ओरल कैंसर (मुंह का कैंसर): कारण, लक्षण, बचाव और उपचार
परिचय
मुंह का कैंसर, जिसे चिकित्सा भाषा में ओरल कैंसर कहा जाता है, भारत में पाए जाने वाले सबसे आम कैंसरों में से एक है। यह कैंसर मुंह के किसी भी हिस्से में हो सकता है, जैसे होंठ, जीभ, मसूड़े, गाल के अंदरूनी हिस्से, तालु (मुंह की छत), और मुंह का फर्श। भारत में तंबाकू और गुटखे के बढ़ते सेवन के कारण ओरल कैंसर के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में होने वाले ओरल कैंसर के लगभग एक-तिहाई मामले अकेले भारत में दर्ज किए जाते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अगर इसका पता शुरुआती अवस्था में चल जाए, तो इसका इलाज संभव है, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण अधिकतर मरीज अंतिम अवस्था में डॉक्टर के पास पहुंचते हैं, जिससे इलाज मुश्किल हो जाता है।
ओरल कैंसर क्या है?
ओरल कैंसर तब होता है जब मुंह की कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं और नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं। यह असामान्य वृद्धि धीरे-धीरे एक ट्यूमर का रूप ले लेती है, जो आसपास के ऊतकों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है। समय के साथ यह कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों, जैसे गर्दन की लिम्फ ग्रंथियों (लिम्फ नोड्स), फेफड़ों और अन्य अंगों में भी फैल सकता है।
ओरल कैंसर मुख्य रूप से “स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा” प्रकार का होता है, जो मुंह की परत बनाने वाली सपाट कोशिकाओं (स्क्वैमस सेल्स) से शुरू होता है। यह लगभग 90% ओरल कैंसर के मामलों में पाया जाता है।
ओरल कैंसर के मुख्य कारण
ओरल कैंसर होने के पीछे कई कारण जिम्मेदार हो सकते हैं, लेकिन कुछ मुख्य कारण इस प्रकार हैं:
1. तंबाकू का सेवन – धूम्रपान (सिगरेट, बीड़ी) और चबाने वाला तंबाकू (गुटखा, खैनी, जर्दा, पान मसाला) ओरल कैंसर का सबसे बड़ा कारण है। तंबाकू में मौजूद कैंसरकारी तत्व (कार्सिनोजेन) मुंह की कोशिकाओं को सीधे नुकसान पहुंचाते हैं।
2. शराब का अत्यधिक सेवन – अधिक मात्रा में और नियमित रूप से शराब पीने से भी ओरल कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। तंबाकू और शराब दोनों का एक साथ सेवन करने से यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
3. पान और सुपारी – पान में तंबाकू, सुपारी और चूना मिलाकर खाने की आदत भारत में बहुत आम है, और यह ओरल कैंसर का एक प्रमुख कारण है।
4. एचपीवी संक्रमण (HPV Infection) – ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV) का कुछ स्ट्रेन भी गले और मुंह के कैंसर से जुड़ा हुआ पाया गया है।
5. सूर्य की किरणों का अत्यधिक संपर्क – अधिक देर तक धूप में रहने से होंठों का कैंसर होने का खतरा बढ़ सकता है, खासकर उन लोगों में जो बाहर काम करते हैं।
6. मुंह की खराब स्वच्छता – दांतों की नियमित सफाई न करना, टूटे-फूटे दांत या खराब फिटिंग वाले डेंचर मुंह में लगातार घर्षण पैदा कर सकते हैं, जो लंबे समय में कैंसर का कारण बन सकते हैं।
7. कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता – जिन लोगों की इम्यून सिस्टम कमजोर होती है, उनमें कैंसर होने का खतरा अधिक होता है।
8. आहार में पोषक तत्वों की कमी – फल और सब्जियों का कम सेवन और शरीर में विटामिन ए, सी व ई की कमी भी एक जोखिम कारक मानी जाती है।
ओरल कैंसर के लक्षण
ओरल कैंसर के शुरुआती लक्षणों को पहचानना बहुत जरूरी है, क्योंकि समय पर पता चलने से इलाज आसान हो जाता है। नीचे दिए गए लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए:
- मुंह के अंदर कोई घाव जो दो-तीन हफ्तों में ठीक न हो
- मुंह में सफेद (ल्यूकोप्लाकिया) या लाल (एरिथ्रोप्लाकिया) धब्बे
- जीभ, मसूड़े, गाल या होंठ पर गांठ या मोटापन महसूस होना
- मुंह से बिना किसी कारण खून आना
- चबाने, निगलने या बोलने में कठिनाई होना
- गले में लगातार खराश या कुछ अटका होने जैसा महसूस होना
- जबड़े में सूजन या दर्द, जिससे दांतों की फिटिंग बदल जाए
- आवाज में बदलाव या कर्कशपन
- गर्दन में गांठ महसूस होना
- अचानक वजन कम होना, बिना किसी स्पष्ट कारण के
- कान में दर्द (विशेषकर एक तरफ)
अगर इनमें से कोई भी लक्षण दो हफ्तों से अधिक समय तक बना रहे, तो तुरंत डॉक्टर या दंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
ओरल कैंसर की जांच और निदान
ओरल कैंसर का पता लगाने के लिए डॉक्टर कई तरह की जांच करते हैं:
- शारीरिक परीक्षण – डॉक्टर सबसे पहले मुंह, जीभ, मसूड़ों और गले की जांच करते हैं और गर्दन में गांठों को महसूस करते हैं।
- बायोप्सी – संदिग्ध जगह से ऊतक का एक छोटा सा नमूना लेकर माइक्रोस्कोप के नीचे जांचा जाता है। यह ओरल कैंसर की पुष्टि करने का सबसे विश्वसनीय तरीका है।
- इमेजिंग टेस्ट – एक्स-रे, सीटी स्कैन, एमआरआई और पीईटी स्कैन के जरिए यह पता लगाया जाता है कि कैंसर कितना फैल चुका है।
- एंडोस्कोपी – एक पतली ट्यूब के जरिए गले और मुंह के अंदरूनी हिस्सों की जांच की जाती है।
ओरल कैंसर की अवस्थाएं (स्टेजिंग)
ओरल कैंसर को आमतौर पर चार मुख्य चरणों में बांटा जाता है:
- स्टेज 1 – ट्यूमर छोटा होता है (2 सेंटीमीटर से कम) और यह शरीर के अन्य हिस्सों में नहीं फैला होता।
- स्टेज 2 – ट्यूमर थोड़ा बड़ा (2-4 सेंटीमीटर) होता है, लेकिन अभी भी सीमित होता है।
- स्टेज 3 – ट्यूमर बड़ा हो जाता है या पास की लिम्फ ग्रंथियों तक फैल जाता है।
- स्टेज 4 – कैंसर आसपास के ऊतकों, हड्डियों या शरीर के दूर के हिस्सों (जैसे फेफड़े) तक फैल जाता है। इसे सबसे गंभीर अवस्था माना जाता है।
जितनी जल्दी कैंसर का पता चलता है, इलाज उतना ही आसान और प्रभावी होता है। स्टेज 1 में पकड़े गए मामलों में जीवित रहने की दर काफी अधिक होती है।
ओरल कैंसर का उपचार
उपचार का तरीका कैंसर की अवस्था, स्थान और मरीज की सामान्य सेहत पर निर्भर करता है। मुख्य उपचार विकल्पों में शामिल हैं:
1. सर्जरी – ट्यूमर और उसके आसपास के प्रभावित ऊतकों को सर्जरी के जरिए निकाल दिया जाता है। कई बार गर्दन की लिम्फ ग्रंथियों को भी निकालना पड़ सकता है।
2. रेडियोथेरेपी (विकिरण चिकित्सा) – उच्च ऊर्जा वाली किरणों से कैंसर कोशिकाओं को नष्ट किया जाता है। यह अकेले या सर्जरी के साथ मिलाकर दी जा सकती है।
3. कीमोथेरेपी – दवाओं के माध्यम से कैंसर कोशिकाओं को मारा जाता है। यह अक्सर एडवांस स्टेज में इस्तेमाल की जाती है।
4. टार्गेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी – यह नई तकनीकें विशेष रूप से कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाती हैं और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को कैंसर से लड़ने में मदद करती हैं।
5. पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) – सर्जरी के बाद बोलने, खाने या चेहरे की बनावट में बदलाव के लिए स्पीच थेरेपी, फिजियोथेरेपी और कॉस्मेटिक सर्जरी की भी जरूरत पड़ सकती है।
ओरल कैंसर से बचाव के उपाय
चूंकि ओरल कैंसर के अधिकतर मामले जीवनशैली से जुड़ी आदतों के कारण होते हैं, इसलिए कुछ सावधानियां बरतकर इससे बचा जा सकता है:
- तंबाकू, गुटखा, खैनी और सिगरेट का सेवन पूरी तरह बंद करें
- शराब का सेवन सीमित करें या न करें
- पान और सुपारी खाने की आदत छोड़ें
- रोजाना दांतों की सफाई करें और नियमित रूप से दंत चिकित्सक से जांच कराएं
- संतुलित आहार लें, जिसमें फल और हरी सब्जियां शामिल हों
- धूप में जाने से पहले होंठों पर सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें
- HPV से बचाव के लिए टीकाकरण पर डॉक्टर से सलाह लें
- मुंह में किसी भी असामान्य बदलाव को नजरअंदाज न करें और समय पर जांच कराएं
जागरूकता की भूमिका
भारत जैसे देश में जहां तंबाकू और गुटखे का सेवन बहुत आम है, वहां ओरल कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाना बेहद जरूरी है। स्कूलों, कार्यस्थलों और सामुदायिक स्तर पर तंबाकू विरोधी अभियान चलाने से युवाओं को इस लत से दूर रखा जा सकता है। इसके अलावा, नियमित मुंह की स्वयं-जांच (सेल्फ एग्जामिनेशन) की आदत डालना भी लाभकारी है, जिसमें व्यक्ति खुद आईने के सामने अपने मुंह, जीभ और मसूड़ों की जांच कर सकता है।
निष्कर्ष
ओरल कैंसर एक गंभीर लेकिन काफी हद तक रोकी जा सकने वाली बीमारी है। तंबाकू और शराब से दूरी बनाकर, मुंह की स्वच्छता का ध्यान रखकर और शुरुआती लक्षणों को पहचानकर इसे काफी हद तक रोका जा सकता है। अगर मुंह में कोई भी असामान्य बदलाव, घाव या गांठ दो हफ्तों से अधिक समय तक बनी रहे, तो बिना देरी किए डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। शुरुआती अवस्था में पहचान और सही इलाज से ओरल कैंसर से पूरी तरह ठीक होना संभव है। जागरूकता ही इस बीमारी से बचाव और सफल इलाज की सबसे बड़ी कुंजी है।
