फियोक्रोमोसाइटोमा (Pheochromocytoma): कारण, लक्षण, जाँच और उपचार
परिचय
फियोक्रोमोसाइटोमा एक दुर्लभ ट्यूमर है जो एड्रिनल ग्रंथि (अधिवृक्क ग्रंथि) के भीतरी भाग, यानी एड्रिनल मेडुला, की क्रोमैफिन कोशिकाओं से विकसित होता है। एड्रिनल ग्रंथियाँ दोनों गुर्दों के ऊपर टोपी की तरह बैठी होती हैं और शरीर के लिए ज़रूरी हार्मोन बनाती हैं। जब इस ग्रंथि में ट्यूमर बन जाता है, तो वह अत्यधिक मात्रा में कैटेकोलामाइन हार्मोन (एड्रेनालाईन, नॉरएड्रेनालाईन और कभी-कभी डोपामाइन) बनाने लगता है। इन हार्मोनों के अनियंत्रित स्राव से रक्तचाप अचानक बहुत बढ़ जाता है और हृदय व अन्य अंगों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
अधिकांश फियोक्रोमोसाइटोमा कैंसर-रहित (बिनाइन) होते हैं, लेकिन लगभग 10 प्रतिशत मामलों में ट्यूमर घातक हो सकता है और शरीर के अन्य हिस्सों में फैल सकता है। यदि समय पर पहचान न हो तो यह बीमारी जानलेवा भी साबित हो सकती है, इसलिए इसके बारे में जानकारी होना बहुत ज़रूरी है।
फियोक्रोमोसाइटोमा और पैरागैंग्लियोमा में अंतर
जब इसी प्रकार का ट्यूमर एड्रिनल ग्रंथि के बाहर, शरीर के अन्य स्थानों पर बनता है, जैसे पेट, छाती, गर्दन या श्रोणि (पेल्विस) में स्थित सिम्पेथेटिक तंत्रिका ऊतक में, तो उसे पैरागैंग्लियोमा कहा जाता है। दोनों की कार्यप्रणाली और उपचार का तरीका काफ़ी हद तक समान है। इसीलिए चिकित्सा जगत में इन्हें अक्सर साथ में “PPGL” कहा जाता है।
यह ट्यूमर किन्हें प्रभावित करता है?
यह रोग किसी भी उम्र में हो सकता है, परंतु सामान्यतः 30 से 50 वर्ष की आयु के बीच अधिक देखा जाता है। पुरुषों और महिलाओं में इसकी संभावना लगभग बराबर होती है। उच्च रक्तचाप के सभी मरीज़ों में से केवल 0.1 से 0.6 प्रतिशत में ही इसका कारण फियोक्रोमोसाइटोमा होता है, यानी यह बहुत दुर्लभ है। बच्चों में भी यह हो सकता है, और उनमें आनुवंशिक कारणों की भूमिका अधिक होती है।
कारण और जोखिम कारक
अधिकांश मामलों में इसका कोई स्पष्ट कारण नहीं मिलता, लेकिन लगभग 30 से 40 प्रतिशत मामले आनुवंशिक (जेनेटिक) उत्परिवर्तन से जुड़े पाए गए हैं। कुछ प्रमुख आनुवंशिक सिंड्रोम इस प्रकार हैं:
- MEN 2A और MEN 2B (मल्टीपल एंडोक्राइन नियोप्लासिया): इनमें RET जीन में बदलाव होता है और थायरॉइड, पैराथायरॉइड के साथ एड्रिनल ट्यूमर भी बन सकते हैं।
- वॉन हिप्पल-लिंडाउ (VHL) सिंड्रोम: इसमें मस्तिष्क, रेटिना और गुर्दों में भी गाँठें बन सकती हैं।
- न्यूरोफाइब्रोमैटोसिस टाइप 1 (NF1): इसमें त्वचा पर गाँठें और भूरे धब्बे दिखाई देते हैं।
- SDHx जीन उत्परिवर्तन: यह पैरागैंग्लियोमा और अधिक आक्रामक ट्यूमर से जुड़ा है।
यदि परिवार में किसी को यह रोग रहा हो, या कम उम्र में उच्च रक्तचाप, या एक साथ दोनों एड्रिनल ग्रंथियों में ट्यूमर हो, तो आनुवंशिक जाँच की सलाह दी जाती है।
लक्षण
फियोक्रोमोसाइटोमा के लक्षण कभी-कभी बहुत अलग-अलग होते हैं और अन्य बीमारियों जैसे लग सकते हैं, इसीलिए इसे “महान नकलची” (Great Mimic) भी कहा जाता है। कई मरीज़ों में सालों तक कोई लक्षण नहीं दिखते। आम लक्षण इस प्रकार हैं:
मुख्य त्रिक (Classic Triad):
- तेज़ और धड़कने वाला सिरदर्द
- अत्यधिक पसीना आना
- दिल की धड़कन तेज़ होना (धड़कन महसूस होना)
अन्य लक्षण:
- अचानक या लगातार उच्च रक्तचाप, जो दवाओं से कठिनाई से नियंत्रित होता है
- घबराहट, बेचैनी और चिंता का दौरा
- चेहरे का पीला पड़ जाना
- हाथ-पैरों में कंपन
- कमज़ोरी और थकान
- जी मिचलाना या उल्टी
- वज़न कम होना
- पेट या छाती में दर्द
- खड़े होने पर चक्कर आना (पोस्चुरल हाइपोटेंशन)
- ब्लड शुगर का बढ़ना
ये लक्षण अक्सर “दौरों” (स्पेल्स या पैरॉक्सिज़्म) के रूप में आते हैं, जो कुछ मिनटों से लेकर एक घंटे तक चल सकते हैं। दौरे शारीरिक श्रम, तनाव, झुकने, पेट पर दबाव, कुछ दवाओं (जैसे कुछ एंटी-डिप्रेसेंट, मेटोक्लोप्रामाइड, स्टेरॉयड), एनेस्थीसिया या टायरामीन-युक्त खाद्य पदार्थों (पुराना पनीर, अचार, वाइन आदि) से भी शुरू हो सकते हैं।
जटिलताएँ
यदि रोग की पहचान और इलाज न हो, तो निम्न गंभीर समस्याएँ हो सकती हैं:
- हाइपरटेंसिव क्राइसिस: रक्तचाप का अत्यधिक बढ़ जाना
- हृदयाघात (हार्ट अटैक) और हृदय की मांसपेशी की कमज़ोरी (कार्डियोमायोपैथी)
- स्ट्रोक (लकवा)
- हृदय की अनियमित धड़कन (अरिदमिया)
- गुर्दों को क्षति
- आँखों की रेटिना को नुकसान
- फेफड़ों में पानी भरना
- घातक ट्यूमर की स्थिति में हड्डी, यकृत, फेफड़ों और लिम्फ नोड्स में फैलाव
गर्भावस्था में अनजाने में हुआ फियोक्रोमोसाइटोमा माँ और शिशु दोनों के लिए बेहद ख़तरनाक हो सकता है।
निदान (जाँच)
निदान दो चरणों में होता है: पहले हार्मोनल जाँच से रोग की पुष्टि, फिर इमेजिंग से ट्यूमर का स्थान पता करना।
1. जैव-रासायनिक जाँच:
- प्लाज़्मा फ्री मेटानेफ्रीन्स: रक्त की यह जाँच सबसे संवेदनशील मानी जाती है।
- 24 घंटे के मूत्र में मेटानेफ्रीन्स और कैटेकोलामाइन: दिनभर का मूत्र इकट्ठा करके जाँच की जाती है।
जाँच से पहले डॉक्टर कुछ दवाओं और खाद्य पदार्थों से परहेज़ के लिए कह सकते हैं, क्योंकि वे नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।
2. इमेजिंग जाँच:
- सीटी स्कैन (CT) या एमआरआई (MRI): पेट और श्रोणि की जाँच के लिए। एमआरआई में ट्यूमर आमतौर पर चमकीला दिखता है।
- MIBG स्कैन, PET-CT (जैसे गैलियम-68 डोटाटेट): ट्यूमर के फैलाव, अन्य स्थानों पर मौजूद ट्यूमर और घातक रूप की पहचान के लिए।
3. आनुवंशिक जाँच: सभी मरीज़ों में, विशेषकर युवा या पारिवारिक इतिहास वाले मरीज़ों में, इसकी सलाह दी जाती है।
एक ज़रूरी सावधानी: संदिग्ध फियोक्रोमोसाइटोमा में बिना पूर्व तैयारी के बायोप्सी (सुई से नमूना लेना) नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इससे अचानक हार्मोन निकलकर ख़तरनाक रक्तचाप संकट पैदा हो सकता है।
उपचार
1. सर्जरी (शल्य चिकित्सा)
इसका मुख्य और निश्चित उपचार ट्यूमर को ऑपरेशन द्वारा निकालना है। आजकल अधिकतर मामलों में यह ऑपरेशन लैप्रोस्कोपिक (दूरबीन विधि) से किया जाता है, जिसमें छोटे चीरे लगते हैं और रिकवरी तेज़ होती है। बड़े या घातक ट्यूमर में खुली सर्जरी की ज़रूरत पड़ सकती है। कुछ आनुवंशिक मामलों में, जहाँ दोनों ग्रंथियाँ प्रभावित हों, डॉक्टर ग्रंथि का एक हिस्सा बचाने की कोशिश करते हैं।
2. सर्जरी से पहले की तैयारी
यह बेहद ज़रूरी है। सर्जरी के दौरान ट्यूमर को छूने से हार्मोन का अचानक स्राव हो सकता है। इसलिए ऑपरेशन से पहले लगभग 7 से 14 दिन तक दवाओं से तैयारी की जाती है:
- अल्फा-ब्लॉकर दवाएँ (जैसे फेनॉक्सीबेंज़ामाइन या डॉक्साज़ोसिन): ये रक्तचाप को नियंत्रित करती हैं।
- बीटा-ब्लॉकर दवाएँ: अल्फा-ब्लॉकर शुरू करने के बाद ही, दिल की धड़कन को नियंत्रित करने के लिए दी जाती हैं। अल्फा-ब्लॉकर से पहले केवल बीटा-ब्लॉकर देना ख़तरनाक हो सकता है।
- अधिक नमक और तरल पदार्थों का सेवन: ताकि रक्त की मात्रा सामान्य रहे और ऑपरेशन के बाद रक्तचाप न गिरे।
3. सर्जरी के बाद देखभाल
ऑपरेशन के बाद रक्तचाप और ब्लड शुगर की निगरानी की जाती है, क्योंकि रक्तचाप गिर सकता है या शुगर कम हो सकती है। कुछ हफ्तों बाद हार्मोन की जाँच दोहराकर देखा जाता है कि ट्यूमर पूरी तरह निकल गया या नहीं।
4. घातक या फैले हुए ट्यूमर का उपचार
ऐसे मामलों में विकल्पों में शामिल हैं: रेडियोथेरेपी, MIBG या पेप्टाइड रिसेप्टर रेडियोन्यूक्लाइड थेरेपी (PRRT), कीमोथेरेपी, और लक्षित दवाएँ (टार्गेटेड थेरेपी)। इनका चयन विशेषज्ञ डॉक्टर मरीज़ की स्थिति देखकर करते हैं।
दीर्घकालिक अनुवर्ती जाँच (फॉलो-अप)
सर्जरी के बाद भी जीवनभर नियमित जाँच ज़रूरी है, क्योंकि ट्यूमर दोबारा हो सकता है, खासकर आनुवंशिक मामलों में और बड़े या पैरागैंग्लियोमा वाले ट्यूमर में। आमतौर पर हर साल रक्तचाप की जाँच और हार्मोन की जाँच की जाती है। परिवार के सदस्यों की भी जेनेटिक स्क्रीनिंग कराना उपयोगी हो सकता है।
जीवन-प्रत्याशा और पूर्वानुमान
समय पर निदान और सफल सर्जरी के बाद अधिकांश मरीज़ सामान्य जीवन जीते हैं, और उच्च रक्तचाप भी अक्सर ठीक हो जाता है या काफ़ी कम हो जाता है। बिनाइन ट्यूमर में सर्जरी के बाद पाँच वर्ष की जीवित रहने की दर 95 प्रतिशत से अधिक होती है। घातक फियोक्रोमोसाइटोमा में पूर्वानुमान अपेक्षाकृत कमज़ोर होता है, पर आधुनिक उपचार से कई मरीज़ वर्षों तक स्थिर रह पाते हैं।
बचाव और जागरूकता
चूँकि अधिकांश मामलों को रोका नहीं जा सकता, इसलिए शीघ्र पहचान ही सबसे अच्छा बचाव है। इन बातों का ध्यान रखें:
- यदि कम उम्र में उच्च रक्तचाप हो, या रक्तचाप दवाओं से नियंत्रित न हो रहा हो, तो कारण की जाँच कराएँ।
- सिरदर्द, पसीना और धड़कन का बार-बार आने वाला दौरा नज़रअंदाज़ न करें।
- परिवार में आनुवंशिक सिंड्रोम का इतिहास हो तो नियमित स्क्रीनिंग कराएँ।
- कोई भी सर्जरी या एनेस्थीसिया कराने से पहले अपने चिकित्सकीय इतिहास की पूरी जानकारी दें।
- अपने डॉक्टर की सलाह के बिना कोई दवा न लें।
निष्कर्ष
फियोक्रोमोसाइटोमा एक दुर्लभ, पर गंभीर और इलाज-योग्य बीमारी है। अचानक होने वाला तेज़ सिरदर्द, पसीना, धड़कन और उच्च रक्तचाप इसके प्रमुख संकेत हैं। सही जाँच, दवाओं से समुचित तैयारी और कुशल सर्जरी से अधिकांश मरीज़ पूरी तरह स्वस्थ हो जाते हैं। यदि आपको या आपके किसी परिजन को ऊपर बताए गए लक्षण बार-बार हों, तो देर न करें और किसी एंडोक्राइनोलॉजिस्ट (हार्मोन विशेषज्ञ) से परामर्श लें। समय पर की गई पहचान न केवल जीवन बचा सकती है, बल्कि जटिलताओं से भी सुरक्षा देती है।
