लेबिरिंथाइटिस (Labyrinthitis): आंतरिक कान की सूजन और चक्कर
परिचय
अचानक ऐसा लगे कि पूरा कमरा घूम रहा है, ज़मीन पैरों के नीचे से खिसक रही है, जी मिचला रहा है और एक कान से सुनाई कम दे रहा है — यह अनुभव डरावना होता है। बहुत से लोग इसे “कमज़ोरी”, “गैस” या “ब्लड प्रेशर” समझकर टाल देते हैं, जबकि इसका कारण अक्सर आंतरिक कान में होने वाली सूजन होती है, जिसे चिकित्सा भाषा में लेबिरिंथाइटिस कहा जाता है।
लेबिरिंथाइटिस कोई दुर्लभ बीमारी नहीं है। यह आमतौर पर किसी वायरल संक्रमण के बाद होती है, कुछ दिनों तक बहुत तकलीफ़ देती है और फिर धीरे-धीरे ठीक हो जाती है। लेकिन कुछ मामलों में यह स्थायी सुनने की हानि छोड़ सकती है, और कुछ मामलों में इसके जैसे दिखने वाले लक्षण असल में ब्रेन स्ट्रोक के हो सकते हैं। इसीलिए इस स्थिति को समझना ज़रूरी है।
आंतरिक कान और “लेबिरिंथ” क्या है?
हमारा कान सिर्फ़ सुनने का अंग नहीं है — यह शरीर का संतुलन-तंत्र भी है। आंतरिक कान के भीतर द्रव से भरी नलिकाओं और कक्षों की एक जटिल संरचना होती है, जो भूल-भुलैया जैसी दिखने के कारण “लेबिरिंथ” (भूलभुलैया) कहलाती है। इसके दो मुख्य हिस्से होते हैं:
- कॉक्लिया (Cochlia) — घोंघे के आकार का भाग, जो ध्वनि तरंगों को तंत्रिका संकेतों में बदलता है।
- वेस्टिबुलर तंत्र (Vestibular system) — तीन अर्धवृत्ताकार नलिकाएँ और दो थैलियाँ, जो सिर की गति, दिशा और गुरुत्वाकर्षण को भाँपकर मस्तिष्क को संतुलन की जानकारी भेजती हैं।
जब इस पूरे लेबिरिंथ में सूजन आ जाती है, तो सुनने और संतुलन — दोनों कार्य एक साथ प्रभावित होते हैं। यही लेबिरिंथाइटिस है।
लेबिरिंथाइटिस के कारण
वायरल संक्रमण — यह सबसे आम कारण है। अक्सर सर्दी-ज़ुकाम, गले के संक्रमण या फ्लू के एक-दो सप्ताह बाद यह समस्या शुरू होती है। हर्पीज़ वायरस, इन्फ्लुएंज़ा, खसरा, कण्ठमाला (मम्प्स) और साइटोमेगालोवायरस जैसे वायरस इसके लिए ज़िम्मेदार पाए गए हैं।
बैक्टीरियल संक्रमण — यह कम आम लेकिन अधिक गंभीर रूप है। मध्य कान का लंबे समय से चला आ रहा संक्रमण (क्रॉनिक ओटाइटिस मीडिया), कोलेस्टीटोमा या मेनिन्जाइटिस से बैक्टीरिया आंतरिक कान तक पहुँच सकते हैं। इसे सपुरेटिव लेबिरिंथाइटिस कहते हैं और इसमें स्थायी बहरेपन का ख़तरा काफ़ी अधिक होता है।
अन्य कारण — सिर या कान की चोट, कान की सर्जरी की जटिलता, कुछ ऑटोइम्यून बीमारियाँ (जिनमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अपने ही आंतरिक कान पर हमला करती है), एलर्जी, और कुछ दवाओं का विषैला प्रभाव भी लेबिरिंथ को नुकसान पहुँचा सकता है।
मुख्य लक्षण
लेबिरिंथाइटिस के लक्षण आमतौर पर अचानक शुरू होते हैं और पहले 24 से 48 घंटों में सबसे तीव्र होते हैं:
- वर्टिगो (चक्कर) — सबसे प्रमुख लक्षण। ऐसा महसूस होना कि आसपास की चीज़ें घूम रही हैं। सिर हिलाने या करवट बदलने पर यह और बढ़ जाता है।
- जी मिचलाना और उल्टी — चक्कर के साथ लगभग हमेशा मौजूद।
- सुनने में कमी — आमतौर पर एक ही कान में। यही लक्षण लेबिरिंथाइटिस को अन्य कई चक्कर-संबंधी बीमारियों से अलग करता है।
- टिनिटस — कान में सीटी, भनभनाहट या घंटी जैसी आवाज़ का बजना।
- संतुलन बिगड़ना — चलते समय एक तरफ़ झुक जाना, अस्थिरता महसूस होना।
- निस्टैग्मस — आँखों की अनैच्छिक, झटकेदार गति, जिसे डॉक्टर जाँच के दौरान देखते हैं।
- कान में भारीपन या भरा-भरा लगना।
कई मरीज़ों में तेज़ चक्कर वाला चरण कुछ दिनों में शांत हो जाता है, लेकिन हल्की अस्थिरता और “सिर भारी लगना” कई हफ़्तों तक बना रह सकता है।
लेबिरिंथाइटिस और वेस्टिबुलर न्यूराइटिस में अंतर
इन दोनों को अक्सर एक-दूसरे के लिए इस्तेमाल कर लिया जाता है, पर अंतर सरल है। वेस्टिबुलर न्यूराइटिस में केवल संतुलन वाली तंत्रिका प्रभावित होती है, इसलिए चक्कर तो आता है पर सुनने पर असर नहीं पड़ता। लेबिरिंथाइटिस में कॉक्लिया भी शामिल होती है, इसलिए चक्कर के साथ-साथ सुनने में कमी और टिनिटस भी होता है। इलाज का तरीक़ा काफ़ी हद तक एक जैसा है, पर सुनने की हानि होने पर तुरंत विशेषज्ञ की ज़रूरत पड़ती है।
कब तुरंत डॉक्टर के पास जाएँ
चक्कर के कुछ मामले आपातकालीन होते हैं। नीचे दिए लक्षण दिखें तो देर न करें:
- बहुत तेज़ सिरदर्द या गर्दन में अकड़न के साथ बुखार
- दोहरा दिखना, बोलने में लड़खड़ाहट, चेहरे या शरीर के एक हिस्से में कमज़ोरी या सुन्नपन
- चलने में पूरी तरह असमर्थता, बार-बार गिरना
- बेहोशी, भ्रम की स्थिति या दौरे
- अचानक, गंभीर रूप से सुनाई देना बंद हो जाना
ये लक्षण स्ट्रोक, मेनिन्जाइटिस या अचानक होने वाली सेंसोरिन्यूरल बहरापन की ओर संकेत कर सकते हैं। अचानक सुनने की हानि में शुरुआती 72 घंटे बेहद क़ीमती होते हैं — समय पर इलाज से सुनने की क्षमता बचाई जा सकती है।
निदान कैसे होता है
डॉक्टर सबसे पहले विस्तृत इतिहास लेते हैं — चक्कर कब शुरू हुआ, कितनी देर रहता है, हाल में कोई संक्रमण या कान बहने की शिकायत थी या नहीं। इसके बाद:
- शारीरिक जाँच — ओटोस्कोप से कान के परदे की जाँच, आँखों की गति (निस्टैग्मस) का परीक्षण, चाल और संतुलन की जाँच। कई विशेषज्ञ बिस्तर के पास ही किया जाने वाला “HINTS” परीक्षण करते हैं, जो आंतरिक कान की समस्या और मस्तिष्क की समस्या में फ़र्क़ करने में मदद करता है।
- ऑडियोमेट्री — सुनने की क्षमता को नापने वाली जाँच।
- वेस्टिबुलर परीक्षण — वीएनजी/ईएनजी, कैलोरिक टेस्ट आदि।
- इमेजिंग — यदि स्ट्रोक, ट्यूमर या हड्डी के क्षरण का संदेह हो तो एमआरआई या सीटी स्कैन।
- रक्त परीक्षण — संक्रमण, ऑटोइम्यून बीमारी या थायरॉइड संबंधी कारण खोजने के लिए।
उपचार
लक्षणों से राहत — तीव्र चरण में चक्कर और उल्टी को नियंत्रित करने के लिए वेस्टिबुलर सप्रेसेंट और उल्टी-रोधी दवाएँ दी जाती हैं। ध्यान रखने योग्य ज़रूरी बात यह है कि ये दवाएँ केवल कुछ दिनों (आमतौर पर दो-तीन दिन) के लिए होती हैं। लंबे समय तक इनका सेवन मस्तिष्क की प्राकृतिक अनुकूलन प्रक्रिया को धीमा कर देता है और रिकवरी लंबी खिंच जाती है।
स्टेरॉयड — सूजन घटाने और सुनने की क्षमता बचाने के लिए डॉक्टर कोर्टिकोस्टेरॉयड दे सकते हैं, विशेषकर जब सुनने में कमी हो।
एंटीबायोटिक — केवल बैक्टीरियल कारण होने पर। वायरल लेबिरिंथाइटिस में एंटीबायोटिक बेअसर होती है।
वेस्टिबुलर रिहैबिलिटेशन थेरेपी (VRT) — यह उपचार की रीढ़ है। इसमें आँख, सिर और शरीर की विशेष कसरतें कराई जाती हैं, जिनसे मस्तिष्क आंतरिक कान से आने वाले कमज़ोर संकेतों की भरपाई करना सीख लेता है। तीव्र चरण बीतने के बाद जितनी जल्दी ये कसरतें शुरू हों, उतनी तेज़ रिकवरी होती है।
तरल पदार्थ और आराम — उल्टी के कारण निर्जलीकरण न हो, इसके लिए पर्याप्त पानी और तरल ज़रूरी है।
घरेलू देखभाल और सावधानियाँ
- चक्कर के दौरान बैठ या लेट जाएँ; अचानक उठने से बचें।
- रात में कमरे में हल्की रोशनी रखें, ताकि अंधेरे में संतुलन बिगड़े नहीं।
- सिर को अचानक झटके से न घुमाएँ; करवट धीरे-धीरे बदलें।
- चक्कर रहने तक गाड़ी चलाना, सीढ़ी चढ़ना, मशीन चलाना या तैरना पूरी तरह बंद रखें।
- तेज़ रोशनी, चमकती स्क्रीन और भीड़भाड़ वाली जगहें शुरुआती दिनों में लक्षण बढ़ा सकती हैं।
- शराब, तंबाकू, कैफ़ीन और अधिक नमक से परहेज़ करें।
- तनाव, नींद की कमी और थकान लक्षणों को बढ़ाते हैं — नींद पूरी लें।
- बुज़ुर्गों के लिए घर में फिसलन वाली सतह, ढीली दरी और अंधेरी सीढ़ियाँ गिरने का बड़ा ख़तरा हैं; इन्हें ठीक कराएँ।
संभावित जटिलताएँ
अधिकतर वायरल मामलों में पूरी रिकवरी हो जाती है। लेकिन कुछ स्थितियों में स्थायी आंशिक बहरापन, लगातार टिनिटस, या लंबे समय तक चलने वाली अस्थिरता रह सकती है। बैक्टीरियल लेबिरिंथाइटिस में संक्रमण के फैलने और मेनिन्जाइटिस का जोखिम रहता है, इसलिए इसे कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए। कुछ लोगों में बार-बार चक्कर का डर चिंता और घर से बाहर निकलने में झिझक पैदा कर देता है — ऐसे में परामर्श और नियमित वेस्टिबुलर व्यायाम बहुत मदद करते हैं।
रोकथाम
लेबिरिंथाइटिस को पूरी तरह रोकना संभव नहीं, पर जोखिम कम किया जा सकता है: कान के संक्रमण का समय पर और पूरा इलाज कराएँ, कान बहने की शिकायत को नज़रअंदाज़ न करें, कान में तेल, तिनका या ईयरबड डालने से बचें, खसरा-कण्ठमाला और इन्फ्लुएंज़ा के टीके लगवाएँ, हाथ धोने की आदत बनाए रखें, और तेज़ आवाज़ वाले वातावरण में कान की सुरक्षा का ध्यान रखें।
निष्कर्ष
लेबिरिंथाइटिस तकलीफ़देह ज़रूर है, पर ज़्यादातर मामलों में यह अस्थायी होती है और सही देखभाल से कुछ हफ़्तों में सुधार आ जाता है। असली समझदारी दो बातों में है — पहला, चक्कर को “मामूली कमज़ोरी” मानकर टालना नहीं, ख़ासकर जब साथ में सुनाई कम दे रहा हो; और दूसरा, तीव्र चरण बीतने के बाद दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय संतुलन की कसरतों को अपनाना, क्योंकि असली रिकवरी मस्तिष्क के दोबारा सीखने से आती है।
