पोस्टपार्टम हैमरेज (प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव)
परिचय
पोस्टपार्टम हैमरेज (Postpartum Hemorrhage – PPH) एक ऐसी गंभीर चिकित्सीय स्थिति है जिसमें बच्चे के जन्म के बाद माँ को अत्यधिक मात्रा में रक्तस्राव होता है। यह प्रसूति (obstetrics) से जुड़ी सबसे गंभीर और जानलेवा जटिलताओं में से एक मानी जाती है। दुनियाभर में मातृ मृत्यु दर के प्रमुख कारणों में पोस्टपार्टम हैमरेज सबसे ऊपर आता है, विशेष रूप से विकासशील देशों में जहाँ समय पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाती।
सामान्य प्रसव के बाद कुछ मात्रा में रक्तस्राव होना स्वाभाविक है, क्योंकि गर्भाशय की भीतरी दीवार से प्लेसेंटा (नाल) अलग होने के कारण रक्त वाहिकाएँ खुली रह जाती हैं। लेकिन जब यह रक्तस्राव सामान्य सीमा से अधिक हो जाए, तो इसे पोस्टपार्टम हैमरेज कहा जाता है।
पोस्टपार्टम हैमरेज की परिभाषा
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, यदि सामान्य योनि प्रसव (vaginal delivery) के बाद 500 मिलीलीटर से अधिक रक्तस्राव हो, या सिजेरियन प्रसव (C-section) के बाद 1000 मिलीलीटर से अधिक रक्तस्राव हो, तो इसे पोस्टपार्टम हैमरेज माना जाता है। इसे दो श्रेणियों में बाँटा जाता है:
1. प्राइमरी (प्रारंभिक) पोस्टपार्टम हैमरेज – यह प्रसव के 24 घंटों के भीतर होता है और सबसे अधिक सामान्य तथा खतरनाक होता है।
2. सेकेंडरी (विलंबित) पोस्टपार्टम हैमरेज – यह प्रसव के 24 घंटे बाद से लेकर 6 सप्ताह तक कभी भी हो सकता है। यह आमतौर पर गर्भाशय में संक्रमण या प्लेसेंटा के अवशेष रह जाने के कारण होता है।
पोस्टपार्टम हैमरेज के कारण
चिकित्सा भाषा में इसके कारणों को समझने के लिए “4 T” सिद्धांत का उपयोग किया जाता है:
1. टोन (Tone) – गर्भाशय का शिथिल होना
यह पोस्टपार्टम हैमरेज का सबसे सामान्य कारण है, जो लगभग 70% मामलों के लिए जिम्मेदार होता है। प्रसव के बाद गर्भाशय को सिकुड़कर छोटा होना चाहिए ताकि रक्त वाहिकाएँ बंद हो सकें। जब गर्भाशय ठीक से सिकुड़ नहीं पाता (इसे यूटेराइन एटोनी कहते हैं), तो रक्तस्राव रुक नहीं पाता। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं जैसे लंबे समय तक चला प्रसव, गर्भाशय का अत्यधिक फैलाव (जुड़वाँ बच्चे या अधिक एमनियोटिक द्रव के कारण), या कई बार प्रसव हो चुकना।
2. ट्रॉमा (Trauma) – चोट या फटन
प्रसव के दौरान योनि, गर्भाशय ग्रीवा (cervix), या गर्भाशय में चोट लग सकती है। कभी-कभी संदंश (forceps) या वैक्यूम की सहायता से प्रसव कराने पर भी चोट लगने की संभावना बढ़ जाती है। गर्भाशय का फट जाना (uterine rupture) एक अत्यंत गंभीर स्थिति है, विशेषकर उन महिलाओं में जिनका पहले सिजेरियन हो चुका हो।
3. टिशू (Tissue) – प्लेसेंटा का अवशेष रहना
यदि प्रसव के बाद प्लेसेंटा का कोई हिस्सा गर्भाशय में रह जाता है, तो गर्भाशय पूरी तरह सिकुड़ नहीं पाता और रक्तस्राव जारी रहता है। इसे प्लेसेंटा का अधूरा निष्कासन कहा जाता है।
4. थ्रोम्बिन (Thrombin) – रक्त का थक्का न जमना
कुछ महिलाओं में रक्त के थक्के जमने से संबंधित विकार होते हैं, जैसे हीमोफीलिया या अन्य रक्त संबंधी बीमारियाँ, जिनकी वजह से रक्तस्राव को रोकना मुश्किल हो जाता है।
जोखिम कारक (Risk Factors)
कुछ स्थितियाँ पोस्टपार्टम हैमरेज के खतरे को बढ़ा देती हैं:
- लंबे समय तक चलने वाला या तेज़ी से होने वाला प्रसव
- एक से अधिक बार गर्भधारण (जुड़वाँ या तीन बच्चे)
- प्लेसेंटा प्रीविया (प्लेसेंटा का गर्भाशय ग्रीवा के पास होना)
- प्लेसेंटा एक्रीटा (प्लेसेंटा का गर्भाशय की दीवार में गहराई तक जुड़ जाना)
- पहले भी पोस्टपार्टम हैमरेज हो चुका होना
- गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप (प्री-एक्लेम्पसिया)
- मोटापा
- अधिक उम्र में गर्भधारण
- सिजेरियन प्रसव
- रक्त की कमी (एनीमिया) पहले से होना
- संदंश या वैक्यूम की सहायता से प्रसव
लक्षण और पहचान
पोस्टपार्टम हैमरेज के मुख्य लक्षणों में शामिल हैं:
- योनि से अत्यधिक और लगातार रक्तस्राव
- रक्तचाप का अचानक गिरना
- हृदय गति का तेज़ होना
- चक्कर आना या बेहोशी
- त्वचा का पीला पड़ना और ठंडा पड़ना
- कमजोरी और थकान महसूस होना
- धुंधली दृष्टि
- सांस लेने में तकलीफ
यदि इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो तुरंत चिकित्सीय सहायता लेना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि स्थिति कुछ ही मिनटों में गंभीर हो सकती है।
निदान (Diagnosis)
डॉक्टर सामान्यतः निम्नलिखित तरीकों से पोस्टपार्टम हैमरेज का निदान करते हैं:
- रक्तस्राव की मात्रा का सीधा आकलन
- रक्तचाप और हृदय गति की निगरानी
- गर्भाशय की जाँच करके यह देखना कि वह सिकुड़ा हुआ है या नहीं
- रक्त परीक्षण (हीमोग्लोबिन स्तर और थक्का जमने की क्षमता जाँचने के लिए)
- अल्ट्रासाउंड, ताकि यह पता चल सके कि प्लेसेंटा का कोई हिस्सा गर्भाशय में तो नहीं रह गया
उपचार (Treatment)
पोस्टपार्टम हैमरेज का उपचार कारण और गंभीरता पर निर्भर करता है। सामान्य उपचार विधियाँ इस प्रकार हैं:
दवाइयों द्वारा उपचार
गर्भाशय को सिकोड़ने के लिए ऑक्सीटोसिन, मिसोप्रोस्टोल, या अन्य दवाइयाँ दी जाती हैं ताकि रक्तस्राव नियंत्रित हो सके।
गर्भाशय की मालिश (Uterine Massage)
डॉक्टर या नर्स पेट के ऊपर से गर्भाशय की मालिश करके उसे सिकोड़ने में मदद करते हैं।
रक्त और तरल पदार्थ चढ़ाना
अत्यधिक रक्त की हानि होने पर मरीज को रक्त चढ़ाया जाता है (blood transfusion) और शरीर में तरल पदार्थ की कमी पूरी करने के लिए IV फ्लूइड दिए जाते हैं।
शल्य चिकित्सा (Surgical Intervention)
यदि दवाइयों से रक्तस्राव नियंत्रित नहीं होता, तो निम्नलिखित शल्य प्रक्रियाएँ अपनाई जा सकती हैं:
- गर्भाशय की बैलून टैम्पोनेड (Balloon Tamponade)
- यूटेराइन आर्टरी एम्बोलाइज़ेशन (रक्त वाहिकाओं को अवरुद्ध करना)
- B-Lynch सिवनी (गर्भाशय को सिलकर दबाव बनाना)
- अत्यंत गंभीर मामलों में गर्भाशय को निकालना (हिस्टेरेक्टॉमी), जो अंतिम विकल्प के रूप में अपनाया जाता है
रोकथाम (Prevention)
हालाँकि पोस्टपार्टम हैमरेज को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन कुछ उपायों से इसका जोखिम काफी हद तक कम किया जा सकता है:
- प्रसव के तीसरे चरण का सक्रिय प्रबंधन (Active Management of Third Stage of Labour – AMTSL), जिसमें प्रसव के तुरंत बाद ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन दिया जाता है
- गर्भावस्था के दौरान नियमित जाँच करवाना ताकि जोखिम कारकों की पहचान समय रहते हो सके
- एनीमिया की स्थिति में गर्भावस्था के दौरान ही आयरन और पोषण की उचित व्यवस्था करना
- उच्च जोखिम वाली गर्भवती महिलाओं का प्रसव अच्छी चिकित्सा सुविधाओं वाले अस्पताल में करवाना
- प्रसव के बाद कम से कम पहले कुछ घंटों तक मरीज की सतर्कता से निगरानी करना
पोस्टपार्टम हैमरेज के दुष्प्रभाव
यदि समय पर उपचार न मिले, तो पोस्टपार्टम हैमरेज के गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जिनमें शामिल हैं:
- गंभीर एनीमिया
- सदमा (Shock) की स्थिति
- अंगों की विफलता (जैसे किडनी फेलियर)
- मातृ मृत्यु
- भविष्य में गर्भधारण करने में कठिनाई (यदि हिस्टेरेक्टॉमी करनी पड़े)
- मानसिक तनाव और पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस
निष्कर्ष
पोस्टपार्टम हैमरेज एक गंभीर लेकिन समय पर पहचान और उपचार से नियंत्रित की जा सकने वाली स्थिति है। गर्भावस्था के दौरान नियमित जाँच, प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों की उपस्थिति में प्रसव, और प्रसव के बाद सतर्क निगरानी इस जोखिम को काफी हद तक कम कर सकती है। हर गर्भवती महिला और उसके परिवार को इस स्थिति के लक्षणों और जोखिम कारकों की जानकारी होनी चाहिए, ताकि आवश्यकता पड़ने पर तुरंत चिकित्सीय सहायता ली जा सके। समय पर पहचान और सही उपचार से इस स्थिति से जुड़ी अधिकांश जटिलताओं और मृत्यु दर को रोका जा सकता है।
