सीवियर कंबाइंड इम्यूनोडेफिशिएंसी (SCID) — “बबल बॉय डिजीज”
परिचय
सीवियर कंबाइंड इम्यूनोडेफिशिएंसी, जिसे संक्षेप में SCID कहा जाता है, एक अत्यंत दुर्लभ लेकिन जानलेवा आनुवंशिक (जेनेटिक) रोग है, जिसमें शिशु की प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) जन्म से ही ठीक तरह से विकसित नहीं हो पाती। इस रोग में शरीर की दो सबसे महत्वपूर्ण रक्षा-कोशिकाएं — टी-लिम्फोसाइट्स (T-cells) और बी-लिम्फोसाइट्स (B-cells) — या तो बनती ही नहीं हैं, या बनती हैं तो सही ढंग से काम नहीं करतीं। नतीजा यह होता है कि बच्चे का शरीर बैक्टीरिया, वायरस और फंगस जैसे सामान्य कीटाणुओं से भी लड़ नहीं पाता, जो सामान्य बच्चों के लिए बिल्कुल भी खतरनाक नहीं होते।
इस बीमारी को आम बोलचाल की भाषा में “बबल बॉय डिजीज” (Bubble Boy Disease) के नाम से जाना जाता है। यह नाम 1970 और 1980 के दशक में अमेरिका के टेक्सास में जन्मे डेविड वेटर (David Vetter) नामक बच्चे की कहानी से जुड़ा है, जिसे SCID के कारण जन्म के तुरंत बाद एक विशेष रोगाणु-रहित (जर्म-फ्री) प्लास्टिक के बुलबुले (बबल) जैसे वातावरण में रखा गया था, ताकि वह संक्रमण से सुरक्षित रह सके। डेविड लगभग 12 वर्ष तक इसी सुरक्षा-कवच में जीवित रहा और उसकी कहानी ने पूरी दुनिया का ध्यान इस दुर्लभ बीमारी की ओर खींचा।
SCID क्यों होता है — कारण
SCID मुख्य रूप से एक आनुवंशिक विकार है, यानी यह माता-पिता से बच्चे में जीन के माध्यम से आता है। हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को सही ढंग से काम करने के लिए कई जीन मिलकर सटीक निर्देश देते हैं। जब इनमें से किसी महत्वपूर्ण जीन में उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) हो जाता है, तो टी-कोशिकाओं का निर्माण रुक जाता है या बहुत कम मात्रा में होता है। चूंकि टी-कोशिकाएं ही बी-कोशिकाओं को सक्रिय करने और एंटीबॉडी बनवाने में मदद करती हैं, इसलिए इनकी कमी से पूरी प्रतिरक्षा प्रणाली ही ठप पड़ जाती है — इसीलिए इसे “कंबाइंड” (संयुक्त) इम्यूनोडेफिशिएंसी कहा जाता है, क्योंकि इसमें प्रतिरक्षा प्रणाली के एक से अधिक अंग प्रभावित होते हैं।
SCID के अलग-अलग आनुवंशिक प्रकार होते हैं, जिनमें सबसे सामान्य है:
- X-लिंक्ड SCID — यह सबसे आम प्रकार है और यह X गुणसूत्र (X-chromosome) पर मौजूद IL2RG नामक जीन में गड़बड़ी के कारण होता है। चूंकि यह X-लिंक्ड होता है, इसलिए यह मुख्य रूप से लड़कों को प्रभावित करता है, जबकि महिलाएं इसकी वाहक (कैरियर) होती हैं।
- ADA-SCID (एडेनोसिन डिएमिनेज़ की कमी) — इसमें ADA नामक एंजाइम की कमी हो जाती है, जिसके कारण शरीर में विषैले पदार्थ जमा होकर लिम्फोसाइट्स को नष्ट कर देते हैं।
- JAK3, RAG1/RAG2, IL7R जैसे अन्य जीनों में उत्परिवर्तन से भी SCID के अलग-अलग रूप हो सकते हैं।
अधिकतर मामलों में यह रोग ऑटोसोमल रिसेसिव (माता-पिता दोनों से एक-एक दोषपूर्ण जीन मिलने पर) या X-लिंक्ड रिसेसिव तरीके से फैलता है। इसलिए जिन परिवारों में सगे-संबंधियों में विवाह (कंसैंग्विनियस मैरिज) होते हैं, वहां इस बीमारी की संभावना अपेक्षाकृत अधिक देखी जाती है।
लक्षण
SCID के लक्षण आमतौर पर जन्म के कुछ ही महीनों के भीतर दिखने लगते हैं, क्योंकि जब तक बच्चा मां से मिली एंटीबॉडी के सहारे सुरक्षित रहता है, तब तक बीमारी छिपी रहती है। लगभग 3 से 6 महीने की उम्र के बाद जब यह सुरक्षा-कवच कमजोर पड़ता है, तो लक्षण उभरने लगते हैं:
- बार-बार होने वाले गंभीर संक्रमण — निमोनिया, कान का संक्रमण, त्वचा में फोड़े-फुंसी
- लगातार दस्त (डायरिया) और उसके कारण वजन न बढ़ना या वजन घटना
- सामान्य टीकाकरण (विशेषकर जीवित वायरस वाले टीकों) के बाद गंभीर प्रतिक्रिया
- फेफड़ों में बार-बार संक्रमण जो सामान्य एंटीबायोटिक से ठीक न हो
- मुंह और त्वचा पर फंगल संक्रमण (जैसे ओरल थ्रश) जो बार-बार लौट आए
- शारीरिक विकास में देरी (फेल्योर टू थ्राइव)
यदि समय पर पहचान और इलाज न हो, तो यह संक्रमण जानलेवा साबित हो सकते हैं, क्योंकि बच्चे का शरीर उनसे लड़ने में पूरी तरह असमर्थ होता है।
निदान (डायग्नोसिस)
आज के समय में SCID की पहचान पहले से कहीं अधिक आसान हो गई है, क्योंकि कई देशों में नवजात शिशु स्क्रीनिंग (Newborn Screening) कार्यक्रमों के अंतर्गत जन्म के तुरंत बाद ही खून की एक बूंद से इस बीमारी की जांच की जाने लगी है। इस जांच में TREC (T-cell Receptor Excision Circles) नामक मार्कर की मात्रा देखी जाती है — यदि यह मात्रा असामान्य रूप से कम हो, तो यह टी-कोशिकाओं की कमी का संकेत देती है।
इसके अतिरिक्त निम्नलिखित जांचें भी की जाती हैं:
- संपूर्ण रक्त गणना (CBC) और लिम्फोसाइट काउंट
- फ्लो साइटोमेट्री द्वारा T, B और NK कोशिकाओं की संख्या और प्रकार का आकलन
- इम्यूनोग्लोबुलिन (एंटीबॉडी) स्तर की जांच
- आनुवंशिक (जेनेटिक) परीक्षण, ताकि यह पता चल सके कि कौन-सा विशिष्ट जीन प्रभावित है
शीघ्र निदान बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि जितनी जल्दी इलाज शुरू होता है, बच्चे के जीवित रहने और स्वस्थ होने की संभावना उतनी ही अधिक बढ़ जाती है।
उपचार
SCID को चिकित्सा जगत में एक “मेडिकल इमरजेंसी” माना जाता है, क्योंकि इलाज में देरी सीधे जीवन के लिए खतरा बन सकती है। इसके प्रमुख उपचार विकल्प निम्नलिखित हैं:
1. हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट (बोन मैरो ट्रांसप्लांट)
यह SCID का सबसे प्रभावी और मानक उपचार माना जाता है। इसमें किसी स्वस्थ दाता (आदर्श रूप से भाई-बहन जिनका HLA टिशू टाइप मेल खाता हो) से स्टेम कोशिकाएं लेकर बच्चे में प्रत्यारोपित की जाती हैं। ये स्वस्थ स्टेम कोशिकाएं धीरे-धीरे एक नई, कार्यशील प्रतिरक्षा प्रणाली विकसित करने में मदद करती हैं। यदि यह ट्रांसप्लांट जीवन के पहले कुछ महीनों में, संक्रमण होने से पहले किया जाए, तो सफलता दर बहुत अधिक (90% से ज़्यादा) होती है।
2. जीन थेरेपी
पिछले कुछ वर्षों में विज्ञान ने एक बड़ी छलांग लगाई है। खासकर ADA-SCID और X-लिंक्ड SCID के कुछ मामलों में, बच्चे की अपनी स्टेम कोशिकाओं को शरीर से निकालकर, प्रयोगशाला में एक सही जीन की प्रतिलिपि उनमें डाली जाती है, और फिर उन्हें वापस बच्चे के शरीर में डाला जाता है। इससे दाता ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ती और अस्वीकृति (रिजेक्शन) का खतरा भी कम हो जाता है। यह तकनीक अभी अपेक्षाकृत नई है, लेकिन इसके नतीजे उत्साहजनक रहे हैं।
3. एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी
ADA-SCID के मामलों में, जब तक ट्रांसप्लांट या जीन थेरेपी की व्यवस्था नहीं हो पाती, तब तक PEG-ADA नामक इंजेक्शन के माध्यम से कमी वाले एंजाइम की आपूर्ति की जाती है। यह एक अस्थायी उपाय है, स्थायी इलाज नहीं।
4. सहायक उपचार
निदान के बाद इलाज पूरा होने तक बच्चे को संक्रमण से बचाने के लिए कड़े सावधानी उपाय अपनाए जाते हैं:
- बच्चे को रोगाणु-रहित (आइसोलेशन) वातावरण में रखना
- एंटीबायोटिक, एंटीफंगल और एंटीवायरल दवाओं का निवारक (प्रिवेंटिव) उपयोग
- इम्यूनोग्लोबुलिन (IVIG) का नियमित इंजेक्शन देना
- जीवित वायरस वाले टीके (जैसे MMR, BCG) पूरी तरह वर्जित रखना
डेविड वेटर की कहानी — “असली बबल बॉय”
डेविड वेटर का जन्म 1971 में हुआ था। उनके परिवार में पहले ही एक बच्चे की SCID से मृत्यु हो चुकी थी, इसलिए डॉक्टरों ने जन्म से पहले ही योजना बना ली थी कि जन्म लेते ही उसे एक विशेष प्लास्टिक बबल में रखा जाएगा। डेविड ने अपने जीवन के लगभग 12 वर्ष इसी सुरक्षित, कीटाणु-रहित वातावरण में बिताए। 1983 में उसे बोन मैरो ट्रांसप्लांट दिया गया, लेकिन दुर्भाग्यवश दाता (उसकी बहन) के मैरो में एक अज्ञात वायरस मौजूद था, जिससे डेविड को कैंसर हो गया और कुछ महीनों बाद उसकी मृत्यु हो गई। हालांकि यह कहानी दुखद अंत पर पहुंची, लेकिन इसने SCID पर होने वाले शोध, नवजात स्क्रीनिंग कार्यक्रमों और बेहतर ट्रांसप्लांट तकनीकों के विकास को बहुत गति दी।
पूर्वानुमान (प्रोग्नोसिस)
अगर SCID का इलाज न किया जाए, तो अधिकांश बच्चे जीवन के पहले 1-2 वर्षों के भीतर गंभीर संक्रमण के कारण मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। लेकिन यदि नवजात स्क्रीनिंग के माध्यम से जल्दी पहचान हो जाए और संक्रमण होने से पहले ही स्टेम सेल ट्रांसप्लांट या जीन थेरेपी कर दी जाए, तो बच्चे पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। यही कारण है कि आज दुनिया भर के कई देशों में जन्म के तुरंत बाद SCID की जांच अनिवार्य कर दी गई है।
निष्कर्ष
सीवियर कंबाइंड इम्यूनोडेफिशिएंसी भले ही एक अत्यंत दुर्लभ बीमारी हो, लेकिन इसकी गंभीरता और समय रहते इलाज की आवश्यकता इसे चिकित्सा विज्ञान की एक महत्वपूर्ण चुनौती बनाती है। बीते कुछ दशकों में हुए शोध — विशेषकर जीन थेरेपी और नवजात स्क्रीनिंग के क्षेत्र में — ने इस बीमारी से पीड़ित बच्चों के लिए उम्मीद की नई किरण जगाई है। डेविड वेटर जैसे बच्चों की कहानियां हमें याद दिलाती हैं कि विज्ञान की प्रगति कितनी महत्वपूर्ण है, और यह भी कि समय पर सही निदान किसी भी बच्चे के जीवन को कैसे बचा सकता है।
