आँत के जीवाणुओं पर असर करें। कल्चर रिपोर्ट आने पर दवा बदली जा सकती है। हल्के मामले कभी-कभी केवल एंटीबायोटिक से सुधर जाते हैं।

3. पित्त निकासी: अधिकतर मरीज़ों में रुकावट हटाना ज़रूरी होता है। गंभीर मामलों में यह तुरंत किया जाता है, और मध्यम मामलों में आमतौर पर पहले एक-दो दिन में। इसके तरीके हैं:

  • ERCP: मुँह से एंडोस्कोप डालकर पथरी निकाली जाती है या स्टेंट लगाया जाता है।
  • PTBD: त्वचा के रास्ते नली में पतली ट्यूब डालकर पित्त बाहर निकाला जाता है, जब ERCP संभव न हो।
  • सर्जरी: अब कम इस्तेमाल होती है, पर अन्य तरीके विफल होने पर की जाती है।

4. मूल कारण का इलाज: संक्रमण काबू में आने के बाद, यदि पित्ताशय में पथरी है तो दोबारा बीमारी रोकने के लिए पित्ताशय निकालने (कोलेसिस्टेक्टॉमी) की योजना बनाई जाती है। ट्यूमर या स्ट्रिक्चर का इलाज अलग से होता है।

PSC और PBC का इलाज: PBC में आमतौर पर यूर्सोडिऑक्सीकोलिक एसिड (UDCA) पहली पंक्ति की दवा है, और कुछ मरीज़ों में अतिरिक्त दवाएँ जोड़ी जाती हैं। PSC का कोई एक सर्वमान्य इलाज नहीं है; संकरी नलियों का एंडोस्कोपिक उपचार किया जाता है और गंभीर अवस्था में लिवर प्रत्यारोपण ही विकल्प हो सकता है। दोनों का इलाज लिवर विशेषज्ञ (हेपेटोलॉजिस्ट) की निगरानी में होना चाहिए।

जटिलताएँ और बचाव

समय पर इलाज न मिलने पर तीव्र कोलेंजाइटिस से सेप्सिस, सेप्टिक शॉक, लिवर में फोड़ा, गुर्दे की विफलता और मृत्यु तक हो सकती है। बार-बार होने वाले संक्रमण और दीर्घकालिक प्रकार लिवर सिरोसिस और लिवर फेल्योर का कारण बन सकते हैं। PSC जैसे रोगों में पित्त नली के कैंसर का जोखिम भी बढ़ा हुआ रहता है।

बचाव के उपाय:

  • पित्त की पथरी के लक्षण, जैसे बार-बार पेट के ऊपरी दाएँ हिस्से में दर्द, को नज़रअंदाज़ न करें और डॉक्टर से मिलें।
  • पथरी की पुष्टि होने पर डॉक्टर की सलाह के अनुसार इलाज या सर्जरी करवाएँ।
  • संतुलित, कम वसा वाला आहार लें; फल, सब्ज़ियाँ और साबुत अनाज बढ़ाएँ।
  • वज़न नियंत्रित रखें और बहुत तेज़ी से वज़न घटाने से बचें।
  • नियमित व्यायाम करें और शराब सीमित रखें या छोड़ दें।
  • नली में स्टेंट लगा हो तो उसे तय समय पर बदलवाएँ, और बुखार या पीलिया होने पर तुरंत संपर्क करें।
  • PSC या PBC के मरीज़ नियमित जाँच और फॉलो-अप करवाएँ।

निष्कर्ष

कोलेंजाइटिस में समय सबसे अहम है। बुखार, पीलिया और पेट दर्द का मेल एक चेतावनी है, जिसे घरेलू उपायों के भरोसे टालना ख़तरनाक हो सकता है। जल्दी निदान, उचित एंटीबायोटिक और पित्त की निकासी से अधिकांश मरीज़ ठीक हो जाते हैं। दीर्घकालिक प्रकारों में नियमित निगरानी और विशेषज्ञ का इलाज लंबे समय तक लिवर को सुरक्षित रखता है।

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