रेटिनोब्लास्टोमा (Retinoblastoma - आंखों का कैंसर)
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रेटिनोब्लास्टोमा (Retinoblastoma) — आंखों का कैंसर

परिचय

रेटिनोब्लास्टोमा आंख के पर्दे यानी रेटिना में होने वाला एक दुर्लभ किंतु गंभीर कैंसर है, जो मुख्य रूप से छोटे बच्चों को प्रभावित करता है। यह बचपन में होने वाले आंखों के कैंसर का सबसे सामान्य प्रकार माना जाता है। रेटिना आंख के पिछले हिस्से में स्थित एक संवेदनशील परत होती है, जो प्रकाश को ग्रहण कर उसे मस्तिष्क तक भेजने का कार्य करती है। जब रेटिना की कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं, तो यह स्थिति रेटिनोब्लास्टोमा कहलाती है।

यह बीमारी आमतौर पर पांच साल से कम उम्र के बच्चों में देखी जाती है, और अधिकतर मामलों में इसका पता एक या दो साल की उम्र में ही चल जाता है। यह एक या दोनों आंखों में हो सकता है। समय पर पहचान और उपचार से इस बीमारी को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है, इसलिए इसके लक्षणों और कारणों को समझना बेहद जरूरी है।

रेटिनोब्लास्टोमा के प्रकार

रेटिनोब्लास्टोमा को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है:

1. आनुवंशिक (Hereditary) रेटिनोब्लास्टोमा

इस प्रकार में RB1 नामक जीन में उत्परिवर्तन (mutation) माता-पिता से बच्चे में स्थानांतरित होता है। यह प्रकार आमतौर पर दोनों आंखों को प्रभावित करता है और परिवार में पहले से किसी सदस्य को यह बीमारी हो चुकी होती है। इस प्रकार के मरीजों में भविष्य में अन्य प्रकार के कैंसर होने की संभावना भी अधिक रहती है, इसलिए उन्हें लंबे समय तक नियमित जांच की आवश्यकता होती है।

2. गैर-आनुवंशिक (Non-hereditary/Sporadic) रेटिनोब्लास्टोमा

यह अधिक सामान्य प्रकार है, जिसमें जीन में उत्परिवर्तन बच्चे में अपने आप, बिना किसी पारिवारिक इतिहास के होता है। यह आमतौर पर केवल एक आंख को प्रभावित करता है और इसकी शुरुआत थोड़ी देर से होती है, आमतौर पर दो साल की उम्र के आसपास।

रेटिनोब्लास्टोमा के कारण

रेटिनोब्लास्टोमा का मुख्य कारण RB1 जीन में होने वाला परिवर्तन है। यह जीन शरीर में एक “ट्यूमर सप्रेसर” के रूप में कार्य करता है, यानी यह कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि को रोकता है। जब इस जीन की दोनों प्रतियां (एलील्स) क्षतिग्रस्त हो जाती हैं, तो रेटिना की कोशिकाएं बेकाबू होकर बढ़ने लगती हैं और ट्यूमर का निर्माण करती हैं।

आनुवंशिक मामलों में बच्चे को यह क्षतिग्रस्त जीन जन्म से ही माता-पिता से मिलता है, जबकि गैर-आनुवंशिक मामलों में यह उत्परिवर्तन गर्भ में विकास के दौरान अपने आप होता है। अभी तक इस बात के ठोस प्रमाण नहीं हैं कि पर्यावरणीय कारक या जीवनशैली से जुड़ी आदतें इस बीमारी को जन्म देती हैं। यह बीमारी संक्रामक नहीं है और न ही यह किसी संक्रमण के कारण होती है।

लक्षण

रेटिनोब्लास्टोमा के लक्षण शुरुआती अवस्था में पहचानना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि छोटे बच्चे अपनी समस्याएं स्पष्ट रूप से बता नहीं पाते। इसलिए माता-पिता और अभिभावकों को निम्नलिखित संकेतों पर विशेष ध्यान देना चाहिए:

  • सफेद पुतली (Leukocoria): यह सबसे आम और महत्वपूर्ण लक्षण है। जब बच्चे की तस्वीर फ्लैश के साथ खींची जाती है, तो सामान्यतः आंख लाल दिखनी चाहिए, लेकिन रेटिनोब्लास्टोमा में पुतली सफेद, पीली या चमकदार बिल्ली की आंख जैसी दिखाई देती है। इसे अक्सर “कैट्स आई रिफ्लेक्स” भी कहा जाता है।
  • भेंगापन (Strabismus): आंखों का अलग-अलग दिशाओं में देखना या तिरछा होना।
  • आंखों की लालिमा और सूजन: बिना किसी संक्रमण के आंख में लगातार लालिमा या सूजन रहना।
  • दृष्टि में कमी: बच्चे का किसी वस्तु पर ठीक से ध्यान केंद्रित न कर पाना।
  • आंख के रंग में बदलाव: पुतली के रंग में असामान्य परिवर्तन दिखाई देना।
  • आंख में दर्द: कुछ मामलों में आंख में दर्द और बेचैनी भी हो सकती है, खासकर जब बीमारी बढ़ चुकी हो।

अगर इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो तुरंत नेत्र रोग विशेषज्ञ (ऑप्थेल्मोलॉजिस्ट) से संपर्क करना चाहिए।

निदान (Diagnosis)

रेटिनोब्लास्टोमा का सही और समय पर निदान इलाज की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। डॉक्टर आमतौर पर निम्नलिखित तरीकों का उपयोग करते हैं:

  1. आंख की विस्तृत जांच: बच्चे को बेहोश करके (anesthesia के तहत) आंख की गहन जांच की जाती है, ताकि रेटिना और ट्यूमर की स्थिति का सही आकलन हो सके।
  2. अल्ट्रासाउंड (Ultrasound): आंख के अंदर ट्यूमर के आकार और स्थान का पता लगाने के लिए।
  3. एमआरआई (MRI): यह जांचने के लिए कि कैंसर आंख से बाहर मस्तिष्क या ऑप्टिक नर्व तक तो नहीं फैला है।
  4. आनुवंशिक परीक्षण (Genetic Testing): RB1 जीन में उत्परिवर्तन की पुष्टि करने और परिवार के अन्य सदस्यों के जोखिम का आकलन करने के लिए।

समय पर निदान से न केवल बच्चे की जान बचाई जा सकती है, बल्कि उसकी दृष्टि को भी सुरक्षित रखा जा सकता है।

उपचार (Treatment)

रेटिनोब्लास्टोमा का उपचार कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे कि ट्यूमर का आकार, स्थान, यह एक आंख में है या दोनों में, और क्या यह आंख से बाहर फैल चुका है। उपचार का मुख्य उद्देश्य बच्चे की जान बचाना, आंख को सुरक्षित रखना और यदि संभव हो तो दृष्टि को भी बनाए रखना है। प्रमुख उपचार विधियां इस प्रकार हैं:

  • कीमोथेरेपी (Chemotherapy): ट्यूमर के आकार को छोटा करने के लिए दवाओं का उपयोग किया जाता है। इसे प्रणालीगत (systemic) रूप से या सीधे आंख की धमनी में (intra-arterial chemotherapy) दिया जा सकता है।
  • लेजर थेरेपी (Laser Therapy): छोटे ट्यूमर को नष्ट करने के लिए लेजर किरणों का प्रयोग किया जाता है।
  • क्रायोथेरेपी (Cryotherapy): अत्यधिक ठंडक की मदद से ट्यूमर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है।
  • रेडियोथेरेपी (Radiotherapy): बड़े ट्यूमर के लिए विकिरण चिकित्सा का सहारा लिया जाता है, हालांकि इसके दुष्प्रभावों के कारण इसे सावधानी से इस्तेमाल किया जाता है।
  • एन्युक्लिएशन (Enucleation): यदि ट्यूमर बहुत बड़ा हो या दृष्टि बचाने की कोई संभावना न हो, तो प्रभावित आंख को सर्जरी द्वारा निकालना पड़ सकता है। यह उन मामलों में अंतिम विकल्प होता है जहां जान बचाना प्राथमिकता होती है।

उपचार की योजना हमेशा बाल कैंसर विशेषज्ञ और नेत्र रोग विशेषज्ञों की एक टीम द्वारा मिलकर बनाई जाती है।

रोकथाम और सावधानियां

चूंकि रेटिनोब्लास्टोमा मुख्य रूप से आनुवंशिक कारणों से होता है, इसलिए इसे पूरी तरह रोकना संभव नहीं है। हालांकि, समय पर पहचान से इसके गंभीर परिणामों को टाला जा सकता है। निम्नलिखित सावधानियां मददगार हो सकती हैं:

  • जिन परिवारों में पहले किसी सदस्य को रेटिनोब्लास्टोमा हुआ हो, उन्हें आनुवंशिक परामर्श (genetic counseling) लेना चाहिए।
  • नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों की नियमित नेत्र जांच करवानी चाहिए।
  • बच्चों की तस्वीरें खींचते समय पुतली के रंग पर ध्यान दें; बार-बार सफेद चमक दिखने पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।
  • गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच करवाना और परिवार के चिकित्सीय इतिहास की जानकारी डॉक्टर को देना उपयोगी हो सकता है।

निष्कर्ष

रेटिनोब्लास्टोमा भले ही एक गंभीर बीमारी हो, लेकिन आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की प्रगति के कारण आज इसका सफल इलाज संभव है, बशर्ते इसे समय पर पहचाना जाए। माता-पिता को अपने बच्चों की आंखों में होने वाले किसी भी असामान्य बदलाव, विशेषकर सफेद पुतली या भेंगेपन, को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। नियमित नेत्र जांच और जागरूकता ही इस बीमारी से लड़ने का सबसे प्रभावी तरीका है। यदि किसी बच्चे में इस बीमारी के लक्षण दिखाई दें, तो बिना देर किए किसी योग्य नेत्र रोग विशेषज्ञ या बाल कैंसर विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए, क्योंकि जितनी जल्दी इलाज शुरू होगा, बच्चे के जीवन और दृष्टि दोनों को बचाने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।

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