इरिरिडोसायक्लाइटिस (Iridocyclitis - आईरिस की सूजन)
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इरिडोसायक्लाइटिस (Iridocyclitis): आँख की आईरिस और सिलियरी बॉडी की सूजन

परिचय

हमारी आँखें शरीर का सबसे नाज़ुक और महत्वपूर्ण अंग हैं। इनमें होने वाली कई बीमारियाँ शुरुआत में मामूली लगती हैं, लेकिन समय पर इलाज न मिलने पर स्थायी दृष्टिहानि तक पहुँचा सकती हैं। इरिडोसायक्लाइटिस ऐसी ही एक स्थिति है, जिसमें आँख के भीतरी हिस्से में सूजन आ जाती है। इसे चिकित्सा भाषा में एन्टीरियर यूवाइटिस (Anterior Uveitis) भी कहते हैं। आम बोलचाल में इसे “आईरिस की सूजन” कहा जाता है।

यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती है, पर आमतौर पर 20 से 50 वर्ष की उम्र के लोगों में अधिक देखी जाती है। सही समय पर पहचान और इलाज हो जाए तो अधिकांश मरीज़ पूरी तरह ठीक हो जाते हैं।

आँख की संरचना: संक्षिप्त जानकारी

इस रोग को समझने के लिए आँख की बनावट जानना उपयोगी है। आँख की मध्य परत को यूविया (Uvea) कहते हैं। इसके तीन भाग हैं:

  1. आईरिस (Iris): आँख का रंगीन हिस्सा, जो पुतली के आकार को नियंत्रित करके आँख में जाने वाली रोशनी को नियमित करता है।
  2. सिलियरी बॉडी (Ciliary Body): आईरिस के पीछे स्थित मांसपेशीय संरचना, जो लेंस को आकार देकर पास-दूर देखने में मदद करती है। यह आँख के भीतर बनने वाले तरल (एक्वियस ह्यूमर) का निर्माण भी करती है।
  3. कोरॉइड (Choroid): रेटिना को रक्त पहुँचाने वाली परत।

जब आईरिस और सिलियरी बॉडी, दोनों में एक साथ सूजन होती है, तो उसे इरिडोसायक्लाइटिस कहा जाता है। सिर्फ आईरिस की सूजन को आइराइटिस कहते हैं।

इरिडोसायक्लाइटिस के प्रकार

अवधि के आधार पर:

  • तीव्र (Acute): अचानक शुरू होता है और आमतौर पर 6 सप्ताह से कम चलता है।
  • दीर्घकालिक (Chronic): धीरे-धीरे विकसित होता है और 6 सप्ताह से अधिक समय तक बना रहता है।
  • बार-बार होने वाला (Recurrent): ठीक होने के बाद कुछ अंतराल पर दोबारा उभरता है।

कारण के आधार पर:

  • ग्रैन्युलोमेटस: आमतौर पर टीबी, सारकॉइडोसिस जैसे संक्रमणों या सूजन संबंधी रोगों से जुड़ा होता है।
  • नॉन-ग्रैन्युलोमेटस: अधिकतर ऑटोइम्यून स्थितियों, चोट या अज्ञात कारणों से होता है।

इरिडोसायक्लाइटिस के प्रमुख कारण

लगभग आधे मामलों में स्पष्ट कारण पता नहीं चलता, जिसे इडियोपैथिक कहते हैं। बाकी मामलों में निम्न कारण हो सकते हैं:

1. ऑटोइम्यून और सूजन संबंधी रोग:

  • एंकायलोज़िंग स्पॉन्डिलाइटिस (रीढ़ का गठिया)
  • रूमेटॉइड आर्थराइटिस, विशेषकर बच्चों में जुवेनाइल आइडियोपैथिक आर्थराइटिस
  • सोरायसिस और सोरिएटिक आर्थराइटिस
  • इन्फ्लेमेटरी बाउल डिज़ीज़ (क्रोहन रोग, अल्सरेटिव कोलाइटिस)
  • सारकॉइडोसिस और बेह्चेट रोग

2. संक्रमण:

  • क्षय रोग (टीबी)
  • सिफलिस
  • हर्पीज़ सिम्प्लेक्स और हर्पीज़ ज़ोस्टर वायरस
  • टॉक्सोप्लाज़्मोसिस
  • लाइम रोग

3. चोट: आँख पर सीधा आघात या किसी नुकीली वस्तु से चोट।

4. आनुवंशिक कारक: HLA-B27 नामक जीन वाले लोगों में इस रोग की संभावना अधिक होती है।

5. अन्य कारण: कुछ दवाएँ, आँख की सर्जरी के बाद की सूजन और कभी-कभी कुछ प्रकार के कैंसर।

लक्षण

इरिडोसायक्लाइटिस के लक्षण आमतौर पर एक आँख में शुरू होते हैं, हालाँकि कुछ मामलों में दोनों आँखें प्रभावित हो सकती हैं। प्रमुख लक्षण हैं:

  • आँख में लालिमा: विशेषकर कॉर्निया के चारों ओर गहरी गुलाबी या बैंगनी रेखा (सिलियरी फ्लश)
  • आँख में दर्द: हल्का या तेज़ दर्द, जो रोशनी में बढ़ जाता है
  • प्रकाश से असहजता (फोटोफोबिया): धूप या तेज़ रोशनी में आँखें खोलना कठिन हो जाता है
  • धुंधला दिखना: दृष्टि की स्पष्टता घट जाती है
  • पानी आना: आँख से लगातार आँसू बहना
  • पुतली का छोटा या अनियमित होना: प्रभावित आँख की पुतली सिकुड़ जाती है
  • आँख के सामने तैरते धब्बे (फ्लोटर्स): कुछ मामलों में
  • सिरदर्द: आँख के आसपास या माथे में

ध्यान दें: दीर्घकालिक प्रकार में लालिमा और दर्द कम हो सकते हैं, इसलिए रोग चुपचाप बढ़ता रह सकता है और केवल धुंधलेपन के रूप में सामने आता है। बच्चों में यह विशेष रूप से देखा जाता है।

संभावित जटिलताएँ

समय पर इलाज न हो तो निम्न समस्याएँ पैदा हो सकती हैं:

  1. पोस्टीरियर सिनेकिया: सूजन के कारण आईरिस लेंस से चिपक जाती है, जिससे पुतली का आकार बिगड़ जाता है।
  2. ग्लूकोमा (काला मोतिया): आँख के भीतर दबाव बढ़ जाता है, जो ऑप्टिक नर्व को नुकसान पहुँचाता है।
  3. मोतियाबिंद (Cataract): लंबे समय की सूजन और स्टेरॉयड दवाओं के कारण लेंस धुँधला हो सकता है।
  4. मैक्युलर एडिमा: रेटिना के केंद्रीय भाग में सूजन, जिससे देखने की क्षमता घटती है।
  5. बैंड केराटोपैथी: कॉर्निया पर कैल्शियम जमा हो जाना।
  6. स्थायी दृष्टिहानि: गंभीर और अनुपचारित मामलों में।

निदान (जाँच)

नेत्र रोग विशेषज्ञ (ऑप्थेल्मोलॉजिस्ट) निम्न जाँचों के आधार पर रोग की पहचान करते हैं:

  • स्लिट लैम्प जाँच: यह सबसे महत्वपूर्ण जाँच है। इसमें आँख के अगले हिस्से में सूजन की कोशिकाएँ (cells) और प्रोटीन का रिसाव (flare) देखा जाता है।
  • दृष्टि की जाँच: देखने की क्षमता का आकलन।
  • आँख के दबाव की जाँच (टोनोमेट्री): ग्लूकोमा की आशंका जाँचने के लिए।
  • डाइलेटेड फंडस जाँच: पुतली को फैलाकर आँख के पिछले हिस्से का परीक्षण।
  • रक्त जाँच: ESR, CRP, HLA-B27, ANA आदि।
  • छाती का एक्स-रे और मैनटॉक्स/IGRA टेस्ट: टीबी की जाँच के लिए।
  • अन्य जाँच: ज़रूरत पड़ने पर सिफलिस टेस्ट, सीटी स्कैन या OCT।

चूँकि यह रोग कई बार शरीर की किसी अन्य बीमारी का संकेत होता है, इसलिए कारण खोजना उपचार का अहम हिस्सा है।

उपचार

उपचार के तीन मुख्य लक्ष्य हैं: सूजन कम करना, दर्द से राहत देना और जटिलताओं को रोकना।

1. स्टेरॉयड आई ड्रॉप्स: यह इलाज का मुख्य आधार है। प्रेडनिसोलोन या डेक्सामेथासोन की बूँदें शुरुआत में हर घंटे या हर दो घंटे में डाली जाती हैं, फिर सूजन घटने पर धीरे-धीरे कम की जाती हैं। इन्हें अचानक बंद नहीं करना चाहिए, वरना सूजन लौट सकती है।

2. पुतली फैलाने वाली दवाएँ (साइक्लोप्लेजिक): एट्रोपिन या साइक्लोपेंटोलेट की बूँदें सिलियरी मांसपेशी को आराम देकर दर्द घटाती हैं और आईरिस को लेंस से चिपकने से रोकती हैं।

3. आँख का दबाव घटाने वाली दवाएँ: यदि दबाव बढ़ा हो तो इसके लिए बूँदें या गोलियाँ दी जाती हैं।

4. इंजेक्शन: गंभीर मामलों में आँख के आसपास या भीतर स्टेरॉयड इंजेक्शन दिया जा सकता है।

5. मुँह से ली जाने वाली दवाएँ: दोनों आँखों के प्रभावित होने, गंभीर या बार-बार होने वाली सूजन में स्टेरॉयड की गोलियाँ या इम्यूनोसप्रेसिव दवाएँ (जैसे मेथोट्रेक्सेट, एडालिमुमैब) दी जाती हैं।

6. मूल कारण का इलाज: यदि टीबी, हर्पीज़ या सिफलिस जैसा संक्रमण मिले तो उसकी विशिष्ट दवाएँ दी जाती हैं। आर्थराइटिस जैसे रोगों के लिए रूमेटोलॉजिस्ट की सलाह ली जाती है।

7. सर्जरी: मोतियाबिंद या ग्लूकोमा जैसी जटिलताओं के लिए ज़रूरत पड़ने पर ही, और आमतौर पर सूजन पूरी तरह शांत होने के बाद।

देखभाल और सावधानियाँ

  • डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाएँ समय पर और पूरी अवधि तक लें।
  • अपने मन से आँख की बूँदें, विशेषकर स्टेरॉयड, कभी न डालें। इनके गलत उपयोग से मोतियाबिंद, ग्लूकोमा और संक्रमण का खतरा बढ़ता है।
  • तेज़ रोशनी से बचने के लिए धूप का चश्मा पहनें।
  • आँखों को न रगड़ें।
  • बूँदें डालने से पहले हाथ साबुन से धोएँ और ड्रॉपर की नोक को आँख से न छुआएँ।
  • डॉक्टर द्वारा तय की गई फॉलो-अप तारीखों पर ज़रूर जाएँ, क्योंकि आँख का दबाव और सूजन की स्थिति बार-बार जाँचनी पड़ती है।
  • कॉन्टैक्ट लेंस का उपयोग तब तक बंद रखें जब तक डॉक्टर अनुमति न दें।
  • घरेलू नुस्खे, जैसे आँख में गुलाबजल, दूध या कोई अन्य पदार्थ डालना, उपचार का विकल्प नहीं हैं और नुकसान कर सकते हैं।

बचाव के उपाय

इस रोग को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन जोखिम घटाया जा सकता है:

  • आँख में चोट से बचाव के लिए खेल, निर्माण कार्य या वाहन चलाते समय सुरक्षात्मक चश्मा पहनें।
  • यदि आपको ऑटोइम्यून रोग है, तो उसका नियमित इलाज कराएँ।
  • टीबी, हर्पीज़ जैसे संक्रमणों का समय पर उपचार करवाएँ।
  • जिन्हें एक बार यह रोग हो चुका है, वे लक्षण दोबारा दिखते ही तुरंत जाँच कराएँ, क्योंकि पुनरावृत्ति की संभावना रहती है।
  • आँखों की नियमित जाँच कराएँ, खासकर यदि परिवार में ऐसे रोगों का इतिहास हो।

डॉक्टर को कब दिखाएँ

निम्न स्थितियों में तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ से मिलें:

  • अचानक आँख लाल होना, साथ में दर्द या रोशनी से परेशानी
  • दृष्टि में अचानक धुंधलापन या कमी
  • चोट के बाद आँख में दर्द या लालिमा
  • किसी बच्चे को जोड़ों के दर्द के साथ आँख की शिकायत

आँख की लालिमा हमेशा “कंजंक्टिवाइटिस” या मामूली एलर्जी नहीं होती। यदि लालिमा के साथ दर्द और रोशनी से असहजता हो, तो देरी न करें।

निष्कर्ष

इरिडोसायक्लाइटिस एक गंभीर लेकिन उपचार योग्य नेत्र रोग है। यदि इसकी समय रहते पहचान हो जाए और सही इलाज मिले, तो अधिकांश मरीज़ों की दृष्टि सुरक्षित रहती है। मुख्य बात यह है कि आँख के दर्द, लालिमा और रोशनी से असहजता को हल्के में न लें, स्वयं इलाज करने के बजाय योग्य नेत्र चिकित्सक से परामर्श करें और उपचार को बीच में न छोड़ें। नियमित फॉलो-अप और अंतर्निहित रोग का प्रबंधन इस बीमारी को बार-बार लौटने से रोकने की कुंजी है।

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