प्लेसेंटा एक्रीटा (Placenta Accreta): जब गर्भनाल गर्भाशय की दीवार में बहुत गहराई तक जुड़ जाए
परिचय
गर्भावस्था के दौरान प्लेसेंटा (गर्भनाल/अपरा) माँ और शिशु के बीच पोषण, ऑक्सीजन और रक्त के आदान-प्रदान का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम होता है। सामान्य परिस्थिति में प्लेसेंटा गर्भाशय की भीतरी परत (एंडोमेट्रियम) से जुड़ता है और प्रसव के बाद आसानी से अलग हो जाता है। लेकिन कुछ महिलाओं में प्लेसेंटा गर्भाशय की दीवार में सामान्य से कहीं अधिक गहराई तक जुड़ जाता है, जिसे चिकित्सा भाषा में “प्लेसेंटा एक्रीटा” कहा जाता है। यह एक गंभीर प्रसूति संबंधी जटिलता है, जिसके लिए समय पर पहचान और उचित प्रबंधन बेहद ज़रूरी है, क्योंकि इससे प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव जैसी जानलेवा स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
प्लेसेंटा एक्रीटा क्या है?
सामान्य गर्भावस्था में प्लेसेंटा गर्भाशय की सबसे ऊपरी परत, यानी डेसीड्यूआ (Decidua) से जुड़ता है, और प्रसव के बाद यह परत सहित प्लेसेंटा आसानी से अलग हो जाता है। परंतु प्लेसेंटा एक्रीटा में गर्भनाल की जड़ें डेसीड्यूआ को पार करते हुए गर्भाशय की मांसपेशीय दीवार (मायोमेट्रियम) में गहराई तक प्रवेश कर जाती हैं। इसका मुख्य कारण गर्भाशय की भीतरी परत का असामान्य रूप से पतला या क्षतिग्रस्त होना माना जाता है, जिससे प्लेसेंटा को सामान्य सतह पर टिकने के बजाय गहराई में जड़ें जमानी पड़ती हैं।
यह स्थिति प्रसव के बाद प्लेसेंटा के अपने आप या सामान्य तरीके से अलग होने में बाधा उत्पन्न करती है, जिससे भारी रक्तस्राव और अन्य जटिलताएं हो सकती हैं।
प्लेसेंटा एक्रीटा के प्रकार
गहराई के आधार पर इस स्थिति को तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा जाता है:
1. प्लेसेंटा एक्रीटा (Placenta Accreta) इसमें प्लेसेंटा की जड़ें गर्भाशय की मांसपेशीय परत की सतह से जुड़ जाती हैं, लेकिन पूरी गहराई तक प्रवेश नहीं करतीं। यह सबसे सामान्य और अपेक्षाकृत कम गंभीर रूप है, जो लगभग 75-80% मामलों में देखा जाता है।
2. प्लेसेंटा इनक्रीटा (Placenta Increta) इसमें प्लेसेंटा गर्भाशय की मांसपेशीय दीवार में और अधिक गहराई तक प्रवेश कर जाता है। यह मध्यम गंभीरता की स्थिति मानी जाती है।
3. प्लेसेंटा पर्क्रीटा (Placenta Percreta) यह सबसे गंभीर रूप है, जिसमें प्लेसेंटा गर्भाशय की पूरी दीवार को पार करके बाहरी सतह तक पहुंच जाता है और कभी-कभी मूत्राशय (Bladder) या आंतों जैसे आसपास के अंगों तक भी फैल सकता है। इस स्थिति में सर्जरी अत्यंत जटिल हो जाती है।
प्लेसेंटा एक्रीटा के कारण और जोखिम कारक
इस स्थिति का सटीक कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन कई कारक इसके जोखिम को बढ़ाते हैं:
- पूर्व में सिजेरियन डिलीवरी: यह सबसे बड़ा जोखिम कारक है। जितनी अधिक बार सिजेरियन हुआ हो, जोखिम उतना ही अधिक बढ़ जाता है, क्योंकि गर्भाशय पर बना निशान (स्कार टिश्यू) प्लेसेंटा के असामान्य जुड़ाव को बढ़ावा देता है।
- प्लेसेंटा प्रीविया: जब प्लेसेंटा गर्भाशय के निचले हिस्से में, गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) के पास या उसे ढककर स्थित हो, तो एक्रीटा का खतरा काफी बढ़ जाता है।
- गर्भाशय की पूर्व सर्जरी: फाइब्रॉएड हटाने की सर्जरी, डाइलेशन एंड क्यूरेटेज (D&C), या गर्भाशय से जुड़ी अन्य सर्जरी भी जोखिम बढ़ा सकती हैं।
- अधिक आयु में गर्भधारण: 35 वर्ष से अधिक उम्र में गर्भधारण करने वाली महिलाओं में जोखिम अधिक पाया गया है।
- एकाधिक गर्भधारण: पहले कई बार गर्भधारण कर चुकी महिलाओं में भी यह जोखिम बढ़ जाता है।
- इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF): कुछ अध्ययनों के अनुसार IVF के माध्यम से हुई गर्भावस्था में भी यह जोखिम थोड़ा अधिक हो सकता है।
लक्षण
प्लेसेंटा एक्रीटा की सबसे चिंताजनक बात यह है कि गर्भावस्था के दौरान इसके स्पष्ट लक्षण प्रायः नहीं दिखते। अधिकांश मामलों की पहचान नियमित अल्ट्रासाउंड जांच के दौरान ही हो पाती है। हालांकि, कुछ महिलाओं में तीसरी तिमाही के दौरान योनि से रक्तस्राव हो सकता है, जो एक चेतावनी संकेत माना जाता है। इसके अलावा, यदि प्लेसेंटा प्रीविया की स्थिति पहले से मौजूद हो, तो डॉक्टर एक्रीटा की संभावना को लेकर अतिरिक्त सतर्कता बरतते हैं।
असली और सबसे गंभीर लक्षण आमतौर पर प्रसव के समय ही सामने आता है — जब प्लेसेंटा प्रसव के बाद सामान्य रूप से अलग नहीं होता और भारी रक्तस्राव शुरू हो जाता है।
निदान (Diagnosis)
समय रहते निदान होने से जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए मुख्यतः निम्नलिखित जांचों का उपयोग किया जाता है:
- अल्ट्रासाउंड (Ultrasound): यह सबसे सामान्य और पहली जांच है। दूसरी और तीसरी तिमाही के अल्ट्रासाउंड में डॉक्टर प्लेसेंटा और गर्भाशय की दीवार के बीच के संबंध को ध्यान से देखते हैं। रंगीन डॉप्लर (Color Doppler) अल्ट्रासाउंड रक्त प्रवाह के असामान्य पैटर्न को पहचानने में सहायक होता है।
- एमआरआई (MRI): जब अल्ट्रासाउंड से स्पष्ट जानकारी न मिल पाए, विशेषकर प्लेसेंटा पर्क्रीटा की आशंका में, या यह जानने के लिए कि प्लेसेंटा आसपास के अंगों तक तो नहीं फैला, तब MRI की सलाह दी जाती है।
- जोखिम कारकों का आकलन: पिछली सिजेरियन डिलीवरी या गर्भाशय सर्जरी का इतिहास होने पर डॉक्टर शुरू से ही अधिक सतर्कता के साथ निगरानी करते हैं।
संभावित जटिलताएं
यदि प्लेसेंटा एक्रीटा का समय पर निदान और उचित प्रबंधन न किया जाए, तो निम्नलिखित गंभीर जटिलताएं हो सकती हैं:
- अत्यधिक प्रसवोत्तर रक्तस्राव (Postpartum Hemorrhage): यह सबसे बड़ा और जानलेवा खतरा है, जिसके लिए कई बार रक्त चढ़ाने (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) की आवश्यकता पड़ती है।
- गर्भाशय को क्षति: गंभीर मामलों में गर्भाशय को बचाना मुश्किल हो सकता है।
- आसपास के अंगों को नुकसान: विशेषकर प्लेसेंटा पर्क्रीटा में मूत्राशय या आंतों को क्षति पहुंचने का खतरा रहता है।
- समय-पूर्व प्रसव: कई बार रक्तस्राव के जोखिम के कारण डॉक्टर निर्धारित समय से पहले ही प्रसव कराने का निर्णय लेते हैं।
- मातृ मृत्यु का जोखिम: उचित चिकित्सा सुविधा और अनुभवी टीम के अभाव में यह स्थिति माँ की जान के लिए खतरा बन सकती है।
उपचार और प्रबंधन
प्लेसेंटा एक्रीटा का कोई ऐसा उपचार नहीं है जो इसे गर्भावस्था के दौरान “ठीक” कर सके। इसका प्रबंधन मुख्यतः प्रसव की सुरक्षित योजना बनाने पर केंद्रित होता है:
1. मल्टीडिसिप्लिनरी टीम द्वारा योजना निदान होने के बाद प्रसूति रोग विशेषज्ञ, एनेस्थीसिया विशेषज्ञ, यूरोलॉजिस्ट और नवजात शिशु विशेषज्ञों की एक समन्वित टीम मिलकर प्रसव की योजना बनाती है। यह प्रसव किसी बड़े और सुसज्जित अस्पताल में कराने की सलाह दी जाती है, जहां रक्त बैंक और गहन चिकित्सा इकाई (ICU) जैसी सुविधाएं उपलब्ध हों।
2. निर्धारित सिजेरियन प्रसव अधिकांश मामलों में डॉक्टर गर्भावस्था के 34वें से 37वें सप्ताह के बीच योजनाबद्ध सिजेरियन प्रसव कराने की सलाह देते हैं, ताकि आपातकालीन स्थिति से बचा जा सके।
3. गर्भाशय को निकालना (Hysterectomy) अधिकतर गंभीर मामलों में, प्रसव के तुरंत बाद गर्भाशय को निकालना ही सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है, क्योंकि प्लेसेंटा को जबरन अलग करने की कोशिश से भारी रक्तस्राव हो सकता है। यह एक बड़ा निर्णय है, विशेषकर उन महिलाओं के लिए जो भविष्य में और बच्चे चाहती हैं, इसलिए डॉक्टर मरीज़ से पहले ही इस संभावना पर विस्तार से चर्चा करते हैं।
4. कंज़र्वेटिव (गर्भाशय-संरक्षी) प्रबंधन कुछ चुनिंदा मामलों में, जहां महिला भविष्य में गर्भधारण करना चाहती है, अनुभवी विशेषज्ञों की देखरेख में प्लेसेंटा को गर्भाशय में ही छोड़ने और धीरे-धीरे उसके अवशोषित होने की प्रतीक्षा करने जैसे विकल्प भी अपनाए जाते हैं। हालांकि यह तरीका जोखिमों से खाली नहीं है और सभी मामलों में उपयुक्त नहीं होता।
5. रक्त की उपलब्धता सुनिश्चित करना प्रसव से पहले ही पर्याप्त मात्रा में रक्त और रक्त उत्पादों की व्यवस्था कर ली जाती है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर तुरंत ट्रांसफ्यूजन किया जा सके।
सावधानियां और निगरानी
जिन महिलाओं में प्लेसेंटा एक्रीटा के जोखिम कारक मौजूद हों (जैसे पूर्व सिजेरियन या प्लेसेंटा प्रीविया), उन्हें निम्नलिखित सावधानियां बरतनी चाहिए:
- नियमित प्रसवपूर्व जांच (Antenatal Checkups) कभी न छोड़ें।
- डॉक्टर द्वारा सुझाए गए सभी अल्ट्रासाउंड और आवश्यक जांचें समय पर कराएं।
- योनि से किसी भी प्रकार का रक्तस्राव होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
- प्रसव किसी ऐसे अस्पताल में कराने की योजना बनाएं जहां उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं के प्रबंधन की सुविधा और अनुभव मौजूद हो।
- मानसिक रूप से तैयार रहें और डॉक्टर से गर्भाशय निकालने की संभावना सहित सभी विकल्पों पर खुलकर बातचीत करें।
निष्कर्ष
प्लेसेंटा एक्रीटा एक गंभीर लेकिन प्रबंधनीय (मैनेजेबल) प्रसूति जटिलता है, बशर्ते इसका निदान समय रहते हो जाए। आधुनिक अल्ट्रासाउंड तकनीक और अनुभवी चिकित्सा टीमों की मदद से आज इस स्थिति को गर्भावस्था के दौरान ही पहचाना जा सकता है, जिससे प्रसव की सुरक्षित योजना बनाई जा सकती है। पूर्व में सिजेरियन डिलीवरी या प्लेसेंटा प्रीविया जैसी स्थितियों का इतिहास रखने वाली महिलाओं को अपनी गर्भावस्था के दौरान विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए और नियमित जांच के माध्यम से डॉक्टर के संपर्क में रहना चाहिए। सही समय पर सही निर्णय और उचित चिकित्सा सुविधा माँ और शिशु दोनों की जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
