हिर्शस्प्रंग रोग (Hirschsprung Disease - आंतों का रोग)
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हिर्शस्प्रंग रोग (Hirschsprung Disease)

परिचय

हिर्शस्प्रंग रोग एक जन्मजात (जन्म से मौजूद) विकार है जो बड़ी आंत (कोलन) को प्रभावित करता है। इस रोग में आंत के किसी हिस्से में तंत्रिका कोशिकाएं (गैंग्लियन कोशिकाएं) अनुपस्थित होती हैं, जिसके कारण उस हिस्से में सामान्य रूप से मल आगे नहीं बढ़ पाता। परिणामस्वरूप बच्चे को मल त्याग करने में गंभीर कठिनाई होती है और आंत में रुकावट पैदा हो जाती है।

इस रोग का नाम डेनिश चिकित्सक हैराल्ड हिर्शस्प्रंग के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने 19वीं सदी में सबसे पहले इस स्थिति का विस्तृत वर्णन किया था। यह मुख्यतः नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों में पाया जाने वाला रोग है, हालांकि कुछ हल्के मामलों का निदान बड़ी उम्र में भी हो सकता है।

रोग कैसे होता है (कारण)

सामान्य रूप से, आंत की दीवार में तंत्रिका कोशिकाओं का एक जाल होता है जिसे “मायेंटेरिक प्लेक्सस” कहते हैं। ये कोशिकाएं आंत की मांसपेशियों को संकुचित (सिकुड़ने) और शिथिल होने का संदेश देती हैं, जिससे मल आगे की ओर धकेला जाता है। इस प्रक्रिया को पेरिस्टलसिस कहा जाता है।

भ्रूण के विकास के दौरान, ये तंत्रिका कोशिकाएं ऊपरी आंत से शुरू होकर धीरे-धीरे नीचे मलद्वार तक फैलती हैं। हिर्शस्प्रंग रोग में यह प्रक्रिया अधूरी रह जाती है, जिसके कारण मलद्वार के पास वाले हिस्से में तंत्रिका कोशिकाएं नहीं पहुंच पातीं। जिस हिस्से में ये कोशिकाएं गायब होती हैं, वह हिस्सा सिकुड़ा हुआ और कठोर रहता है, जबकि उसके ठीक ऊपर का हिस्सा मल के जमा होने से फैल जाता है।

आनुवंशिक कारण

हिर्शस्प्रंग रोग में आनुवंशिक (genetic) कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। कई मामलों में यह पारिवारिक इतिहास से जुड़ा होता है। इस रोग से जुड़े प्रमुख जीन में RET जीन शामिल है, जो सबसे अधिक प्रभावित पाया गया है। इसके अलावा EDNRB, GDNF, EDN3 जैसे कुछ अन्य जीन भी इस रोग से संबंध रखते हैं।

यह रोग कभी-कभी अन्य आनुवंशिक स्थितियों के साथ भी जुड़ा हो सकता है, जैसे डाउन सिंड्रोम। शोध बताते हैं कि डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त बच्चों में हिर्शस्प्रंग रोग होने की संभावना सामान्य से अधिक होती है।

किसे अधिक खतरा है

  • यह रोग लड़कियों की तुलना में लड़कों में अधिक पाया जाता है।
  • जिन परिवारों में पहले से किसी सदस्य को यह रोग रहा हो, वहां जोखिम बढ़ जाता है।
  • डाउन सिंड्रोम या कुछ अन्य जन्मजात विकारों वाले बच्चों में जोखिम अधिक होता है।
  • यह रोग जन्म के तुरंत बाद या शैशवावस्था में सामने आता है, हालांकि दुर्लभ मामलों में इसका पता बड़ी उम्र में भी चलता है।

लक्षण

हिर्शस्प्रंग रोग के लक्षण बच्चे की उम्र और रोग की गंभीरता के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

नवजात शिशुओं में लक्षण

  • जन्म के 48 घंटों के भीतर पहला मल (मेकोनियम) पास न होना, जो इस रोग का सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक संकेत माना जाता है।
  • पेट का फूलना और तना हुआ महसूस होना।
  • उल्टी होना, जो कभी-कभी हरे या पीले रंग की हो सकती है।
  • कब्ज की समस्या जो बार-बार होती रहे।
  • दूध पीने में कठिनाई और वजन ठीक से न बढ़ना।
  • अत्यधिक रोना और चिड़चिड़ापन, क्योंकि पेट में दर्द होता है।

बड़े बच्चों में लक्षण

कुछ मामलों में हल्के लक्षणों के कारण रोग का पता देरी से चलता है। ऐसे बच्चों में निम्न लक्षण दिख सकते हैं:

  • लंबे समय तक चलने वाली कब्ज जो दवाओं से भी ठीक न हो।
  • पेट फूला हुआ रहना।
  • वृद्धि और वजन बढ़ने में देरी (कुपोषण जैसी स्थिति)।
  • बार-बार दस्त और कब्ज का मिला-जुला अनुभव।
  • थकान और कमजोरी।

गंभीर जटिलता: एंटरोकोलाइटिस

हिर्शस्प्रंग रोग की सबसे खतरनाक जटिलता है “हिर्शस्प्रंग एसोसिएटेड एंटरोकोलाइटिस”। यह आंत में संक्रमण और सूजन की स्थिति है जो जानलेवा हो सकती है। इसके लक्षणों में तेज बुखार, पेट का बहुत अधिक फूलना, खूनी दस्त, और बच्चे की सामान्य स्थिति का अचानक बिगड़ना शामिल है। ऐसी स्थिति में तुरंत चिकित्सकीय सहायता आवश्यक होती है।

निदान (डायग्नोसिस)

यदि डॉक्टर को हिर्शस्प्रंग रोग का संदेह होता है, तो निम्नलिखित जांचों की सलाह दी जाती है:

1. शारीरिक परीक्षण – डॉक्टर बच्चे के पेट की जांच करते हैं और मलाशय की जांच (रेक्टल एग्जामिनेशन) भी की जा सकती है।

2. एब्डॉमिनल एक्स-रे – पेट के एक्स-रे से आंत में रुकावट और गैस के जमाव का पता चलता है।

3. बेरियम एनिमा – इस जांच में एक विशेष तरल (बेरियम) मलाशय के रास्ते डाला जाता है और एक्स-रे लिया जाता है। इससे आंत के सिकुड़े हुए और फैले हुए हिस्सों की स्पष्ट तस्वीर मिलती है।

4. एनोरेक्टल मैनोमेट्री – इस जांच में मलाशय की मांसपेशियों की प्रतिक्रिया को मापा जाता है, जिससे यह पता चलता है कि मांसपेशियां सामान्य रूप से शिथिल हो रही हैं या नहीं।

5. रेक्टल बायोप्सी – यह सबसे निश्चित (confirmatory) जांच मानी जाती है। इसमें मलाशय की दीवार से ऊतक का एक छोटा टुकड़ा लेकर माइक्रोस्कोप के नीचे जांचा जाता है, ताकि यह पता चल सके कि उस हिस्से में तंत्रिका कोशिकाएं (गैंग्लियन सेल्स) मौजूद हैं या नहीं।

उपचार

हिर्शस्प्रंग रोग का मुख्य उपचार शल्य चिकित्सा (सर्जरी) है। दवाओं से इस रोग को स्थायी रूप से ठीक नहीं किया जा सकता, क्योंकि समस्या की जड़ तंत्रिका कोशिकाओं की अनुपस्थिति में होती है।

सर्जरी का उद्देश्य

सर्जरी में आंत के उस हिस्से को निकाल दिया जाता है जिसमें तंत्रिका कोशिकाएं नहीं होतीं, और स्वस्थ आंत (जिसमें सामान्य तंत्रिका कोशिकाएं मौजूद हों) को मलद्वार से जोड़ दिया जाता है। इसे “पुल-थ्रू सर्जरी” (Pull-through Surgery) कहा जाता है।

सर्जरी के प्रमुख प्रकार

  • सोवे प्रोसीजर (Soave Procedure)
  • डुहामेल प्रोसीजर (Duhamel Procedure)
  • स्वेंसन प्रोसीजर (Swenson Procedure)

आजकल अधिकतर मामलों में यह सर्जरी लैप्रोस्कोपिक (दूरबीन) विधि से की जाती है, जिससे बच्चे की रिकवरी तेज होती है और बड़े चीरे से बचा जा सकता है।

सर्जरी से पहले की तैयारी

कुछ गंभीर मामलों में, सर्जरी से पहले अस्थायी रूप से “कोलोस्टॉमी” (आंत का एक हिस्सा पेट की त्वचा पर खोलकर मल को बाहर निकालने की व्यवस्था) की जाती है, ताकि बच्चे की स्थिति स्थिर हो सके। बाद में जब बच्चा सर्जरी के लिए तैयार होता है, तब मुख्य पुल-थ्रू सर्जरी करके कोलोस्टॉमी को बंद कर दिया जाता है।

सर्जरी के बाद देखभाल

सर्जरी के बाद कुछ बच्चों को अस्थायी रूप से दस्त, त्वचा में जलन (मलद्वार के आसपास), या मल त्याग की आदतों में बदलाव जैसी समस्याएं हो सकती हैं। समय के साथ और उचित देखभाल से अधिकांश बच्चे सामान्य जीवन जीने लगते हैं। नियमित रूप से डॉक्टर की सलाह और फॉलो-अप जांच आवश्यक होती है, ताकि एंटरोकोलाइटिस जैसी जटिलताओं को समय रहते पहचाना जा सके।

रोग का पूर्वानुमान (प्रोग्नोसिस)

समय पर निदान और उचित सर्जरी के बाद अधिकांश बच्चे सामान्य और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। हालांकि कुछ बच्चों को दीर्घकालिक रूप से मल त्याग संबंधी समस्याओं, कब्ज, या मल असंयम (incontinence) का सामना करना पड़ सकता है, जिसके लिए विशेषज्ञ की निरंतर देखभाल आवश्यक होती है। जितनी जल्दी रोग का पता चलता है और उपचार शुरू होता है, परिणाम उतने ही बेहतर होते हैं।

निष्कर्ष

हिर्शस्प्रंग रोग एक गंभीर परंतु उपचार योग्य जन्मजात स्थिति है। इसके प्रारंभिक लक्षणों को समय पर पहचानना अत्यंत महत्वपूर्ण है, विशेष रूप से नवजात शिशु में जन्म के बाद मेकोनियम पास न होना। शीघ्र निदान और सही समय पर सर्जिकल उपचार से बच्चे स्वस्थ और सामान्य जीवन जी सकते हैं। यदि किसी बच्चे में इस रोग से संबंधित कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो तुरंत बाल रोग विशेषज्ञ (Pediatrician) से संपर्क करना चाहिए।

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