ट्यूबरस स्क्लेरोसिस कॉम्प्लेक्स (Tuberous Sclerosis Complex)
| | | |

ट्यूबरस स्क्लेरोसिस कॉम्प्लेक्स (TSC): एक दुर्लभ आनुवंशिक रोग की पूरी जानकारी

परिचय

कुछ बीमारियाँ इतनी दुर्लभ होती हैं कि कई बार डॉक्टर भी शुरुआत में उन्हें पहचान नहीं पाते। ट्यूबरस स्क्लेरोसिस कॉम्प्लेक्स (Tuberous Sclerosis Complex, संक्षेप में TSC) ऐसा ही एक आनुवंशिक रोग है। इसमें शरीर के अलग-अलग अंगों में गैर-कैंसरयुक्त (benign) गाँठें या ट्यूमर बनने लगते हैं। ये मस्तिष्क, त्वचा, गुर्दे, हृदय, फेफड़े और आँखों में हो सकते हैं। इस रोग की गंभीरता हर व्यक्ति में अलग होती है। किसी में केवल त्वचा पर कुछ निशान दिखते हैं, तो किसी में दौरे और सीखने-समझने की गंभीर दिक्कतें भी होती हैं।

TSC क्या है?

TSC एक बहु-तंत्रीय (multisystem) आनुवंशिक विकार है। इसे पहली बार 1880 में फ्रांसीसी चिकित्सक डेज़िरे-मैग्लोयर बॉर्नविल ने विस्तार से बताया था। इसी कारण इसे “बॉर्नविल रोग” भी कहा जाता है। “ट्यूबरस” शब्द का अर्थ है आलू जैसी गाँठदार संरचनाएँ। मस्तिष्क में ऐसी ही कठोर (sclerotic) गाँठें पाई गई थीं, जिनसे इस रोग का नाम पड़ा।

अनुमान है कि दुनिया में लगभग 6,000 से 10,000 जन्मों में से एक बच्चा इस रोग के साथ पैदा होता है। यह स्त्री-पुरुष, किसी भी जाति या क्षेत्र के लोगों में समान रूप से हो सकता है।

कारण और आनुवंशिकी

TSC दो जीनों में से किसी एक में खराबी (म्यूटेशन) के कारण होता है:

  • TSC1 जीन (गुणसूत्र 9 पर), जो “हैमार्टिन” नामक प्रोटीन बनाता है
  • TSC2 जीन (गुणसूत्र 16 पर), जो “ट्यूबरिन” नामक प्रोटीन बनाता है

ये दोनों प्रोटीन मिलकर कोशिकाओं की वृद्धि को नियंत्रित करते हैं। ये “mTOR” नामक एक महत्वपूर्ण सिग्नलिंग मार्ग को दबाकर रखते हैं। जब इनमें से कोई जीन खराब हो जाता है, तो mTOR मार्ग अनियंत्रित रूप से सक्रिय हो जाता है और कोशिकाएँ जरूरत से ज़्यादा बढ़ने लगती हैं। इसी से अंगों में गाँठें बनती हैं। आधुनिक इलाज इसी mTOR मार्ग को लक्ष्य बनाता है।

TSC ऑटोसोमल डोमिनेंट तरीके से विरासत में मिलता है। यदि माता या पिता में से किसी को यह रोग है, तो हर संतान को यह होने की संभावना 50 प्रतिशत होती है। लेकिन लगभग दो-तिहाई मामलों में माता-पिता स्वस्थ होते हैं और बच्चे में यह म्यूटेशन नया (de novo) उत्पन्न होता है। TSC2 म्यूटेशन आमतौर पर TSC1 की तुलना में अधिक गंभीर लक्षण देते हैं। यह भी संभव है कि माता-पिता में बहुत हल्के लक्षण हों और उनका निदान कभी न हुआ हो।

शरीर पर प्रभाव और प्रमुख लक्षण

मस्तिष्क

मस्तिष्क के लक्षण TSC में सबसे अधिक चिंता का कारण बनते हैं। इसमें ये संरचनाएँ मिलती हैं:

  • कॉर्टिकल ट्यूबर: मस्तिष्क की बाहरी परत में असामान्य विकास के क्षेत्र
  • सबएपेंडाइमल नोड्यूल: मस्तिष्क के निलय (ventricles) की दीवार पर छोटी गाँठें
  • SEGA (सबएपेंडाइमल जायंट सेल एस्ट्रोसाइटोमा): एक धीमी गति से बढ़ने वाला ट्यूमर, जो मस्तिष्क द्रव के प्रवाह को रोककर हाइड्रोसेफेलस (मस्तिष्क में द्रव का जमाव) पैदा कर सकता है

इनके कारण मिर्गी के दौरे सबसे आम लक्षण हैं। लगभग 80 से 90 प्रतिशत मरीजों को जीवन में कभी न कभी दौरे पड़ते हैं। शिशुओं में “इन्फेंटाइल स्पैज़्म” नामक विशेष प्रकार के दौरे हो सकते हैं। इनमें बच्चा अचानक झटके के साथ हाथ-पैर समेट लेता है। इन्हें जल्द पहचानकर इलाज करना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि देर होने पर विकास पर स्थायी असर पड़ सकता है।

इसके अलावा कई मरीजों में न्यूरोसाइकियाट्रिक समस्याएँ होती हैं, जिन्हें सामूहिक रूप से TAND (TSC-Associated Neuropsychiatric Disorders) कहा जाता है। इनमें बौद्धिक अक्षमता, ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम, ध्यान की कमी और अति-सक्रियता (ADHD), चिंता, अवसाद और व्यवहार संबंधी दिक्कतें शामिल हैं।

त्वचा

लगभग 90 प्रतिशत लोगों में त्वचा पर कोई न कोई लक्षण दिखता है। ये अक्सर निदान का पहला सुराग होते हैं:

  • हाइपोमेलानोटिक मैक्यूल (“ऐश-लीफ स्पॉट”): त्वचा पर राख के पत्ते जैसे सफेद या हल्के रंग के धब्बे, जो अक्सर जन्म से या शैशवावस्था से दिखते हैं
  • फेशियल एंजियोफाइब्रोमा: नाक और गालों पर लाल-गुलाबी छोटे दाने, जो बचपन में मुँहासों जैसे दिखते हैं
  • शैग्रीन पैच: कमर के निचले हिस्से पर उभरी हुई, खुरदरी त्वचा
  • अंगुलीय फाइब्रोमा (ungual fibroma): नाखूनों के आसपास या नीचे उभरने वाली गाँठें
  • माथे पर फाइब्रस प्लाक

गुर्दे

गुर्दों में एंजियोमायोलिपोमा (रक्त वाहिकाओं, मांसपेशी और वसा से बनी गाँठें) आम हैं। ये बड़ी होकर अचानक रक्तस्राव कर सकती हैं, जो खतरनाक हो सकता है। गुर्दे में सिस्ट भी बन सकते हैं। कुछ मामलों में गुर्दे की कार्यक्षमता घटती है। किडनी कैंसर का खतरा अपेक्षाकृत कम है, पर आम आबादी से थोड़ा अधिक होता है।

हृदय

शिशुओं और भ्रूण में हृदय की मांसपेशी में रैब्डोमायोमा नामक गाँठें मिल सकती हैं। कई बार गर्भावस्था की अल्ट्रासाउंड जाँच में ये पहली बार दिखती हैं और TSC के निदान का संकेत देती हैं। अधिकतर मामलों में ये उम्र बढ़ने के साथ अपने-आप सिकुड़ जाती हैं, पर कुछ में अनियमित धड़कन या रुकावट पैदा कर सकती हैं।

फेफड़े और आँखें

वयस्क महिलाओं में फेफड़ों में LAM (लिम्फैंजियोलियोमायोमैटोसिस) विकसित हो सकता है। इसमें फेफड़ों में सिस्ट बनते हैं, जिससे साँस फूलना, खाँसी और कभी-कभी फेफड़े के पचक जाने (न्यूमोथोरैक्स) की समस्या होती है। आँखों में रेटिना पर हैमार्टोमा नामक गाँठें हो सकती हैं, जो अधिकांश मामलों में दृष्टि को प्रभावित नहीं करतीं।

निदान कैसे होता है?

TSC का निदान चिकित्सकीय लक्षणों और आनुवंशिक जाँच, दोनों के आधार पर होता है। अंतरराष्ट्रीय सर्वसम्मति मानदंडों के अनुसार निदान तब पक्का माना जाता है जब:

  1. TSC1 या TSC2 जीन में रोग-कारक म्यूटेशन मिले, या
  2. दो प्रमुख लक्षण मौजूद हों, या
  3. एक प्रमुख और दो या अधिक गौण लक्षण मौजूद हों

निदान के लिए आमतौर पर ये जाँचें की जाती हैं:

  • मस्तिष्क का MRI (ट्यूबर, नोड्यूल और SEGA देखने के लिए)
  • EEG (दौरों की गतिविधि जाँचने के लिए)
  • गुर्दे का अल्ट्रासाउंड या MRI
  • हृदय की इकोकार्डियोग्राफी और ECG
  • आँखों की जाँच
  • त्वचा और दाँतों की जाँच (दाँतों के इनेमल में छोटे गड्ढे भी एक संकेत हो सकते हैं)
  • जेनेटिक टेस्टिंग

लगभग 10 से 15 प्रतिशत मरीजों में जाँच के बावजूद म्यूटेशन नहीं मिलता। ऐसे में भी चिकित्सकीय मानदंड पूरे होने पर निदान किया जा सकता है।

इलाज और प्रबंधन

TSC का अभी कोई ऐसा इलाज नहीं है जो रोग को जड़ से समाप्त कर दे। लेकिन लक्षणों को नियंत्रित करने और जटिलताओं को रोकने के लिए कई प्रभावी विकल्प उपलब्ध हैं।

दौरों का इलाज: शिशु-स्पैज़्म में विगाबेट्रिन पहली पसंद की दवा मानी जाती है। अन्य मामलों में एंटी-एपिलेप्टिक दवाएँ, कैनाबिडियोल (कुछ देशों में स्वीकृत), कीटोजेनिक डाइट या वेगस नर्व स्टिमुलेशन दिए जा सकते हैं। यदि दौरे किसी एक स्पष्ट ट्यूबर से उठ रहे हों और दवाओं से काबू न हों, तो मिर्गी की सर्जरी से भी लाभ हो सकता है।

mTOR अवरोधक (एवेरोलिमस/सिरोलिमस): यह इलाज का एक बड़ा बदलाव है। एवेरोलिमस दवा SEGA और गुर्दे के एंजियोमायोलिपोमा को छोटा करने में कारगर है और कुछ मरीजों में दौरों को भी कम करती है। त्वचा के एंजियोफाइब्रोमा के लिए सिरोलिमस का लेप (टॉपिकल जेल) भी इस्तेमाल होता है। इन दवाओं के दुष्प्रभाव होते हैं, जैसे मुँह में छाले और संक्रमण का खतरा, इसलिए इन्हें केवल विशेषज्ञ की निगरानी में लेना चाहिए।

सर्जरी और अन्य प्रक्रियाएँ: बड़े SEGA जो द्रव प्रवाह रोकें, उनकी सर्जरी की जा सकती है। गुर्दे की गाँठों में रक्तस्राव का खतरा हो तो एम्बोलाइज़ेशन किया जाता है। त्वचा के दानों के लिए लेज़र उपचार उपलब्ध है।

व्यवहार और विकास संबंधी सहायता: प्रारंभिक हस्तक्षेप, स्पीच थेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, विशेष शिक्षा और मनोवैज्ञानिक परामर्श से बच्चों के विकास में बड़ा फर्क पड़ता है।

नियमित निगरानी का महत्व

TSC में लक्षण उम्र के साथ बदलते रहते हैं, इसलिए जीवनभर नियमित जाँच जरूरी है। सामान्यतः मस्तिष्क और गुर्दों का MRI हर 1 से 3 वर्ष में कराने की सलाह दी जाती है। बच्चों को नियमित EEG, हृदय जाँच और विकासात्मक मूल्यांकन की जरूरत पड़ती है। इनकी सही अवधि मरीज की स्थिति देखकर न्यूरोलॉजिस्ट, नेफ्रोलॉजिस्ट और अन्य विशेषज्ञ तय करते हैं। आदर्श रूप से मरीज का इलाज एक बहु-विशेषज्ञ टीम करे।

जीवन की गुणवत्ता और परिवार के लिए सलाह

TSC का निदान परिवार के लिए भावनात्मक रूप से कठिन हो सकता है, पर यह याद रखना चाहिए कि हर मरीज की स्थिति अलग होती है। सही समय पर निदान और इलाज से कई लोग सामान्य के करीब, संतोषजनक जीवन जीते हैं। परिवारों के लिए कुछ उपयोगी बातें:

  • आनुवंशिक परामर्श लें, खासकर तब जब परिवार में और बच्चे की योजना हो
  • दौरे की दवाएँ नियमित रूप से और समय पर दें, बिना डॉक्टर की सलाह के बंद न करें
  • शिशु में अचानक झटकेदार हरकतें दिखें तो तुरंत बाल न्यूरोलॉजिस्ट से मिलें
  • शिक्षकों और स्कूल को बच्चे की जरूरतों के बारे में बताएँ
  • सहायता समूहों और मरीज संगठनों से जुड़ें, ताकि अनुभव और जानकारी साझा हो सके
  • हर वर्ष 15 मई को मनाया जाने वाला “विश्व TSC दिवस” इस रोग के प्रति जागरूकता बढ़ाने का अवसर है

निष्कर्ष

ट्यूबरस स्क्लेरोसिस कॉम्प्लेक्स एक जटिल लेकिन अब काफी बेहतर समझा जाने वाला रोग है। TSC1 और TSC2 जीनों तथा mTOR मार्ग की खोज ने इलाज की नई राहें खोली हैं। जागरूकता, समय पर निदान, नियमित निगरानी और बहु-विशेषज्ञ देखभाल इसके प्रबंधन की कुंजी हैं। यदि बच्चे की त्वचा पर असामान्य सफेद धब्बे हों, उसे बार-बार दौरे पड़ें या विकास में देरी दिखे, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें और किसी योग्य चिकित्सक से परामर्श लें।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *